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सतपुड़ा की आधी रात
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सन्नाटे को चीरते अचानक
ढेंकने लगे सांभर
पूंछ फटकार कर उठ बैठे रनभैंसे
रुक – रुककर
बादलों की घरघराहट
फिर ऐसी दहाड़
कि टूट -टूटकर धसक रहें हों गोया पहाड़
जंगल में प्रतिध्वनित सिंह हुंकार
खदानों से उछल पड़ा
गेरु मिट्टी का अम्बार
थोड़ा रुककर अब भी
बन्दरों का खिक -खिक स्वर
बीतने को हो गये तीन प्रहर
रह रहकर बोलते रहे
भयाक्रांत वन्य पशु
बस्ती में डकारते रहे सांड
घोटुलों में होती रही हलचलें
खूंटों पर रंभा उठी गायें
बछले प्रत्युत्तर में
पेट पर हाथ धरे
फिर से सो गया अधभूखा मांग्या
बैलों को चार पूले डालकर
नींद में डूबे पहाड़ पर
प्रकाश रेखा खींचता
पुच्छल तारा निकल गया उसपार
सुमिता के तार – तार लुगड़े को देखता – – –
और इस पार
तटवृक्षों से करती रही
चन्द्रवर्णा नदियां विनोद
किन्हीं घुमावदार यादों में डूबे ढांढीवाड़ा -महुआढाना
गढ़ते रहे किंवदंतियां – रीछनुमा ठेकेदार की
कि उनने कितने ट्र्क सागौन कटवाकर
बिल्लू अफसर की मिली भगत से
चौबदार के जरिए दिल्ली भेजे
तभी किसी भूले पांखी की टेर पर
असहनीय दर्द से चीख उठी घाटी
और घोंसलों पर हाथ धरे लेट गई
अलाव के सहारे पड़ा रहा बूढ़ा
नींद में भी बड़बड़ाता रहा रोटी
और आरक्षित वन की चौकसी पर तैनात वन रक्षक
सुनते -गुनते ,रचते -रचाते रहे उत्पात !
सतपुड़ा की आधी रात !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता सतपुड़ा पहाड़ के जन जीवन का सच्चा चिट्ठा खोलती कविता है ।एक ओर वन्य पशु -पक्षी की वेदना है तो दूसरी और मांग्या की भूख और सुमिता का तार तार लुगड़ा है ।यह है जंगल का रहस्य जो वन रक्षक अधिकारी चौबदार और चौकसी करते अमले की लूट खसोट से लहुलुहान है ।हर वह जंगल जो वन्य पशु पक्षियों से स्वत: रक्षित है आज उसे लाभ के लिए काटा जा रहा है । यह भुला दिया गया है कि मनुष्य के लिए सबसे ज्यादा आवश्यक है जंगल का होना ।उसी से मनुष्य की पर्यावरणीय जरुरतें पूरी होगी। ।धरती ठण्डी होगी ।जल से पृथ्वी में नमी बनी रहेगी ।यह भू जल ही जमीन को उपजाऊ बनाए रखेगा । लेकिन आज की सत्ता केवल भूमि के सभी हिस्सों और लाभों को व्यापार में बदलना चाहती है ।अक्सर आधी रात के बाद माफिया या आपराधिक समूह सक्रिय होकर जंगलों को नदियों को पेड़ों को वन्य पशुओं को पक्षियों को नुक्सान पहुंचाते हैं । यह है समूह गत अपराध की स्थितियां जहां सरकार और अफसर याने प्रशासन सब मिलजुल कर जंगल का सर्वनाश कर रहे हैं और जन जिनका जीवन उन्हीं की ताजी हवा से सेहत और स्वास्थ्य पा रही है वह खामोश है ।पशु हुंकार। भर रहे हैं पर निरुपाय हैं ।माफिया का मुकाबला वनवासी जिनका जीवन जंगल के उत्पादों पर ही निर्भर है वे अपनी बसाहट के बिखराव और अशिक्षा के कारण समूह बध्द नहीं है ।आत्मरक्षा के लिए एकजुटता चाहिए ।जंगल और पहाड़ की रक्षा के लिए प्रतिबध्द सत्ता स्वयं माफिया से मिली होती है ।