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विनीता रघुवंशी
चौदह चित्र : कविताएं
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बूढ़े माता – पिता : १२
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काफी बूढ़े हैं पिता
और मां भी
पिता का सिर
मना करता- सा हिलता है
मां का भी
किन्तु हां -हां करता-सा
एक दूसरे के सामने बैठे दोनों
ना – – – हां की मुद्रा में हिलाया करते सिर
आखिरकार पिता और मां
परस्पर इतने नकारे क्यों हो गये हैं ?
जबकि पिता ,अब भी अनंत आकाश हैं
और मां , क्षितिजों के पार तक फैली धरती !
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की कविता में मां और पिता की अस्मिता का फैलाव महसूस किया गया है ।पिता आकाश की तरह अनंत है जो अपने सीने में पूरे संसार को समेट लेता है ।उसके पास अनुभव की एक विस्तृत दुनिया होती है और वह अपनी संतानों को अनुभव की विरासत हर समय बांटता रहता है । पिता की स्वीकृति उतनी ही नहीं होती जितनी की वह जैविक शरीर संतान को सौंपता है ।वह हर पल अपने मीठे – कड़़वे अनुभव – अनुभूति ज्ञान , संवेदना ,सत्य, विचार , धारणा ,संरक्षण आदि संतान को विरासत की तरह देता है ।बुढ़ापा ऐसी अवस्था है जो हर युवा के पास आता ही है ।आज आधुनिकता ने बुजुर्ग पीढ़ी की उपेक्षा ,असम्मान,और वृध्दाश्रम में ले जाकर छोड़ देना यह एक सामाजिक रिवाज बन चुका है । बुजुर्ग अपने इस अपमान को मौन रहकर सह जाते हैं ।यह हां और ना में हिलते सिरों का सूक्ष्म संवेदनशील भावुक चित्र है । मां का हां में हिलता सिर बहुत कुछ संकेत दे रहा है ।मां अब भी घोर उपेक्षा के बाद भी पीढ़ियों के सृजन का दायित्व उठाना चाहती है और पिता इस दायित्व को नकार रहे हैं जबकि पिता आकाश हैं ।आकाश शिवत्व का प्रतीक है लेकिन पीढ़ियों को सही दिशा दिखाने का दायित्व भी पिता के पास ही सुरक्षित है और पिता पीढ़ियों की दिशा सुधारने के लिए कठोर अनुशासन का सबक देना चाहते हैं इसीलिए पिता का सिर मना करता हिलता है ।पिता का नकार और मां की स्वीकृति के बीच एक गहरी समझ का सरोकार है ।मां भटकी हुई पीढ़ी को सुधारना चाहती है और पिता हाल पर ,हालात पर छोड़ देना चाहते हैं ।आज आधुनिकता ने मनुष्य को बहुत ज्यादा स्वार्थी बना दिया है ।आदमी के अपने रिश्तों संबंधों के प्रति दृष्टिकोण बदल गये हैं ।उनके नजरिए में हानि – लाभ,नफा – नुकसान ,रुपया – पैसा समा गया है । आदमी खुदगर्ज बना यहां – वहां भटक रहा है ।परिवार की अहमियत उसकी निगाह में खतम हो चुकी है ।माता – पिता का बसेरा वृध्दाश्रम बन चुके हैं ।ऐसे हालात में पिता का आत्मसम्मान और मां की गरिमा का अपसरण हो रहा है । माता और पिता को जिस तरह से समाज में नकारा जा रहा है वह चिन्तनीय है ।मां आज भी धरती की तरह उदार मना है और पिता आज भी आकाश की अनंतता कका अहसास बने हुए हैं लेकिन संतान ही इतनी संकुचित क्यों हो गई कि वह पिता और मां का दायित्व संभाल नहीं पा रही है ।बूढ़े माता पिता के प्रति समाज में बदलता नजरिया वास्तव में चिन्तित करने वाला है ।माता पिता बनते युवा यह भूल जाते हैं कि उनकी बाल्यावस्था का लालन – पालन मां और पिता ने किसी स्वार्थ के वशीभूत होकर नहीं किया वरन् वह तो वह अपनत्व का भाव था जिसमें धरती की सहनशीलता और आकाश का फैलाव था ।वह आत्मज और आत्मजा का विस्तीर्ण भाव था ।आत्मा से जन्मी संतान की आत्मीयता थी ।आज की संतान जब माता -पिता से अहंकार वश यह कहती हैं कि–” हमने कहा था कि हमें पैदा करो ? ” यह कितना अपमानित करने वाला वाक्य है जो मनुष्य की खुदगर्जी और जिम्मेदारी से पलायन का वाकया बन जाता है ? क्या समाज इस तरह की पीढ़ियों के सृजन की मिसाल कायम करना चाहता है ?वैसे भी समाज की दिशा खुदगर्ज पीढ़ियों के निर्माण की दिशा ही है । आज हम पीढ़ियों को हिंसक ,हमलावर,हत्यारा, उच्छृंखल मनोवृत्तियों से भर रहे हैं । क्या एक। बार हम पिता के नकार और मां की हां का अर्थ समझने की चेष्टा करेंगे ? मां की गरिमा मय उपस्थिति और पिता की अनंत क्षमताओं का अहसास तो समाज को होना ही चाहिए ।आज हमारा समाज जिस पश्चिमी अन्धानुकरण की दिशा में बढ़ रहा है वह चिन्ता जनक है ।आज समाज में तलाक , और घर टूटने के किस्से चलन में आ गये हैं इसलिए बचपन कई मर्तबा पिता या माता के बिना ही वयस्क होता है उसके मानसिक गठन में ,व्यक्तित्व में कुछ कमजोरी विशेष परिलक्षित होती है ।इसकी वजह पालन – पोषण में एकांगी परवरिश का ,दृष्टि का अभाव दिखाई देता है ।आज समाज अधूरे पन की तरफ ही बढ़ रहा है ।इस पर समाज को बेहतर तरीके से विचार करना चाहिए ।यह भी विचार करना होगा कि बेटी को गृह प्रबंध और बेटे को परिवार प्रबंधन के तौर तरीके सिखाए जायें तब ही माता – पिता की ना –हां की स्थितियों में बदलाव आयेगा ।बुढ़ापा एक अवस्था है ।इसे भी अपनाया जाना चाहिए ।
