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एक दूसरे के लिए
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उसने
भरोसा किया मुझपर
मैंने
संदेह से देखा उसे
उसका
भरोसा ठीक निकला
मेरा संदेह भी
इसलिए कि हम
एक दूसरे के लिए
कुछ भी तो नहीं कर रहे थे
सिवाय इसके ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —–” मंजती धुलती पतीली ” से उद्धृत )
आज की कविता में मानव और मानव के बीच के महीन मनोभाव की पड़ताल की गई है ।समाज में रहते हुए मनुष्य की जो मन: स्थिति होती है वह परस्पर यहीं से इन्हीं मनोदशाओं के बीच याने संदेह और भरोसे के मिजान पर टिकी होती है ।यदि कोई व्यक्ति किसी से लगाव दिखाता है तो वह उसका भीतरी भाव दशा है वह भरोसा। हैं पूरी तरह परखा हुआ । लेकिन जिस पर भरोसा किया जा रहा है उसकी मनोदशा में भाव पैदा होगा यह अति लगाव की वजह क्या है ? यह संदेह है। और इसी संदेह से शुरुआत होती है भरोसे की ? मनुष्य अपने पूरे जीवन में केवल भरोसे और संदेह शक की ही मनोदशा में जीता है ।इंसान की इस परख के बीच क्या अन्य कुछ भी जीवन -व्यवहार या पारस्परिक ता नहीं होती ? कोई लोक व्यवहार या सामाजिक सरोकार नहीं होते ।सच और झूठ नापने का या हिसाब -किताब बिठाने के अलावा प्रेम कोई भूमिका नहीं निबाहता ? नफरत और प्यार के बीच कभी नफरत की वजहें खतम नहीं होती बस इतने भर से कि वह आदमी है ।वह प्राणी है ।वह पंचेन्द्रिय जीव है । आदमी होना ही बड़ी वजह नही होती ? भरोसा करने के लिए ? समग्र जीवन काल में मनुष्य बस भरोसा और संदेह के ही सूत्र पसारे रहता है । मनुष्य के सभी परस्पर संबंध इसी जाले के आर -पार घूमते रहते हैं या तो आदमी भरोसे पर खरा उतरता है या मनुष्य का शक – शुबहा विचार के अनुकूल सही साबित होता है ।यह आदमी की फितरत है ।यह आदमी की युगों युगों की धरोहर है जो उसने अपने जीवन व्यवहार में समा रखी है ।आदमी अपने जीवन काल में संदेह और शक के वैचारिक संजाल से मुक्त भी तो रह सकता है ? धोखा छल कपट ये सब मनुष्य के स्वभाव का गुण हों सकता है ।इसी तरह प्यार ,प्रेम ,लगाव भी आदमी के मूल स्वभाव का गुण हों सकता है । लेकिन लोक व्यवहार और लोक आचरण की सीख सामाजिक पारस्परिक ता मनुष्य को सावधान और सचेत रहने की ताकीद सिखाती है ।धोखा ,खुदगर्जी सब मूल रुप में गुनाह ही माने जाते हैं । लेकिन इनके बूते पर आदमी का मूल्यांकन करना गैर वाजिब है ।कौन किस मायने में भरोसे के लायक है और कौन किस मायने में संदेह के लायक है यह तो विवेक और न्याय बुध्दि पर ही निर्भर है ।असल भरोसा और असल संदेह तो आदमी की नीयत पर ही परखा जा सकता है ? इन सबके अलावा आदमी भरोसे के बदले में केवल प्यार और आत्मीयता भी तो दे सकता है फिर धोखे कपट और छल की संभावना ही नहीं बचेगी ।यह भी विचारणीय है कि मनुष्य को केवल सजग ही नहीं ।और नहीं बुध्दि चातुर्य की ही जरुरत नहीं होती कभी कभी ही नहीं अक्सर अपने व्यवहारिक जीवन में सहजता ,सरलता और अहम् के निर्विकार भाव दशा की अवस्था में रहना चाहिए । जब इंसान की फितरत ,स्वभाव में सहजता होगी तो वह मनुष्य के हित में बहुत कुछ कर सकता है ।वह अपनी सरल मनोदशा से लोक मंगल की स्थितियां रच सकता है ।धरती पर मनुष्य का अवतरण केवल भरोसा और संदेह की परख के पैमाने के रुप में ही नहीं हुआ है ? क्या हम सब भी संदेह और भरोसे के पैमाइशों में ही जुटे हैं ।साधारण तौर पर देखा जाये तो आदमी का पूरा जीवन बस इस तरह ही व्यतीत होता है ।आदमी आदमी अपने व्यवहार,आचरण और पारस्परिक ता को खुदगर्जी की व्यक्तिगत भाव दशा से बाहर निकाल कर बड़े आदर्श और उच्च भाव दशा की अवस्था से जोड़कर देखे तो उसके जीवन की संकीर्णता व्यापक हो जायेगी । मनुष्य का यह धरातल पर चिर विराट रुप हो जायेगा ।यहीं तो हम ईश्वर या परम सत्ता के चरित्र की महिमा का स्थापन करते हैं जब हमारे परम ईश्वर विराट भाव दशा में प्रतिष्ठित हैं तो मनुष्य क्यों अपनी संकीर्ण और संकुचित भाव दशा को बदल नहीं सकता ? आदमी आदमी के प्रति अपने भाव बदले तो लोक भी बदल जायेगा और हिंसा की ,आतंक की ,भय की दशाएं बदल जायेंगी ।यहीं तो लोक-मंगल है ।यहीं तो आदमी आदमी के लिए कर सकता है ।आदमी आदमी के लिए केवल संदेह की भाव दशा को छोड़ सकता है ।हर आदमी संदेह के लायक नहीं होता इसलिए आदमी को अपने व्यवहार और आचरण में भरोसा जताना चाहिए ।यही सबसे बड़ी परस्पर भाव दशा है । एक सवाल हर वक्त आदमी को अपने आपसे करना चाहिए कि वह संदेह के लायक क्यों है? वह मुझे नुकसान क्यों पहुंचायेगा? बस भरोसा बनकर उत्तर आयेगा ।
विनीता रघुवंशी
