Home आज की कविताआंगन-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

आंगन-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by Dr. Vinita Raghuvanshi

आंगन
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( ६ )
घर के भाल का पसीना पोंछने
आतुर है आंगन
हरेक कारें का
गमकता उत्सव है आंगन
गांव की आह कराह का
बंटाईदार है आंगन
अब भी नेह में भींगा
खुला आकाश है आंगन ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत )
आंगन बुजुर्ग पीढ़ी की दायित्व भरी हसरतों से भरा – पूरा है । इसीलिए वह अपने घर – परिवार की सभी चिन्ताओं को भी अपने कंधों पर महसूस करता है ।घर की हर चिन्ता चाहे वह भूख की हो या रोजगार की हो ,प्रवास की हो या परदेस की हो , अतिथि के आगमन की हो या विदाई की , भोजन की हो या इंतजाम की , जन्म की हो मृत्यु की , हर समस्या के साथ जुड़ा होता है आंगन ।आंगन है तो घर – परिवार का हर छोटा – मोटा काम भी उत्सव की तरह महत्वपूर्ण हो जाता है ‌।घर का ,पड़ोस का हर व्यक्ति पूरे उत्साह और उमंग के साथ काम में जुट जाता है । छोटी से छोटी पूजा – पाठ ,क्रिया – काण्ड,कथा , कुआं पूजन ,सोहर सब ढोल मंजीरे की थाप से आंगन को चहका देते हैं ।यही तो आंगन का उत्साह और खुले पन का अहसास है जो आदमी को अलहदा नहीं रहने देता सबको सबसे घुला मिला देता है । आंगन है तो गांव की हर व्यथा , हर दुख- सुख , बीमारी- वेदना का अहसास आंगन में आकर अपनी पीड़ा को उंडेल देने का अपनापन , आत्मीयता से साझीदार होता है आंगन ।आंगन है तो अड़ोस – पड़ोस ,घर – परिवार ,अपने – पराये स्वजन में स्नेह का धागा नमी से बंधा रहता है —“रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ों चटकाय,टूटे से फिर न जुड़े ,जुड़े तो गांठ पड़ी जाय ।” इस सूत्र पर टिके होते हैं आंगन के बंधन । आंगन है तो पराये भी अपने बन जाते हैं क्योंकि यही तो खुलापन है धरती और आकाश का ।कौन नहीं मानता आकाश को अपना या धरती को कौन कहता है कि धरती उसका पालन – पोषण मां की तरह नहीं करती ।जब धरती और आकाश करीब नहीं होते तो करीब और नजदीक होता है आंगन । स्नेह में डूबा प्यार से लबरेज, उदारता से दमकता हर एक के दिल में समाया और हर एक पर भरोसा जताता आंगन सब के मन आकाश को विस्तीर्ण फलक तक पहुंचा देता है । यही तो घर के आंगन की विशेषता है वह एक का होकर भी सबको अपने में समेट लेता है ।आंगन का खुलापन हृदय का भी खुले होने का भरोसा होता है ।वह मुखिया की उदारता का प्रमाण है । जहां स्नेह के बंधन की अनुभूति आकर अपना मन में बंधा प्रेम स्वत: ही खोल देती हैं । यह है आंगन की आत्मानुभूति जो हर वक्त घर आंगन के भाल के पसीने को पोंछने को व्याकुल होती है ।मन – मुटाव वहां बहुत समय तक स्थिर नहीं रहते ।मन की गांठें भी सहज ही खुल जाती है ।मन की हर बेचैनी आंगन में सुकून तलाशती है । बातें राई का पर्वत नहीं वरन पर्वत सी कठोर बातें भी राई सी छोटी और मामूली हो जाती है । यह है आंगन का चमत्कार । खुलापन हर हमेशा आनंद दायक होता है । हर आंनद की एक मर्यादा भी होती है ।आंगन चाहे जितना खुला हो पर आंगन की भी चौहद्दी होती है ।यही आंगन की मर्यादा भी है ,आने- जाने वाले की पहचान और हैसियत बहुत मायने आती है ।भरोसा बनाती जान – पहचान का स्वागत और भरोसा तोड़ते आगत की विदाई । यही है आंगन की खासियत ।
🙏 विनीता रघुवंशी

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