Home आज की कविताशकुन विचार-पहाड़ों के बीच

शकुन विचार-पहाड़ों के बीच

by Dr. Vinita Raghuvanshi
शकुन विचार
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घर से निकलते ही
दिखी सड़क पर
बछड़े को दूध पिलाती गाय
चार कदम आगे
गुत्थम गुत्था होकर खेल रहे पिल्ले
और सामने
नीम पर बैठा कौओं का जोड़ा
खुजला रहे हैं जो — अपनी अपनी चोंच से
एक दूसरे के डैने
क्या कहने ? —-
आज निश्चय ही
कोई बढ़िया खबर आने वाली है
चलो ,अब उस पार्क में चलकर
कुछ देर
गिलहरियों की उछल कूद देखते हुए
उसकी प्रतीक्षा करें !
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता में जीवन में बसी एकरसता और उदासी से भरे सूनेपन को खुश खबरी की प्रतीक्षा से भरते हुए पोंछने की कोशिश है । आधुनिकता ने आदमी को जिस तरह गति के तनाव और भावनात्मक रिक्तता से भर दिया है उससे बाहर आने के लिए आदमी शकुन विचार पर ध्यान देता है ।हमारी संस्कृति में शकुन और अपशकुन पर बहुत गहराई से विचार किया जाता है ।घर से निकलते समय यदि सिर पर घड़ा लिए कोई सुहागिन मिल जाये तो यह यात्री के लिए शुभ शगुन है ,घर की छत या मुंडेर पर कौआ बोले तो ,गाय बछड़े को दूध पिलाती दिखे तो ,ऐसे ही बहुत सारे शुभ शगुन विचार हमारे पुराण और शास्त्रों में बताए गये हैं ।इसी तरह बहुत सारे अपशगुन का भी उल्लेख किया गया है — जैसे घर से निकलते वक्त यदि कोई टोंक दे याने पीछै से पुकार कर पूछ ले कहां जा रहे हो ?तो यह अपशकुन है ,घर से निकलते समय यदि कोई भोजन करने का आग्रह करे या काली बिल्ली रास्ते में बातें से दायें या दायें से बातें निकल जाये तो यह बहुत बड़ा अशकुन माना जाता है ।सफ़र पर निकलते वक्त दही खिलाना शकुन है तो छींक बहुत बड़ा अशकुन।आज का आदमी इन तिलिस्मों को या शकुन के तंत्र को स्वीकार नहीं करता ।उसके लिए ये सब अंध विश्वास है ।ढकोसले हैं , लेकिन अमेरिका ,जापान ,चीन आदि बहुत से भौतिक रुप से समृध्द देशों के सभ्य और पढ़ें – लिखे समाज भी अपने अपने ढंग के शकुन – अपशकुन को मानता है ।यह शकुन – अपशकुन विचार लोक आचरण और लोक की दिनचर्या का हिस्सा है । यह मन ,हृदय ,और आत्मा की गहरी अनुभूति से जुड़ी लोकानुभूति और लोक व्यवहार पर आधारित है ।यह शकुन विचार का भाव मन को आल्हाद और आनंद से भर देता है ।यह शकुन – अपशकुन की धारणाएं समाज में पूर्णतः लोक मंगल की चेतना से परिपूर्ण है ।इनके पीछे समाज की समादृत भाव दशा होती है ।आज आधुनिकता की गति इतनी तीव्र है कि वह पल भर भी रुकना और विचार करना नहीं चाहती ।वह गति के तनाव से परिचालित है इसलिए उस को दुख या सुख की खबर खबर नहीं लगती ।दुखद घटना और सुखद प्रसन्नता के क्षण सब समान मनःस्थिति और भाव दशा के ही हिस्से हैं ।जबकि तनाव ,उदासी, नीरसता ,सबसे मुक्ति की राह है शकुन विचार ।मन की भाव दशा को बदलने की विधि है शकुन विचार करना ।यह तो और भी मनोनुकूल स्थिति है जब हम अन्य प्राणियों की दिनचर्या में से अपने मंगल की कामना खोजते हैं ।सच है मनुष्य का मंगल तो जगत के अन्य जीव -सहचर के जीवन में शान्ति और सुकून हो ।यदि उनमें किसी तरह की पीड़ा या कष्ट या वेदना ,दुख होगा तो मनुष्य किस तरह सुखी और तनाव रहित रह सकेगा ? क्योंकि आदमी का जीवन -जगत से सह-संबंध है ।आदमी और प्राणियों का जीवन अन्योनाश्रित है ।पशु -पक्षी ,सब खुश तभी तो मनुष्य के लिए खुशखबरी आयेगी ।यहीं चेतना का प्रवाह है शकुन विचार में ,यही लोक मंगल का विचार है शकुन शास्त्र में ।आदमी के अस्तित्व का समग्र सार है जगत के व्यवहार में । इसीलिए मनुष्य यदि गति के तनाव में ही डूबा हुआ है तो वह बस खुद खुद की पीड़ा ,व्यथा ,वेदना में नितान्त अकेला है ।लोक उससे बहुत दूर है ।यदि वह शकुन विचार करता है तो वह लोक की दिनचर्या के सन्निकट है ।आज मनुष्य से कुछ छीना गया है तो वह है उसके विचार करने की शक्ति ,उसकी सुकून भरी दिनचर्या, उसका आत्मिक सुख ।उसके मंगल को लूट लिया गया है ।वह रिक्त आदमी भटक रहा है ।वह हर जगह मौजूद हैं लेकिन कहीं भी शामिल नहीं ।न कुछ महसूस करता ना किसी भाव दशा में डूबा आदमी आज निपट अकेला यांत्रिक -भौतिक उपलब्धि को ही अपना हासिल मान रहा है उसका भाव लोक अर्थात हृदय रिक्त हैं और दिमाग में विकृति,विकार और रोग भरे पड़े हैं ।यदि मनुष्य अपने भाव लोक को चेतना और विचार विवेक से परिपूर्ण करता है तो वह हिंसक ना होकर परहित से परिचालित हो जायेगा । यहीं सबसे बड़ा शकुन है ।यही सबसे बड़ी खुशखबरी है ।
🙏विनीता रघुवंशी

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