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कौओं का होना
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कौओं का होना जरुरी है
इसलिए कि वे
कोयल के वंश को भी पाल लेते हैं
और सुबह सुबह
आंगन में बोल -बोलकर
शकुन भरे शुभ संदेश देते हैं
और बार – बार
भगाने पर भी
आसपास की सफाई में लगे रहते हैं ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —–” आंगन बुहारते वक्त ” से उद्धृत )
आज की कविता में प्राणी समाज के सबसे मामूली पक्षी कौव्वे की महत्ता दिखाई गयी है ।यह कविता पढ़ते हुए कवि भवानी प्रसाद मिश्र की इमरजेंसी में लिखी गई कविता —“चार कव्वे ” स्मृति पटल पर उभर आती है ।यों तो हिन्दी साहित्य जगत में कौओं का महत्व विरहिन की मनोदशा दर्शाने के लिए बहुत ज्यादा रहा है ।यह लोक मान्यता है कि जब भी घर की छत या मुंडेर पर कौव्वा बोलता है तो घर में प्रिय ,अतिथि ,या मेहमान आते हैं ।कौए का बोलना शुभ शगुन माना जाता है ।यह भी प्राणी विज्ञान में सिध्द बात है कि कोयल कभी अपने लिए घोंसला नहीं बनाती वह अपने अण्डे कौव्वे के घोंसलें में ही सेती है ।यह कोयल का वंश बढ़ाने में कौओं का योगदान ही माना जायेगा । कौआ ही वह प्राणी है जो खतरों को भांपकर बहुत शोर मचाता है और पेड़ पौधों पर बैठी चिड़ियां पक्षी पखेरु सचेत होकर धरती छोड़कर आसमान में विचरण करने लगते हैं ।कौव्वा जमीन पर पड़ीं गंदगी की भी सफाई करने में जुटा रहता है ।कौआ तब और महत्वपूर्ण हो जाता है जब वह श्राद्ध पक्ष में पुरखों की मानिन्द पूजा जाता है । श्राद्ध पक्ष में खीर खिलाने का एक वैज्ञानिक कारण भी हैं ,यह काल यह समय कौओं के प्रजनन का और गर्भधारण का काल होता है ।इस समय चावल और दूध से इनका पालन -पोषण किया जाता है ।यह भारतीय संस्कृति की वह पर्यावरणीय चेतना और बोध है जिसका पालन समाज धर्म की तरह करता है ।यह संरक्षण की भावना ही मनुष्य धर्म है । पशु -पक्षी का होना समाज के कल्याण और लोकहित के लिए बहुत बहुत जरुरी है । समाज में विचरण करता हर प्राणी मनूष्य समाज का संरक्षण ,सुरक्षा और लोक मंगल दायक है ।आज मनुष्य अपने इस दायित्व बोध और चेतना से विमुख हो गया है ।वह विकास के नाम पर पशुओं , पक्षियों ,कीट पतंगों सब का नाश करने में जुटा है । आधुनिक मनुष्य की पर्यावरण चेतना आज के समय में लुप्त हुई है ।उसने सीमेंट क्रांक्रीट के बड़े बड़े जंगल खड़े किए और जो हरे-भरे जंगल थे जो पशु पक्षियों के जीवन को संरक्षित करने में मदद करते थे । उन्हें मुक्त विचरण और अभय अरण्य की अवस्था देकर उनका पोषण करने में सहायक होते थे वह हमने ,हमारे विकास ने उनसे छीन ली है । क्या मनुष्य इस दशा को बदलने का प्रयास कर पायेगा ।रंग – बिरंगी चिड़िया देखना तो अच्छा लगता है लेकिन उनके जीवन का दांव लगा कर ।शेर देखना या वन्य प्राणी देखना अच्छा लगता है लेकिन पिंजरों में बन्द ? मनुष्य की खुदगर्जी इस हद तक बढ़ चुकी है कि वह अपने अस्तित्व के साथ तो निर्दयी हुआ ही है साथ ही वह पशु – पक्षियों के प्रति भी क्रूर ,निर्दयी, बर्बर हो गया है ।उसकी हिंसक वृत्ति इतनी ज्यादा बढ़ चुकी है की आज इंसान -इंसान का शत्रु बन चुका है तो फिर पक्षी और पशु की बिसात ही क्या ? कौआ हमेशा से ही कवियों और लेखकों की अभिव्यक्ति का माध्यम रहा है ।कभी विरहणी ने कागा की चोंच सोने से मड़वाने की बात की है तो कभी कौआ संदेसिया बना खबर पठाता रहा है ।जब संचार संसाधन बहुत गतिशील और तीव्र नहीं थे तब कौआ ही संदेश वाहक होता था । इसलिए पक्षी समाज में कौआ जैसा प्राणी का होना बहुत बहुत जरुरी है । नाऊ ,बटाऊ,बामन और कौआ सबका अपना अपना महत्व है ।आज के मनुष्य की पर्यावरण चेतना लौटेगी इसी शुभेच्छा के साथ ।
विनीता रघुवंशी
