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चौदह चित्र : कविताएं
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उम्र -धोबिन : ११
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कर्म शिला पर
पछीटती रही
उम्र-धोबिन
मोह के जलाशय में
खंगालती रही उसे
कुछ – कुछ
निखर आई
जिंदगी की
रेशमी चादर
लेकिन जगह – जगह
हो गई जर्जर वह !
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की कविता में दर्शन की गहरी आत्मानुभूति को बहुत ही सहज तरीके से व्यक्त किया गया है । हर मनुष्य को जीने के लिए एक उम्र मिलती है जिसे वह अपने जन्म से लेकर मृत्यु तक की समय सीमा में व्यतीत करता है ।इस व्यतीत किए जाते समय को ही उम्र का लेखा – जोखा और समय की माप समझी जाती है ।इस उम्र के भी चार हिस्से किए जाते हैं पहला बचपन याने अबोध अवस्था ,दूसरी किशोर अवस्था ,तीसरी युवा अवस्था और चौथी प्रौढ़ अवस्था या बुढ़ापा । यह है मनुष्य की उम्र का हिसाब ।इस सारे समय के बीच ही रहकर मनुष्य अपने कर्म – अकर्म करता रहता है ।इस समय में मनुष्य जीवन के बहुत से तरीके ,विचार , मान्यताएं , धारणाएं , रुढ़िया, रीति रिवाज ,तौर – तरीके ,शिक्षा और सीख ,धर्म- अधर्म ,गुण और दोष , आचरण और दुराचरण अपनाता रहता है और मुक्त होता है ,छोड़ता है , भोगता है ,त्याग करता है । यह है उम्र के अनुभव , अनुभूति और गुजारना ।एक उम्र रुपी धोबिन हमारे जीवन के अवगुण ,कमियों को ,लोकाचार को ,व्यवहार को पछीट- पछीट कर साफ़ करती रहती है । मनुष्य जन्म से बिल्कुल कोरा पैदा होता है लेकिन लोक उसे अनुभव की पाठशाला में प्रक्षालन द्वारा लोक के अनुरूप , अनुकूल बनाता रहता है । मनुष्य के ज्ञान में वृध्दि करता है । मनुष्य स्व से मुक्त होकर परलोक अर्थात समग्र संसार के अनुसार ,तदनुरुप अपने आचरण ,विचार , धारणाओं, मान्यताओं में बदलाव करता रहता है । इस तरह एक सामान्य व्यक्ति प्रकृति से , स्वभाव से अकृत्रिम जीवन के असंवेदनशील जीवन से बाहर एक संवेदनशील लोक व्यवहार को सीखता है ,अपनाता है और लौकिक यश, सम्मान की प्राप्ति करता है ।मानवीय बोध पाता है ।न्याय और नीति सीखता है । यही मनुष्य फिर सामाजिक स्वरुप , सम्मान और व्यक्तित्व का आदर्श बन जाता है ।जिंदगी को साफ और स्वच्छ करने का सारा कर्म मनुष्य की उम्र का कुल टोटल लेखा – जोखा होता है ।उसके कर्म और फैसले ही उसकी सामाजिक – राजनीतिक,आर्थिक , धार्मिक छवि का सृजन करती है ।इसमें मनुष्य की व्यक्तिगत उपलब्धियां भी याने पद ,प्रतिष्ठा,लोक छवि, मानवीय सरोकार आदि भी समाहित हो जाते हैं ।यही तो है पूरी उम्र के कर्म ? जिनके आधार पर मनुष्य के जीवन का मूल्यांकन किया जाता है ।यही जीवन रुपी रेशमी चादर है जो बहुत ज्यादा पछीटी जाने के कारण जर्जर हो जाती है । यह पीटना मोह के जलाशय में हो रहा है मनुष्य जब जन्म लेता है तो उसके पास कुछ नहीं होता यह कहने को की “यह मेरा है ” पर जैसे जैसे उसमें आत्मबोध बढ़ता है वह मोह के जाल में पड़ता जाता है ।संसार की समग्र सामग्री , वस्तुएं उसे अपनी लगने लगती है । यही वर्चस्व का भाव ।यही एका अधिकार भाव ,यही अपनत्व का भाव ही तो मोह है ।मेरा मेरा का भाव ही विकृति है ।यही द्वेष का भावोदगारक है । यहीं से परस्पर स्पर्धा,यही से प्रतिद्वन्दिता जागती है ।इसी से स्वार्थ जैसे विकार जन्मते हैं ।यही विरोध ,शत्रुता ,विद्वेष का कारक होता है ।आदमी जीवन भर इन विकृत विचारों से जूझता रहता है ।मनोविकारों से निवृत्ति के मार्ग खोजता है ।यही मोह ग्रस्त जिंदगी उसको आचरण से भ्रष्ट करती है । जब मनुष्य अपना आत्म प्रक्षालन करता है तो जीवन में थोड़ा- थोड़ा निखार आने लगता है । जीवन बहुत छोटा है जब तक मनुष्य अपनी कमियों का आत्म सूक्ष्म निरीक्षण करता है तब तक उम्र के बीत जाने का समय निकट संकेत देने लगता है ।शरीर रोग ग्रस्त और मन थकान से तनाव से शिथिल हो जाता है ।जीवन जीने का उत्साह ,उमंग ,उल्लास सब फीकी पड़ जाती है ।बस यही ख्याल मन में स्थिर हो जाता है कि अपने को क्या करना ? अपन तो अब बूढ़े हो गये लेकिन आदमी को इस तरह के विचारों से परहेज़ करना चाहिए और अपने भीतर तब्दीली की संभावनाओं को तराशते रहना चाहिए ।जीवन के अन्तिम क्षण तक चेतना के ,उत्साह की अंगुली थामे रहना चाहिए ।यही जीवन का सही मार्ग है ।बुढ़ापा एक अवस्था है उसे आजाद मस्तक ओढ़े नहीं रखना चाहिए ।स्वयं के द्वारा स्वयं की उपेक्षा कदापि नहीं करना चाहिए अन्यथा कचरा समझकर कूढें के ढेर में तो सभी कोने में रख ही देंगे ।यह जीने का एक सही दृष्टिकोण है।हमेशा आपस में साझा जीवन के उसूलों को अपनाते चले यही जिन्दगी की सच्ची राह है ।
विनीता रघुवंशी
