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चौदह चित्र : कविताएं
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गुम्फित जीवन : १३
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बयां नीड़ – सा
गुम्फित जीवन
उलझा पुलझम
किन्तु उसे भी
ध्वस्त नष्ट करने को
उद्यत खड़ा
विषमता का कपि
और इसी बन्दर की
सब मिल
बोल रहे जय
हनुमान कह
श्रध्दानत हो – – –
जोर – जोर से !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज के जीवन को परिभाषित करती कविता हमें यह संकेत दे रही है कि जीवन में बहुत सी उलझने है बिलकुल बयां पक्षी द्वारा बनाए घोंसले की तरह । बयां पक्षी जब अपना घोंसला बनाता है तो उसके सिरे को समझना बहुत मुश्किल होता है ।उसी तरह आदमी के जीवन की भी गति होती है ।।आदमी के जीवन में परिवार है ,सेहत है ,शिक्षा है ,लालन- पालन है ,बुढ़ापा है ,छत और घर बनाने के इरादे हैं , बच्चों के बेहतर भविष्य के सपने हैं ,बहन – भाई के घर ,नौकरी और व्यवसाय की चिन्ताएं हैं , विवाह संबंध निभाने की जिम्मेदारी है ।क्या नहीं है जिन्दगी में ? सब जिन्दगी के आसपास ही घूमता रहता है ।जीवन है तो दायित्व है ,चिन्ता है ,फिक्र है ,दबाव है ,तनाव है ,भय है , सफलता है ,असफलता है ,उपलब्धि है ,परीक्षा है ,उतार है ,चढ़ाव है सब एक दूसरे से गुंथे हुए हैं । इन सबके बीच मनुष्य जीवन की असमान स्थितियां हैं । बन्दर और बयां की अवान्तर कथा का एक प्रसंग भी इसमें प्रयोग किया गया है ।बन्दर ने एक बार बयां से घर बनाने की याने घोसला बनाने का हुनर सीखना चाहा बयां ने बड़ी मेहनत से बंदर को घोसला सिखाना शुरु किया लेकिन बयां की लाख कोशिशों के बाद भी बंदर घोंसला बनाना नहीं सीख पाया ।यही तो है बंदर की उलझम – पुलझम सब सिरे उलझा कर बयां के घोसले को भी तोड़ डाला ।यही है विषमता रुपी कपि ।जिसने जीवन को उलझा दिया है ।इसी तरह जिन्दगी की तमाम जिम्मेदारी निबाहते निबाहते आदमी खुद उसमें उलझ जाता है और अपने ही हाथों अपनी जिन्दगी को नष्ट कर देता है ।वह जीवन में प्रलोभन में उलझता जाता है और अपने सुखी जीवन को दुख में बदल देता है ।आदमी के जिन्दगी में लिए फैसले ही उसके सुख ,शान्ति और आनन्द की दिशा तय करते हैं और। जिंदगी में किए गये गलत फैसले उसके जीवन को अशान्त,बेचैन, व्याकुल और तनाव ,चिन्ता का कारण बनते हैं । मोह ,लालच,लालसा ,घृणा, द्वेष, ईर्ष्या के साथ लिए निर्णय ही चिन्ता और तनाव के कारक होते हैं । जीवन में वैचारिक दृष्टिकोण बहुत महत्वपूर्ण होता है । कहां भी गया है कि — बिना विचारे जो करे तो पाछे पछताये ” जो असमानता रुपी बंदर खुद बुध्दि हीन है वह मनुष्य को क्या दिशा दिखा सोता है ? जो बयां से याने पेड़ पर रहने वाले पक्षी से घर बनाने की कला सीखना चाहता जिसका जीवन पक्षी के जीवन से भिन्न है । भिन्नता है तो ध्वस्त तो होगा ही ? इसी तरह मनुष्य भी असमानताओं से भरे जीवन में जड़ता ,मूर्खता की जय जयकार कर रहा है ।पहले अपने जीवन से विषमता याने अमीरी गरीबी,जात कुजात,धर्म सम्प्रदाय ऊंच नीच के भेद मिटाने पड़ेंगे तब जाकर मनुष्य के जीवन की सार्थकता साबित होगी । समानता होने पर ही जिन्दगी की श्रेष्ठता साबित हो सकेगी केवल जय जयकार करने से कोई भी श्रध्दा ,आस्था, सम्मान के काबिल नहीं हो सकता ।हनुमान बनकर संकट मोचन कहलाना ,अतुलित बल और बुद्धि के आगार बन जाना यह चेतना के परिपक्व लक्षण हैं ।जो हम गोस्वामी तुलसीदास जी के हनुमान में स्पष्ट रुप से पाते हैं ।बंदर होना और हनुमान होने में भी भिन्नता है ।श्रध्दा का भी अपना एक महत्व है जो हर किसी को समर्पित नहीं की जा सकती । आज शिक्षा ,स्वास्थ्य , और अर्थ ,रोजगार के प्रश्न बहुत बड़े हैं यही जीवन को नष्ट भी कर रहे हैं युवा पीढ़ी भी इनसे टकरा कर नष्ट और ध्वस्त हो रही है ।चिन्ता यहीं से शुरू होना चाहिए ।
विनीता रघुवंशी
