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दाढों के बीच-आकार लेती यात्राएं

by Dr. Vinita Raghuvanshi
दाढों के बीच
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गल्ले की खाली कोठी में
चिपके रहे गये दाने
खेत में जाने के लिए मचले
पर उसने
उनकी इस मचलती जीजिविषा को
डाल लिया मुंह में
अब मैं खेतों को क्या जवाब दूं ?
सोने की जरतारियां चमकाती
गेहूं की बालियां
उसकी वहशी दाढ़ों के बीच
पिस रही हैं !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- “ आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
शोषण के वैविध्य के बीच यह अहसास पैदा होना कि शोषण के तरीके से युवाओं का ,बीज बनती पीढ़ी का उन्नयन एकाएक रुक जाना कितना भयावह होता है । गेहूं के दाने इसी अहसास का बिम्ब रचते हैं । गेहूं के दानों की उमंग किस तरह फसल बन कर लहलहाने से रोक दी जाती है ।यह दाढ़ों के बीच पिसने की विस्मय कारी पीड़ा है ।जो गल्ले को फसल नहीं बनने दे रही है ।सच है जो फसल नहीं बन पाये उन बीजों का ,उन गेहूं के दानों के सवालों का जवाब क्या हो सकता है ।यहां गेहूं के दानों को उस युवा पीढ़ी का प्रतीक भी समझा जा सकता है जिसके उमंग ,उत्साह को दिग्भ्रमित करके उर्वरता छीन ली गयी हो ।जिसके सपनों को तोड़ – मरोड़ दिया गया हो । जिसे खिलने और खुलने से पहले ही मायूसी के दलदल में डाल दिया हो ।यह सपने तोड़ने का खेल धनपति और सत्ता में बैठे राजनेताओं का मन पसंद खेल है ।सत्ता सदैव स्वार्थी होती है ।वह चाहे राजनीतिक हो , व्यापारियों की हो ,धर्म और अध्यात्म की हो , वह चाहे सामाजिक हो या आर्थिक सत्ता हो हर हमेशा वह कुछ सेवक ,कुछ चाटुकार,कुछ अधिकारी वर्ग के हाथों में नये – नये करतब रचती रहती है ।यह गल्ले की कोठी भी उसी सत्ता की उसी साजिश का खुलासा कर रही है ।गल्ले की कोठी में जो गेहूं के दाने चिपके रहे उन्हें खेत तक जाने से रोकना और मुंह में डाल लेना एक भरपूर साजिश का संकेत ही है ।शोषण करती सत्ता हमेशा चालाक होती है वह योग्यता और पात्र युवाओं को अपने मुंह में चुभलाती है ।वह उनके रास्ते में प्रलोभन के सिक्के पटकती चलती है ।झूठे सपनों और संकल्पों का झांसा देती रहती है और इस तरह युवा पीढ़ी को भ्रमित करके अपने अनुकूल इस्तेमाल करती हैं ।यह है गेहूं के दानों को मुंह में डाल लेना ।यही तो है वह षड्यंत्र जो युवा पीढ़ी की वास्तविक शक्ति को अपनी दाढ़ों में फंसा लेने जैसा घोर तम अन्याय । यहां युवा की प्रतिभा ,योग्यता ,पात्रता ,काबिलियत को राष्ट्र के प्रति समर्पित नहीं करके उसे धर्म रत मानकर झौंक देना यह युवा पीढ़ी के साथ किया गया धोखा ही है ।यह एक बड़ा सवाल है जिसे सुलझाया ही जाना चाहिए । युवाओं को दल ,संघ ,या राष्ट्र धर्म की रक्षा का पाखंड हो या हिन्दु धर्म के रक्षक बनने की कवायद और अग्निवीर की कलेजा चाट जैसी योजनाएं हों ,या बेरोजगारी की चक्की हो , या धर्म के खतरे में पड़ जाने का झूठा प्रचार हो ये सब गल्ले की कोठी में चिपके रहे गये गल्ले के दानों का वहशी दाढों के बीच पिसने की ही तरकीबें हैं ।इन युवाओं की जीजिविषा को ,जीने की इच्छा को जड़ से ही खतम कर दिया गया हो वहां उनके सुनहरी बालियों में उगने के ,खिलने की उम्मीद मनसूबे तो पहले ही नष्ट कर दी गई हैं ।अब युवाओं के लिए बचा ही क्या है ? यह एक गहरा संकेत है ।युवा पीढ़ी की फसल तो पहले ही असफल हो गयी ।युवा आज अपनी हसरतों के साथ बूढ़े हो रहे हैं ।उनकी हसरतों ,कामना ,आशा ,उम्मीद सब सत्ता की वहशी दाढ़ों के बीच दबा दी गई हैं । आज राष्ट्र सवाल पूछ रहा है ।खेत राष्ट्र का प्रतीक बनकर उभरा है ? राष्ट्र अपनी युवा पीढ़ी को खोज रहा है लेकिन वह तो शोषण की दाढ़ों में पीसी जा रही है ।इन दाढ़ों में नशा है ,नफरत है , फसाद है , दंगा है , अन्याय है , बेरोज़गारी है , संवैधानिक अधिकारों के हनन का कूड़ा है , आरक्षण का कचरा है , निजीकरण की धूम है , अमीरी का भ्रष्टाचार है , राजनीति में धनतंत्र का बोल बाला है , मतदान बिकाऊ है , इन सब के बीच फंसा युवा आशा विहीन भाग रहा है ।वह बचना चाहता है लेकिन शोषण की दाढ़ें इतनी मजबूत और सख्त वहशी हैं हैं कि बच निकलना बहुत मुश्किल है । अब युवा को ही जागना होगा तब ही वह इन वहशी दांतों से बच सकता है । 🙏 विनीता रघुवंशी

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