पहाड़ की पकड़ होती है पेड़ों से यदि पेड़ ही काट दिये जायेंगे तो पहाड़ तो धसकने ही लगेंगे ।केवल वन्य पशुओं की हिंसक हुंकार ही पहाड़ों की रक्षा नहीं कर सकती पहाड़ों को बचाने के लिए जागरुक जन चाहिए ।आधी रात और तीन पहर का संकेत है माफिया के या आपराधिक समूहों की सक्रियता के जब वे जंगल की नीरव नींद को बिगाड़ देते हैं ।चोरों के लिए सबसे मुफीद समय ही होता है आधीरात का वक्त ।यहीं आधीरात सतपुड़ा के जंगलों में भी जिन्दगी से खेलने के लिए लकड़ी चोर उतर चूके हैं । यहां सतपुड़ा का सौन्दर्य नहीं वरन सागौन की इमारती लकड़ी सबसे बड़ा आकर्षण है ।जिसके कारण सतपुड़ा की घोर बेफिक्र निद्रा को उचाट किया जा रहा है ।सतपुड़ा का वनवासी अधपेट भूखा है ।उसके पास वन सम्पदा की अकूत उपलब्धता है पर वह अनजान है ।उसके हिस्से में जीवन गत अभाव है ।संताप है और व्यथा है ।उसके जीवन रस को शासन और प्रशासन मिल कर चूस रहा है पर वह इन सब करतूतों को देख समझ कर भी खामोश है ।उसकी निरीहता ,उसकी आर्थिक स्थिति, उसकी राजनीतिक बोध ,उसका सामाजिक बोध सब कुछ कुल मिलाकर अधुनातन समसामयिक दशाओं से अनभिज्ञ है। जंगल के जीवन और पशुओं के स्वभाव का चित्रण कविता में बहुत ही अद्भुत हुआ है ।कुछ कल्पनाएं भी बहुत ही अद्भुत भाव रचती है यथा — बादलों की गड़गड़ाहट मानों टूटकर धसक रहा हो पहाड़ ।पहाड़ का धसकना एकदम संजीव कर देता है हमारे मानस में ।इसी तरह सिंह की हुंकार मानों खदानों से उछल पड़ा हो गेरु मिट्टी का अम्बार ।माफिया समूह की सक्रियता ने सब तरफ बचाव के लिए एक वातावरण रच दिया है लेकिन मनुष्य की चतुराई ,मनुष्य की क्रूरता और हिंसक वृत्ति के कारण वन्य जीव ,वनवासी ,और पक्षी केवल अपनी कलरव हुंकार चिंघाड़ से बचाव के उपाय करते हैं लेकिन यह सब व्यर्थ है और इस तरह अपने उजाड़े जाने की व्यथा ,दुख ,पीड़ा को ,संताप को व्यक्त करते हैं जो किसी को सुनाई नहीं देती ।जिसकी वेदना के स्वर किसी को व्यथित नही करते और ना ही करुण संवेदनशीलता में ही बदलते हैं ।आज का मनुष्य भाग रहा है वैज्ञानिक खोजों की तरफ धरती आकाश सागर चांद सितारे सब खंगाल रहा है ।सबके अस्तित्व की तलाश में जुटा है लेकिन खुद के अस्तित्व के नाश को सुनिश्चित करके । मनुष्य यदि कुछ अपने अस्तित्व के मूल्य पर पा भी लेगा तो वह चिर स्थाई नहीं होगा । इसलिए मनुष्य को अपनी पर्यावरण चेतना को प्राथमिकता देना चाहिए ।बाकी सब तरक्की ,उन्नति ,विकास तब ही कायम रह सकेगा ।पहाड़ है तो आदमी का जीवन और धरती का अस्तित्व है ।नदियों का अस्तित्व है ।पेड़ों का अस्तित्व है ।जल का अस्तित्व है ।अन्न और भोजन की आपूर्ति है ।सतपुड़ा की आधीरात मर्मस्पर्शी रचना है जिसमें जंगल सत्ता शासन प्रशासन के ताने बाने और समीकरण उजागर हुए हैं ।वह यथार्थ सभी के मन मानस को प्रभावित करता है जो जंगल नदियों पेड़ पहाड़ को केवल लाभ की दृष्टि और चेतना से मान्य करते हैं । ये सभी इंसानी और प्राणी जीवन को चेतना ,संवेदना और करुणा से परिपूर्ण करते हैं ।यह संवेदना की कविता है ।
विनीता रघुवंशी
