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हर शब्द-पहाड़ों के बीच

by Dr. Vinita Raghuvanshi
हर शब्द
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हर शब्द
एक मुस्लिम सफर है
स्याह और ठोस चट्टानों से
ध्रुवान्तों की बर्फीली चोटियों तक !
हर शब्द
एक लक्ष्य भेदी बाण है
कमान से छूटा
पेड़ पर बैठी चिड़ीया की आंख से
मैदानों ,पहाड़ों और क्षितिजों तक ! !
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-“ पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत)
आज की कविता में शब्दों के महत्व पर विचार किया गया है ।शब्द ब्रह्म है ।शब्द अक्षर हैं ।ये कभी न तो घिसते हैं न झरते हैं न इनका क्षरण ही होता है ये कभी नष्ट भी नहीं होते । इसीलिए ये ब्रह्म है । शब्द स्वर – व्यंजन और ध्वनि का वह मिला जुला रुप है जो हर समय पृथ्वी के ओर -छोर में गुंजित होता रहता है । यह जब मन की कोरे पटल पर लिख दिया जाता है ।कह दिया जाता है या अनुभूत कर लिया जाता है तो यह अमिट हो जाता है । इसीलिए वाणी के संयम की बहुत सारी बारिकियां हमारे शास्त्रों में, पुराणों में ,उपनिषदों में कही गई है । ऐसे बहुत सारे प्रमाण भी ब्रह्माण्ड से खोजे जा रहें हैं कि मनुष्य की सबसे पहली भाषा का पहला शब्द क्या रहा होगा ? मनुष्य की भाषा का रुप क्या रहा होगा ? या मनुष्य ने बोलना कैसे सीखा – जाना ? सबसे पहले किस शब्द का उच्चारण किया होगा ?पूर्व काल में मनुष्य की अभिव्यक्ति का स्वरुप क्या होगा ? आदमी किस तरह बातचीत या संवाद करता होगा ? यह सब खोज और शोध के विषय आज भी बने हुए हैं । लेकिन आज मनुष्य को यह तो समझना ही होगा कि बहुत सारी तकनीकी तरक्की के बाद भी आदमी अपनी बौध्दिक, चेतना, विचार की उसी प्राकृतिक अवस्था में है क्योंकि वह भाषा का संस्कार समाज से ग्रहण करता है और समाज की विकृतियों का प्रभाव उसके दैनिक आचरण, सामाजिक अनुशासन के विकृत अथवा सुसंस्कृत जीवन शैली का परिणाम होते हैं । आदमी की भाषा में इस्तेमाल होने वाले शब्द अपने सामाजिक संस्कारों ,धारणाओं , आस्थाओं का ही नतीजा होते हैं ।हर शब्द जो हम तक आता है याने भाषा के रुप में हमारी अभिव्यक्ति का माध्यम बनता है वह सब शब्द की यात्रा ही होती है ।शब्द का मूल रुप धातु होता है और धातु में परसर्ग ,उपसर्ग, प्रत्यय,संज्ञा,सर्वनाम आदि जुड़कर उसे शब्द रुप में ढालते हैं ।यह शब्द का शास्त्रीय सफर है लेकिन शब्द समाज के बीच से उभरता है ।जिन स्थितियों में समाज जीता है ।जीवित रह कर संघर्ष करता है या सुकून भरा समय व्यतीत करता है उन्हीं परिस्थितियों से शब्द अपने अर्थ और संदर्भ गढ़ता है ।कभी कभी कोई शब्द वर्तमान स्थितियों के कारण प्रयोग की भूमिका में नहीं रहता याने उसका इस्तेमाल समाज नहीं करता किन्तु वह शब्द हर समय मौजूद रहता है ।वह लोक कोश ,शब्द कोश ,भाषा की धरोहर जरुर बना रहता है ।शब्द हर समय हर जगह उपस्थित हैं भले उसका उपयोग अभिव्यक्ति के माध्यम रुप में ना हो रहा हो ।जो भी शब्द आदमी उच्चरित करता है उसकी ध्वनि हर हमेशा गुंजायमान रहती है । इसीलिए हमारे यहां ऋषि – मुनियों ने हर समय यह ताकीद दी है कि जब भी वचन अथवा वाणी का उपयोग किया जाये तब मुख से अच्छे शब्द ही बोले जायें ।वाणी का संयम विचारों की विकृति को भी संयमित करता है । मनुष्य के मुख से निकले अच्छे वचन आदमी के पारस्परिक संबंधों को भी संतुलित करता है ।आदमी के स्वार्थ ,द्वेष, ईर्ष्या ,क्रोध, लालच,लालसा को भी संयमित करता है । यह वाणी – संयम वैचारिक भाव जगत को भी शुध्द और मनोविकार रहित बनाता है ।यदि समाज प्रेम से भरे मीठे बोल वचन का प्रयोग करेगा तो समाज में हिंसक वातावरण की जुगुप्सा नहीं फैलेगी ।यदि समाज में नफरत ,कटुता ,द्वेष और स्वार्थ के शब्द गूंजेंगे तो समाज हर हमेशा घृणा के माहौल में ही सांस -प्रश्वांस लेता रहेगा । शब्द तीर की तरह गहरी मार करते हैं ।यह आदमी के भीतर गहरे बैठ कर मर्म पर चोट करते हैं जो आदमी के अस्तित्व को आहत और घायल करते हैं और यदि स्नेह भरे हों तो मरहम का कार्य भी करते हैं । इसलिए भाषा का इस्तेमाल करते समय सचेत रहना चाहिए कि हम जब कुछ बोल रहे हैं तो यह अनुमान और अनुभूत जरुर कर लेना चाहिए कि इनका असर किस रुप में होगा ये घाव देंगे या मरहम लगायेंगे । यह भाषा के प्रयोक्ता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है ।आदमी को कोशिश यह करना चाहिए कि वह जब भी भाषा का इस्तेमाल करें तब शब्द प्रेममय हो कटुता जहर के समान प्राण हर लेने वाली होती है । भाषा का हर शब्द चेतना वान होता है मनुष्य को अपनी चेतना का उपयोग शब्द चुनते समय अवश्य करना चाहिए ।विचार और चिन्तन ही वह शब्द शक्ति है जो आदमी आदमी के साथ वापर सकता है । आदमी के शब्द ही उसके प्रियता और अप्रियता की वजह बनते हैं ।शब्द सावधानी से बरतना चाहिए ।यही है शब्द की यात्रा । आदमी आदमी को समीप ला खड़ा करे ऐसे ही शब्द समाज में दीर्घकाल तक जीवित रहे याने प्रचलन में रहे । नफरत के शब्द कभी प्रचलन में न बने रहे यही मनुष्य समाज का सार्थक प्रयास भाषा -शब्द का निरंतर सफर हो । “रहिमन जिव्हा बावरी ,कह ग ई सरग पताल ।आप तो कह भीतर गई,जूती खाय कपार “।। 🙏विनीता रघुवंशी

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