Home आज की कविताचौदह चित्र : कविताएं-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

चौदह चित्र : कविताएं-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by Dr. Vinita Raghuvanshi
चौदह चित्र : कविताएं
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तभी : १०
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रोगी बाबा के
कन्धें पर
उछल कर
बैठ गई चिड़िया
मैं चिल्लाया मौत
तभी —-
बाबा ने आंखें खोली
और पूछा —-
तुम्हारी घड़ी में
कितना बजा है बेटे !
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
मनुष्य के हालात के साथ जुड़ा होता है जिंदगी का अहसास लेकिन आदमी यदि किसी स्थिति से भयग्रस्त होता है तो वह स्थिति होती है मौत । जहां चिड़िया के अकस्मात उड़ कर कन्धें पर बैठ जाने भर से भी मन डांवाडोल हो जाता है ।आशंका भर जाती है कि यह मौत का ही संकेत है ।मन कांपने लगता है कि चिड़िया के सहज उड़ान में भी मौत के इशारों का अनुमान कर लिया जाता है ।आदमी के जीवन में रोग ,शोक , आधि – व्याधि ,संकट, संघर्ष ,आपदा – विपदा , मुश्किलें, कठिनाई ,घटना – दुर्घटना ,हादसे सब आते जाते रहते हैं लेकिन इन सबके बीच से बुजुर्ग बाबा की मौत के संकेत का अनुमान ।यह बाबा कौन है घर का सबसे बूढ़ा व्यक्ति ,या वह समय जो अप्रतिहत संचरण कर रहा है ।वह युग धारा जो मनुष्य के आसपास विचरण कर रही है ।वह नेतृत्व कारी विचार सरणी जो मार्ग दर्शक बनी हुई है ।चिड़िया एक प्रतीक है समय की धारा का ,युगान्त का इसीलिए तो जब चिड़िया रोगी बाबा के कन्धें पर उछल कर बैठती है तो इशारा है आदर्श युग की समाप्ति का । समय जो युगों – युगों से एक आदर्श मय अवस्था में बंधा हुआ बूढ़ा हो गया पीढ़ियों ने आदर्श के पैमाने बदल दिए ।यह भी संकेत है कि अब युग- धर्म ,मानव- धर्म की मिसालें ,प्रमाण समय की तीव्र गति में कहीं खो चुके हैं । अब समाज में श्री राम का स्थापित आदर्श हो या श्री कृष्ण के संघर्ष की चेतना हो ,या गौतम और महावीर के अहिंसा के विचार हो सब समय के साथ समाज ने उपेक्षित और चेतना विहीन कर दिए हैं ।ऐसे समय में मौत एक विचार बन कर आती है ? यह समाज की संकटापन्न स्थिति है । जो मन में डर पैदा कर रही है ।बाबा भी समय पूछ रहें हैं ।यह समय क्या है ? क्या समय बदलने का संकेत है ? या युग धारा के बदलने की प्रतीक्षा ? बाबा भी याने युग भी प्रतीक्षा रत है बदलने के लिए ।नये मानवीय आदर्श के सृजन की घड़ी की प्रतीक्षा है ।क्या है बाबा का समय पूछना ? बुरे वक्त का अन्त या अच्छे समय की शुरुआत ? किस तरह की शंका और संशय समय में उठ रहे हैं ? यह संशय काल है ? हर आदर्श,हर रीति – नीति,हर नैतिक मापदण्ड ,हर मूल्य चेतना का अपसरण? हर आचरण में भ्रष्टता का घालमेल ? क्यों है मृत्यु की प्रतीक्षा? सारे सत्य का मिथ्या हो जाना ? यह मृत्यु का ही तो संकेत है ।बाबा का अवसान याने युग का अन्त समापन । कविता समय के गहरे संकट को महसूस कर रही है । यहां बाबा ही नहीं मरेंगे बहुत सी व्यवस्थाएं भी मर जायेंगी ।याने मौत घर देख लेगी यह मुहावरा चरितार्थ हो जायेगा ।सब कुछ मरने लगेगा । बाबा का अवसान याने समय का अवसान होगा । अपने समय के स्पन्दन को महसूस करने का वक्त है ।वक्त है समय को ,काल को अनुभूत करने का । बाबा का जीवित रहना याने सब कुछ वंश में रहना ? यह आत्म चेतना की कविता है ।”तभी” को समझने की जरुरत है ! 🙏विनीता रघुवंशी

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