Home आज की कवितासारी रात-पहाड़ों के बीच

सारी रात-पहाड़ों के बीच

by Dr. Vinita Raghuvanshi
सारी रात
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बड़े बड़े यंत्रों के स्वरों से
कांप -कांप उठता है —मेरा हृदय
सदैव यही लग रहा है कि मैं
अब नहीं तो अब किसी न किसी
टृक से कुचला जाऊंगा
या कूद पड़ूंगा अपने घर की छत से
भीड़ से दूर जब कभी
अकेले घूमता हूं
पीछे पीछे चलता है एक विद्रूप
जिसकी वजह जोर जोर से गाते हुए
लौट आता हूं शहर के भीतर
उस घरनुमा चीज की चहार दीवारी में
जहां सन्नाटे और शोर की जंग
बराबर जारी रहती है ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता में आधुनिक जीवन शैली से उपजी आशंका और धुकधुकी की मनोदशा का भाव समाहित है ।आदमी जिस तरह की जीवन शैली में कैद हो चुका है उसने उसे संतप्त ही किया है ।शहर की अजनबी समाज व्यवस्था आदमी को हर समय अकेलापन और बाहरी शोर से भर देती है ।हर समय वह संशय में जीता है कि सड़क पर चलते हुए या घूमते हुए उसके आसपास खतरे मंडरा रहे हैं ।वह अब बच गया तो फिर किसी हादसे में मरना उसका तय है ।शहर ,नगर, महानगर कोई भी जगह हो कैसी भी अवस्था या दशा हो एक मौत का खौफ हर समय आदमी के पीछे पीछे चल रहा है ।आज की जीवन शैली में आदमी के भीतर मृत्यु भय समा चुका है ।वह हर वक्त इस भय में सांस लेता है कि वह इस दफे बच गया ? यहीं आत्म संतोष है ? आदमी के साथ कभी भी कुछ भी हादसा हो सकता है ।वह यदि सुरक्षित है तो बस केवल घर जैसी चार दीवारी में ही जहां बसा है सन्नाटा ?जहां बसा है मन में भरा शोर ? जहां नितान्त अकेलापन है ? जिसका कोई साझीदार नहीं क्योंकि शहर ,नगर ,महानगर में आजीविका के लिए निकलता आदमी मृत्यु तुल्य अहसास से रोज ब रोज आमना सामना करता है ।हर वक्त वह परिवहन और यातायात के शोर को सहता है ।इन सबके बीच से हर बार वह सावधानी से जीवन को बचा ले जाता है । यह है आधुनिक जीवन शैली के भीतर मृत्यु भय ।इसका सामना हर शख्स को अपनी दिनचर्या में शामिल कर ही लेना होता है ।जब आदमी रोज रोज समान जीवन स्थितियों के बीच से गुजरेगा तो उसकी मनोदशा किस तरह भयभीत होगी इसका अनुमान करना सहज नहीं है ।यह आधुनिक जीवन स्थितियों अकेले में भी सहज नहीं होने देती है मन में लगातार हादसे का भय मन को आत्मा को अस्थिर किये रहता है ।अपने अकेले पन की उदासी ,अपने अनुभव को न बांट पाने की जो व्यथा है वह आदमी खुद गीत गाकर उस मनोभाव से मुक्त होने की कोशिश करता है ? क्या आधुनिकता इस सबके लिए ही स्वीकार्य करना होगी ।क्योंकि जिस किसी से अनुभव और अनुभूति को साझा किया जाये वह भी अपने अनुभव की तालिका सुनाने लगेगा और रोजमर्रा की बात कहकर उस मन: स्थिति से कन्नी काट जायेगा ।क्योंकि वह भी उन स्थितियों से कांपा हुआ है ।भय उसके भी भीतर समाया हुआ है वह भी उससे बचने के उपाय तलाश रहा होता है । लेकिन बच पाना असंभव है ? यह संताप आधुनिक जीवन शैली का परिणाम है जहां चारों ओर यांत्रिक शोर ,मृत्यु का दर्द और दर्दनाक मृत्यु हर पल अपना दुष्चक्र लिए घूम रही है ।यह अनुभूति और अनुभव इतना गहरा होकर कविता में उभरा है कि जिससे कन्नी नहीं काटी जा सकती ।यह तो आदमी के चारों तरफ मौत का साया घूम रहा है ।अब जीवन में मृत्यु का वह सम्मान नहीं बचा जो आदमी की आत्मा को व्यथित और चेतना को संतप्त करता था ।अब हादसे ,घटनाएं होती हैं और आदमी बेबस सा उसके सदमे को चुपचाप नियति मानकर सह जाता है ।यही आज की हकीकत है ।यही आदमी के आसपास मंडराता यथार्थ है ।यह जीवन नही जीवन का बिगड़ा हुआ रुप है ।जिसे आदमी जिन्दगी मानकर जी रहा है । कविता यथार्थ को व्यक्त करने में पूर्णतः समर्थ है । 🙏विनीता रघुवंशी

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