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जिन्दगी
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जिन्दगी जैसी कोई चीज
मेरे पास आई
बोली –मुझे छुओ
अपना क्या
अपना तो छूने का लम्बा इतिहास है
पत्थर को छुएं तो लहरीली नदिया हो जाये
उससे रिसने लगे कविताएं
इसलिए उसे –जी भरकर छुआ खूब
तब कहा उसने यों
“देखोगे नहीं मुझे “
कहां मैंने — क्यों नहीं —जिसको भी देखा है
दृष्टि ताटंक से खिंचा चला आया वह – – –
बोली वह –फिर से जियो मुझे
मैंने शुरु किया जीना जैसे ही
तो मैं वहां था —दिक्कतों के बीच हातिमताई होते हुए
इधर पानी तेजाब था
हर सुख पहाड़
सहानुभूति कांटों की बागुड़ और
प्यार नफरत का संसार
फिर भी इन सबके बीच
जीना शुरु किया उसे
समय को रेशा – रेशा करते हुए – – –
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-“ पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत)
आज की कविता जिन्दगी की आसानी और कठिनाई के मिजाज की अभिव्यक्ति है ।दुनिया में आया हर इंसान जिन्दगी को बड़ी आसानी से गुजारना चाहता है ।वह कोशिश करता है कि उसकी जिन्दगी में कुछ भी असमतल और असहज ना गुजरे ।बस वह जैसा आया है बिना मेहनत बिना कुछ तकलीफ़ ,बिना कुछ कष्ट उठाये सब कुछ मिलता जाये ।बिल्कुल कल्प वृक्ष से कहा ,इच्छा बताई और वह पूर्ण हो जाये ।बिना कर्म किये ,बिना कठिन श्रम किये ।हवा में हाथ हिलाया और सब कुछ हासिल हो जाये ।सब कुछ आसान हो जाये ।पर जिन्दगी सपना नहीं होती,हां यह सच है कि जिन्दगी में स्वप्न जरुर होते हैं ।उन स्वप्नों को ,इच्छाओं को ,कामनाओं ,हसरतों को पाने के लिए आदमी को जिन्दगी दांव पर लगानी पड़ती है ।जोखिम उठानी पड़ती है और जिन्दगी को खतरों में डालना पड़ता है ।यह खतरों से गुजरती ,कष्टों के पहाड़ उठाती जिन्दगी ही वास्तविक जिन्दगी है ।आदमी ही धरती की वह ताकत है जिसने अपनी मेहनत से धरती पर नदियों की लहरें पैदा की ।आदमी ही वह ताकत है जिसने अपनी तपस्या से अपनी दृष्टि में आकर्षण पैदा किया जिससे धरती अपनी सात सतहों के भेद खोलकर आदमी के सामने प्रकट हो गयी ।यह आदमी की दृष्टि का चमत्कार ही तो था यह वह लोक-मंगल की दृष्टि थी जो असाधारण थी ? यदि दृष्टि में लोक कल्याण और लोक मंगल का भाव नहीं होता तो धरती भी रहस्यमय बनी रहती ।सचमुच जिन्दगी एक अबूझ पहेली है जिसे यदि बिना छुए,बिना जिये,बिना ठीक से देखे गुजारने की कोशिश की जाये तो फिर जिन्दगी का मिजाज अनजाना रह जाता है ।फिर उसमें से सृजन की किरणें नहीं फूटती ।उसमें से भाव और विचार की नवीन उद्भावनाओं का सिलसिला नहीं निकलता ।जिन्दगी का असल अहसास तो समन्दर की भांति होता है जहां सुख के ज्वार हैं तो दुख के भाटे भी हैं ।पग पग पर सुख है तो पग पग पर दुख के झकोले भी हैं । जिन्दगी से संवाद या बातचीत भी बड़ी ही रोचक है ।बिल्कुल जिन्दगी के भीतर से अनुभूति का स्पन्दन उठाती ।जिन्दगी के बीच से होकर गुजरना वैसा ही है जैसा हातिमताई की समुद्री यात्राओं के किस्से पढ़ें और सुनें जाते हैं ।जब जीवन को ठीक से व्यतीत करने की चेतना और चेष्टा की जाती है तो आदमी के सामने हजारों दिक्कतें खड़ी होती है ।हजारों समस्या रास्ता रोके होती हैं।इन सब के बीच से एक राह बनाने की चेतना और विचार ही वह रेशा है जिसमें समय गुंजा हुआ है । मनुष्य के चारों ओर प्यार और नफरत के मंजर हैं जिन्हें समय का बोध और समझ की चेतना के साथ समन्वित करना होता है । हर आदमी को जीवन के घोर कष्टों का दिक्कतों का सामना करना ही होता है ।समाज भी इन कष्टों के प्रति दयावान या सहानुभूति की निगाह नहीं रखता । हां यह बात तय है कि वह कठिनाई के सामने आदमी का हौंसला ,साहस,और दृढ़ता को टूटने नहीं देता ।यह हौंसला अफजाई ही आदमी की जिन्दगी के लिए संघर्ष को कमजोर नहीं होने देती ।हर एक इंसान को जिन्दगी की इस आग की तपिश को सहना ही पड़ता है ।तब ही उसके जीवन में कुन्दन से खरे पन की दमक उभरती है ।आदमी की पहचान भी यही दमक ।यहीं आभा ही होती है ।यहीं खरापन उसकी असल पहचान होती है ।जिन्दगी के संघर्षों को ,उसके कष्टों का सामना करना ही हातिमताई होना है ।आदमी के जीवन संघर्ष ही सात समुद्र की यात्रा,सात परतों की धरती में धंसना और सात आसमान के इन्द्रधनुष के रचाव में सतरंगे संसार का सत्य विद्यमान है ।
विनीता रघुवंशी
