Home आकार लेती यात्राएंसतपुड़़ा की दोपहर-आकार लेती यात्राएं

सतपुड़़ा की दोपहर-आकार लेती यात्राएं

by Dr. Vinita Raghuvanshi

सतपुड़़ा की दोपहर
****************
मेहनत में जुटा
निष्काम कर्मयोगी
पर्वत शिखर पर
भाल का पसीना पोंछ
मकोई की छांव तले
सूखी झरबेरी के बुरके से
बाटियां खाने बैठ गया
चाटने लगा कबीर की चटनी
जिसे सारा वन
ठगा ठिठका सा
मुंह में लार बनाता
दो क्षण सांसें रोके देखने लगा — और भरने लगा
उष्मायित वातावरण दिशाओं में
जिन्हें देख — जमुहा उठे कान्तार
तन्द्रालस हो गई दन्तेश्वरी
पसीने की महक और
दोस्त किरणों से
हो उठा सारा अरण्य मुखर
सतपुड़ा की दोपहर !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
सतपुड़ा की सुबह जिस तरह प्राकृतिक रुप से सुहानी और कर्मरत है ।वैसे ही सतपुड़ा की दोपहर भी भाल पर पसीने की बूंदों की लड़ियां सजाये काम में डूबी है ।सतपुड़ा की दोपहर में थक कर चूर हुए किसान का भोजन और भोजन में कबीट की चटनी का स्वाद पूरे अंचल को रसमय बना देता है ।किसान के भोजन में सुस्वादु है तो कबीर की चटनी जो पूरे अंचल को ललचाती है। जंगल में जो उष्मा की बयार है वह चटनी के स्वाद को ललचाती जन वन की गर्म सांसें हैं ।जो जन मन और वन वासी। उसांसे ले रहे हैं उसी से जंगल गर्म हो गया है ।यह कल्पना भी बहुत अनूठी है ।किसान और खेत मजदूर के लिए छांह का स्थान भी बस मकोई की फसल की ही है । ऊष्मा से भरी सांसें पूरे सतपुड़ा को तन्द्रालस किये हुए हैं ।सतपुड़ा की वनदेवी दन्तेश्वरी भी तन्द्रा में डूबी हुई है । चारों दिशाएं भी गरमी की ताप में डूबी हुई है ।पूरा सतपुड़ा अंचल कर्म में डूबे पसीने की महक से सराबोर है सूरज की किरणें मित्र बनी अंचल को मुखर बना रही है ।सूरज जितना जितना तप रहा है उतना ही श्रम और मेहनत महक रही है । सतपुड़ा अंचल की विशेषता ही है श्रम रत रहना ।आज अंचल में किसान तीन बार फसल ले कर खुशहाल हैं । सतपुड़ा उसी तरह गर्मी से तप रहा है और अपनी स्वतंत्र अभिव्यक्ति और अनुभूति के साथ आबाद है । सतपुड़ा है तो उसके अन्तःस्त्रावी नर्मदा भी है ।नर्मदा अपने मातृत्व से अंचल को सरसब्ज बनाए हुए हैं ।सतपुड़ा पर्वत निष्काम योगी है जिसके पास कामना नहीं कर्म की अजस्र धारा बह रही है ।यही तो है सतपुड़ा की दोपहर जहां लोक संस्कृति के विविध रूप निसृत हो रहे हैं । सृजन लोक को रचता – आकार लेता सतपुड़ा अंचल की पसीने की महक को बिखेरती दोपहर का आत्मीय नजारा और मंजर ।
सतपुड़ा की दोपहर ।
🙏 विनीता रघुवंशी

You may also like

Leave a Comment

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More