Home आज की कवितामेघ विवेकानंद हैं-पहाड़ों के बीच

मेघ विवेकानंद हैं-पहाड़ों के बीच

by Dr. Vinita Raghuvanshi
मेघ विवेकानंद हैं
***************
तिथि ,दिन या मूहूर्त की
घोषणा किये बगैर
बिना किसी यक्ष संदेश के इधर आओ
अपनी कौंधों के साथ
डायनामाइट की दन्नाहट लिए
ताकि शयनागारों में लेटी
लिजलिजी भाषा के अभ्यस्त कानों में
तुम्हारे नगाड़ों की ध्वनियां उतर सकें
स्वर्ण पताकाओं के झांकते
स्याह शब्दों के
आतंकवादी इरादों पर
गाज गिराते हुए
भूखों के पास
रोटी का धर्म लेकर पहुंचो
इधर न तो कोई घनानंद है
न सुजान
कि जिनके प्रणय -व्यापारों में उलझ कर तुम
एक लम्बा अर्सा रसिक -दर्शन में ही बिता सको !
अपनी छाती पर
उस वक्त लिए ही तो
ढो रही है धरती
पहाड़ों का बोझ
कि जब जब भी तुम उस पर उतरो
तब तब वे पहाड़
आकाश मार्ग से ही तुम्हारा स्वागत करते चलें
अंधे फोड़ों की तरह
भीतर ही भीतर
टीसते दर्द पर
तुम्हारे परस से
कितने कितने दरिया द्रवित हो उठते हैं
कि जिनके अहसास से
छंट जाती है नदियों की रतौंधी
दिशा – दिशा तैरते
रचते हुए इंद्रधनुष
पहाड़ों के स्वागत भाव से गदगद
मेघ विवेकानंद हैं
जिन्हें
हरेक अभाव के ऊपर बरसने की
एकमात्र चिन्ता
लगी रहती है सदैव ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-“ पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत)
आज की कविता में मेघों को बरसने का निर्देश नहीं वरन आदेश सा दिया है रचनाकार ने यों तो महाकवि कालिदास ने मेघों से राज नल नल की प्रिया दमयंती के संदेश देने की अनुनय विनय मिलती है ।स्वछंद धारा के महाकवि घनानंद भी सुजान के आंगन में अपने आंसुओं को मेघों के माध्यम से बरसाना चाहते हैं लेकिन इस कविता में मेघों को स्पष्ट आदेश है कि तुम वहां उतरो जहां दर्द के दरिया है । जहां दर्द की टीस भीतर ही भीतर समाई हुई है ।तुम अपने कर्म का धर्म मत भूलो क्योंकि तुम तो हरेक अभाव पर बरसने का संकल्प और चिन्ता लिये हो ।
कविता में संदर्भ बहुत से प्रयुक्त किये हैं लेकिन मकसद एक ही है विचार को जगाने का हर व्यक्ति के भीतर अपने आसपास की अव्यवस्था को समझने का , महसूस करने का । तिथि ,दिन, या मूहूर्त की घोषणा की जरुरत नही है किसी की भलाई या परोपकार करने के लिए । इसलिए इधर आओ ! अपनी कौंधों के साथ ।जो सत्ता रंगमहल में सत्ता सुख भोग रही है उसे कोमल संवादों से इतर सच्चाई के कटु शब्दों के कर्कश स्वर सुनाये जायें ।मेघ के समान जनता के नाद का घनघोर स्वर जब कानों के पर्दे फाड़ दे ।उस तरह मेघ बजें ।यह आवाज आक्रोश की आवाज है जो रचना में अन्तर लय बनकर उभरी है ।यह पंक्ति तंज भरी है जहां कहा जा रहा है —” स्वर्ण पताकाओं में झांकते /स्याह शब्दों के/ आतंकवादी इरादों पर / गाज गिराते हुए “
यह सत्ता जिस आतंक और हिंसा के मंजर समाज में फैला रही है वह कुछ नहीं वह भूख का आकार है जो समाज खुद ही खुद को नष्ट कर रहा है । इसलिए जब समाज में हर हाथ को रोजगार और हर हाथ को काम मिलेगा तब यह आतंकवाद भी स्वत: खतम हो जायेगा ।क्योंकि सच्चा धर्म तो भूखों के लिए रोटी का धर्म है जो दान से नहीं पहुचाया जा सकता वह तो रोजगार देकर ही मिटाया जा सकता है ।हर व्यक्ति जब रोजगार वान होगा तब ही समाज से भूख का साम्राज्य नष्ट होगा ।यह भी कितनी मनमोहक कल्पना है कि धरती पर पहाड़ है ही इसलिए कि वे मेघों का ,बादलों का स्वागत कर सकें । जब जब भी मेघ बरसते हैं तब तब न जाने कितनों के दुःख करुणा की द्रवण शीलता में दरिया में तब्दील हो जाते हैं । नदियां अपनी पतली धारा रुपी देह को छोड़कर फिर से अपने रुप को पा जाती हैं ।यह है मेघ का आनन्द ।मेघ चंचल है नभ की हर दिशा में वे तैरते हुए वे इन्द्र धनुष रचते रहते हैं ।मेघ तो गदगद होते हैं पहाड़ों के स्वागत भाव से यह है मेघों की कृपा का भाव।मेघों में चिन्ता है सब के अभाव दूर करने की ।यही तो विवेक और आनंद है मेघों का । इसीलिए तो घनानंद ने कहा है –“परकाज ही देह को धारे फिरो ,परजन्य जथारथ दरसो कभी मेरे अंसुवान को सुजान के आंगन ले बरसो ।” यहीं तो पीड़ा का बोध है ।मेघ तो हर बरस और हर जगह बस पर दुखकातर भाव से अभाव को स्वभाव में बदलते रहते हैं ‌यह सीधी बात मेघ को विवेकवान दर्शाया गया है ।मेघ हर दफे दुख को मिटाने ही धरती पर उमड़े आते हैं। वे न तो प्रिया के संदेश वाहक हैं न वे सुजान के विरह और प्रेम के रसिक हैं और न वे केवल गर्जन तर्जन के ही घोषणा वीर हैं वे तो चिन्ता कुल बने हर अभाव को दूर करने के लिए बरसने वाले हैं ।परोपकार और परहित ही विवेक मय आनंद है ।यहीं मेघ का वास्तविक स्वरुप है । 🙏विनीता रघुवंशी

You may also like

Leave a Comment

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More