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वह
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( ५ )
इधर अपनी मेहरारु के साथ
खेत नींदता वह
उधर मेड़ की हरी दूब पर
खेल रहे बच्चे
तभी एक राकेट निकला
धुएं की लकीर खींचता
बच्चे अपने घरौंदों को घेरे
चीखने लगे
और वह देर तक देखता रहा आसमान
मन में जलते हुए
खेतों की आशंका लिए
फिर गमछे से पसीना पोंछता आ गया
बच्चों के पास हरी मेड़ पर
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत )
फसल उग आई है और किसान पत्नी के साथ खर- पतवार नींद रहा है ।किसान खेत में जो श्रम करता है तब वह अकेला नहीं होता ।खेती साझा मेहनत का ही परिणाम होती है । जब भी किसान खेत में लहलहाती फसल को देखता है तब उसका मन दो तरह के विचारों और मनोविज्ञान में उलझा रहता है ।एक तरफ लहलहाती फसल को देखकर आनंद का भाव मन में तरंग लेता है तो दूसरी तरफ उसके मन में हानि की तरह- तरह की आशंका मन में तैरती रहती है । ।यह मनोवैज्ञानिक स्थिति है ।जरा सी आहट भी उसको भयभीत कर जाती है क्योंकि खेत – खलिहान खूब फैले हुए रहते हैं ।फसल की कोई चौहद्दी नहीं होती और न वह दीवारों के बीच ही उगती है ।वह तो खुले आसमान के नीचे भरपूर रोशनी और सूरज की ऊर्जा के बीच पनपती है । फसल को आग से ,हवा से ,वर्षा से ,आंधी और तूफान से एकाएक सुरक्षित नहीं किया जा सकता जिस तरह राकेट के धुएं की लकीर बच्चों के मन को डराती है और वे अपने घरौंदों को घेरे लेते हैं वैसे ही धुएं की लकीर किसान के मन में आग की आशंका से त्रस्त कर देती है ।किसान आग से अपनी मेहनत को नष्ट होते देखता है कल्पना में ।आग की कल्पना ही से उसे पसीना आ जाता है।आसमान में खिंची धुएं की लकीर एक भय उपजाती है और आशंका से त्रस्त मन में बच्चों के पास पहुंच कर राहत पाता है ।यह है मनोविज्ञान जो भय से उबरने में मदद करता है । बच्चे भविष्य हैं ।फसल भी भविष्य है। हरी मेड़ का स्पर्श मन में सुकून देता है ।बच्चे और फसल सुरक्षित है ।यह आसमान में खिंचती धुएं लकीर कभी भी मेहनत को नष्ट कर सकती है ।यह मेहनत करते किसान की दुविधा में उकेरी गई लकीर है जिससे किसान आपदा की शंका मन में पाले हुए हैं ।यह भी कितनी बड़ी विडम्बना है कि किसान का मन श्रम करते हुए भी आग ,पानी, हवा ,तूफान और आंधी की आशंका से ग्रस्त हैं । आग उसकी मेहनत को जला सकती है ।यह आशंका जनित भय की संभावना में फसल को उगाना है । जहां फसल से फायदा कम और नुकसान का डर ज्यादा हर वक्त सताता रहता है । यदि फसल आग से जल गई तो किसान के मन में जागी उम्मीद भी खत्म हो जाती है ।उसका कर्ज ,उसके बच्चों का पालन ,उसकी कुटिया – झोपड़ी का छप्पर , गाय – भैंस की खरीद का मिजान ,मां – पिता और परिवार के बुजुर्गों का इलाज सब बिखर जायेगा । इसीलिए उसको पसीना आता है ।ढेरों चिन्ताएं मन में उभरने लगती है ।चिन्ता ग्रस्त मन विकल होता है ।जरा सी भी भय की लकीर मन को अशांत कर देती है ।यह चिन्ता किसान किसी से साझा नहीं कर सकता ? इसीलिए वह बच्चों के पास आकर हरी मेड़ पर रुकता है । यहां हरी मेड़ भविष्य का सुरक्षित होने का संकेत भी देती है ।किसान राहत में है तो दुनिया जहान भी राहत और सुकून में है । किसान का दुख समाज का दुख में होना है । इन दशाओं पर समाज और राष्ट्र को चिन्ता भी करना चाहिए और गंभीरता से विचार भी करना होगा ।
विनीता रघुवंशी
