Home आज की कविताठीक पहचान के लिए-पहाड़ों के बीच

ठीक पहचान के लिए-पहाड़ों के बीच

by Dr. Vinita Raghuvanshi
ठीक पहचान के लिए
********************
पानी
जब सदियों से
खण्डा पड़ा हो
तो —-
उसे खौलाना जरुरी हो जाता है
वह
बादल ,बिजली ,आकाश से उतरकर
खुद को
ठीक से पहचानने लगता है
पहाड़ से नीचे मैदान की तरफ बढ़ते हुए ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता में पानी प्रतीक है आदमी की खुद्दारी का ,जमीर का , अहम् का ,अहंकार का ,रक्त का,वचन का, मर्यादा का पर्याय बनकर आया है ।आदमी जब सदियों से बिना किसी बदलाव के केवल यथास्थिति में एकसार परिस्थितियों में बिना ना नुकुर के सब सहता जाता है तब यह आदमी के मिजाज की ,चेतना की परख करने का समय उठ खड़ा होता है और मन में विचार आता है कि यह इंसान किसी मिट्टी से बना है कि इस आदमी का खून खौलता क्यों नहीं ।निहायत ऐसे हालात ,ऐसे मंजर, ऐसी हिंसक घटनाएं,ऐसे अन्याय पूर्ण और बेहिसाब अमानवीय स्थितियों के बावजूद आदमी कोई हरकत क्यों नहीं कर रहा ? कोई बदलाव के बारे में विचार क्यों नहीं कर रहा ? कोई कोशिश क्यों। नहीं कर रहा ? यह बदलाव आदमी की निजी व्यवस्था से लेकर समाज,अर्थ, धर्म, राजनीति ,न्याय व्यवस्था सब के बारे में किया जा सकता है ।हमारा व्यक्तिगत जीवन व्यवहार कैसा होना। चाहिएं ।उसमें करुणा और विवेक ,विचार का तत्व किस तरह होना चाहिए ? आज आधुनिकता ने जो हम पर घातक प्रहार किया है वह है हमको विचार शून्य स्थिति में पहुंचा देने का ।आदमी के जीवन -आचरण में आज जो सबसे बड़ी कमी आई है कि वह भोग में डूबा हुआ है ।हर जगह बाजार है जो उसे ‘एंजाय इट’ कहकर लुभा रहा है ? यह ‘एंजाय इट’ की स्थितियां उसे खतरों में डाल रही है ।वह वित्तीय संकट से जूझ रहा है ,कर्ज में डूबा है ,उसके चारों तरफ जो हालात हैं वे सब निर्लज्जता के हालात हैं ।एक ओर भुखमरी है दूसरी ओर फिजूल खर्ची है ? एक ओर बेकारी है दूसरी ओर रिश्वत खोरी है ।नैतिक मूल्य हवा में लटक रहें हैं ।आदमी की मूल्य चेतना बाजार के इशारों पर नाच रही है ? इन बदतर हालातों को बदलने के लिए बेहद जरुरी है कि समाज ,धर्म, नैतिकता ,मूल्यों पर फिर से विमर्श किया जाये ।यह पानी खौलाना अर्थात आदमी के आत्मिक रुप में लज्जा का पैदा होना है ।खुद ब खुद शर्म आना है । नितान्त खुदगर्जी के भीतर से ऐसे हालात बनना जो इंसानियत के आचरण वाले हों -उदारता हो ,करुणा हो ,दया हो ,प्रेम हो ,लगाव हो , अहिंसा हो ।ये है पानी खौलाना याने उबाल आना निर्लज्जता पर क्रोध आना ,गुस्सा आना, बदलने की चेतना उभरना ।यह सब है सदियों से आदमी के वजूद पर चढ़ती हुई परत जिसने आदमी को इस तरह बेशर्म और लज्जाहीन बना दिया है कि उसका मरजाद वाला पानी ठण्डा पड़ा चुका है ? उसके भीतर किसी भी लज्जाजनक स्थिति के गुजरने से कोई फर्क नहीं पड़ता है । यहां अज्ञेय की प्रसिद्ध कहानी ‘रोज ‘ का एक अंश स्मरण आता है जब रोज़ कहानी की नायिका बच्चे के गिरने पर भी दुखी नहीं होती बल्कि कहती हैं –“रोज ही गिरता है “याने मां का ममत्व नहीं जागता ,दर्द नही होता,पीड़ा नहीं होती ,मां का कलेजा निस्पन्द है ? बस है तो यथास्थिति ? यही स्पन्दन स्थिति आदमी भी युगों युगों से गतिमान बनाये हुए हैं ।कुछ नहीं ? निर्विकार भाव ? सब रोज घटता है ? आदमी निरुपाय हैं ? उसके बस में कुछ नहीं ? क्या वह यह सोचने के लिए आजाद नहीं कि उसका धर्म कैसा होना चाहिए ? उसके धर्म में कौन -कौन सी अच्छाई होना चाहिए ? धर्म के नाम पर हिंसा और झगड़े नहीं होना चाहिए? धर्म के नाम पर आदमी और आदमी के बीच नफरत नहीं होना चाहिए ? इसी तरह समाज की लज्जा और शर्म को फैशन या चलन के नाम पर मर्यादा हीन या विचार और विवेक को आचरण के धरातल से बाहर कर देना चाहिए? हमारे परिधान ,हमारे खान -पान,हमारे रहने -सहन के ढंग हमारी भाषा सब मर्यादा अनुकूल नहीं होना चाहिए ? हमारी राजनीतिक शक्तियां और सत्ता अन्याय पोषक नहीं होना चाहिए । लोकतंत्र हो भीड़ तंत्र नहीं ? हमारी व्यक्तिगत और सामाजिक चेतना में समाहित वित्तीय व्यवस्था मितव्ययी होना चाहिए ? इन सब पहलुओं पर यदि विचार पूर्ण विवेक से अमल किया जाये तो आदमी का अहंकार टूटेगा ? उसकी खुद से खुद की पहचान बढ़ेगी ।जिस तरह पानी का उनमान बादल ,बिजली,आकाश नहीं होता उसे अहंकार से उतर कर मैदानों में बहने पर ही पानी जैसी पहचान मिलती है उसी तरह आदमी की पहचान लोक में पद की ऊंचाइयों से नहीं होती ।उसकी गरिमा तो सबमें घुलने -मिलने पर होती है ।आदमी की स्वाभाविक पहचान तो आदमी से आदमी की परस्पर सहभागिता से है । ऊंचाई वाले पद प्रवाह शील नहीं होते और ना ही वे आदमी की गरिमा की खरी पहचान ही होते हैं ।आदमी और पानी का उनमान समान है ।यह कविता हमें सामाजिक संबंधों पर पुनर्विचार का संदेश देती है । श्रीराम की महत्ता तो नर -वानर के लोक सर्जक के रुप में ही है या श्री कृष्ण जब न्याय के पक्ष में होते हैं तो सामाजिक चेतना का मंथन होता है ।यह कविता भी आदमी के विवेक को मथती है । 🙏विनीता रघुवंशी

You may also like

Leave a Comment

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More