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पहाड़ पर
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चित्त या पट्ट पड़ी
इन चट्टानों को पहाड़
अपनी बताता है
और अंका चट्टानें
इसके बाप की हैं
पहाड़ चित्त पट्ट का यह खेल
चट्टानों के साथ क्यों खेलता है
जबकि और भी कई चीजें हैं उसके पास
मसलन –गिरगिट -गोह
अजगर ,तेंदुआ ,लोमड़ी –सियार वगैरह
वह इन्हें
चित्त पट्ट या अंका
क्यों नहीं समझता ?
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता में राजनीति के पेंटरों में फंसी जनता की वास्तविकता को उभारा गया है । यहां चित्त अर्थात जो सर्वस्व समर्पण कर चुकी जनता है ।पट्ट अर्थात जिस जनता ने सर्व वंचना और वंचित की श्रेणी में पड़ी हुई है । ऐसी जनता पर खड़ी सत्ता अंका है ।अंका याने खड़ा हुआ सिक्का ,जब टास किया जाता है तो सिक्के का वह पहलू जो खड़ा होकर स्थिर है ।यह वह पक्ष है जो तटस्थ हैं ।जिसकी गणना सत्ता अपने पक्ष में नहीं करती ।क्योंकि यह तटस्थ वर्ग चेतना शील और विवेक के अनुसार सत्ता के पक्ष या विरोध में अपनी राय रखता है । इसीलिए सत्ता इस पर पूरा भरोसा नहीं करती ।सत्ता पहाड़ है ।यहीं प्रतीक कविता में इस्तेमाल हुए हैं ।चट्टानें जनता की प्रतीक हैं ।यदि इनका सूक्ष्म विश्लेषण किया जाये तो चट्टानें जातियों के वे समूह और वर्ग हैं जो सत्ता की दया ,रहम,मेहरबानी और परिलब्धियों के प्रलोभन में यहां वहां सरकता रहता है । इसीलिए सत्ता का पहाड़ या पहाड़ सी सत्ता उसका मनचाहा इस्तेमाल करती हैं ।सत्ता हर बार यह खेल या यों कहें कि वोट बैंक के रुप में जनता की एकजुटता को बांटती रहती है ।जातिगत समीकरण की राजनीति जनता के समूह बध्द हितों को बिखेर देती है और जनता अपने छोटे छोटे हितों की रक्षा में जुटकर राष्ट्रीय हितों को भूल जाती है । यहीं से राजनीतिक सत्ता अपना स्वार्थ साध लेती है ।कविता में चतुर पक्ष भी सक्रिय रहता है जो हित -अहित का संधान करता है और मौका देख कर गिरगिट की तरह रंग बदलता है ।गोह का स्वभाव होता है चिपकना।कुछ राजनीति धर्मी – कर्मी कुर्सी से बखूबी चिपक जाते हैं सत्ता इस तरह के चरित्र पर भरोसा नहीं करती ।कुछ राजनीति धर्मी सत्ता भोग में अजगर की तरह होते हैं जो समय समय पर उदर पूर्ति के लिए हिलते -डुलते हैं फिर पड़े रहते हैं । तेंदुआ अपनी छलांग के लिए और लोमड़ी अपनी चालाकी के लिए और सियार अपनी चाटुकारी के स्वभाव अनुकूल व्यवहार करते हैं जिन का सत्ता अपने लिए इस्तेमाल बखूबी नहीं कर पाती ।न ही सत्ता का पहाड़ इनकी चतुराई से ज्यादा फायदा ही उठा पाता है । इसीलिए सत्ता रुपी पहाड़ इन्हें अपना नहीं समझता ? इनकी स्थिति हमेशा संशय और संदेह की होती है ? तेंदुए की तरह दल और पक्ष में कभी भी छलांग लगाई जा सकती है ? चाटुकार सबकी चाटुकारी में माहिर होता है ।लोमड़ी अपनी चतुराई वाले फितरत से किसी की सखी नहीं होती? लोमड़ी अपनी लालसा और लालच के लिए जगह प्रसिध्द है । यह कविता पूरी तरह राजनीति के चरित्र और स्वभाव को उजागर करती है ।राजनीति में जनता कभी सीधे कोई भूमिका नहीं निभाती लेकिन राजनीति कभी जनता पर असर डाले बिना नहीं रह पाती ? सत्ता के द्वारा लिया गया हर फैसला ,निर्णय ,समझौता ,आश्वासन ,वचन सब कुछ जनता को सीधे सीधे प्रभावित करता है । जनता सत्ता के पहाड़ के नीचे ही सांस – प्रश्वांस लेती है । पहाड़ पर सत्ता हर हमेशा होती है ।वह चाहे गरमी सर्दी में अपनी राजधानियां तब्दील करे और पहाड़ पर सत्ता की हलचल और गतिविधियों को संचालित करे ।सब पहाड़ पर ही होगा ? सत्ता भी पहाड़ पर ही नजर आयेगी ? जनता तो दबी – कुचली ही होगी पहाड़ सी सत्ता के वजूद की मनमानी के नीचे ? विचार तो जनता को अपने स्वभाव पर करना है कि वह चित्त हो या पट्ट ? सर्वहारा या सर्वस्व वंचिता? या दोनों ही ?
विनीता रघुवंशी
