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विनीता रघुवंशी
प्रस्ताव
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उंघती पहाड़ियों का उठकर
सूरज की
किरण से मुंह धोना और
नदी से नहाकर लौटी सड़क का
सुबह -सुबह
अपने बीच से गुजरना कैसा लगता है ?
आओ उन पहाड़ियों को समर्पित हो लें
चोटियों पर खड़ा हरकारा
आवाज़ दे रहा है
अब छत की तरफ देखने का वक्त नहीं
आओ एक साथ
बंधी मुट्ठियां खोलें
पहाड़ियों को समर्पित हो लें
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता में एक ओर शहर ,नगर ,गांव की भोर की दिनचर्या है तो दूसरी ओर प्यार का प्रस्ताव है ।जिसमें प्रकृति प्रेरक है ।सूरज की किरण से उंघती पहाड़ियों का मुंह धोना बड़ी ही मोहक कल्पना है ।यह दृश्य है भोर का जब बाल सूर्य धीरे -धीरे आसमान पर चढ़ता है और नगर ,गांव,शहर जागने लगता है ।नगर की दिनचर्या में हलचल होने लगती है । जहां जहां नदी प्रवाह मान है ।स्वच्छ जल की धारा नदी में है वहां वहां आज भी बहुसंख्यक जन ,लोग नदी में स्नान कर अपनी भोर को तरोताजा बना लेते हैं ।नदी स्नान प्रभात के आगमन का ,स्फूर्ति के स्वागत की बेला होती है ।यह दिनचर्या समूह की और समाज के अधिकांश लोगों की होती है ।नदी में तैरना ,डुबकी लगाना यह सब एक व्यायाम और शरीर को ताजगी देने के लिए की गई योग – क्रिया सी है ।यह जीवन को तरतीब देने का एक बेहतर सिलसिला भी है ।नदी से तरबतर भींगे वस्त्रों के साथ नगर के बीच से गुजरना और ब्रह्म मूहूर्त में ईश्वर स्मरण ,नाम जप की रीति – नीति में ढली सात्विक भोर का उदय कितना कितना चेतना मय है ।यह केवल अनुभूति के अहसास से ही समझा जा सकता है ।आज आधुनिक जीवन शैली ने आदमी से इस तरह की अनुभूति और आत्मिक स्फूर्ति को छीन लिया है ।अब शहरों नगरों गांवों से नदियां और नदियों पर आश्रित जीवनचर्या छिन गई है ।नदियों पर या कहें प्रकृति से जुड़ी जीवन चर्या मनुष्य के जीवन से तनाव ,संताप ,वेदना ,तड़प ,मानसिक कष्ट सब पौंछ देती थी ।वे मनुष्य के मन को सदा सहज सरल और प्रसन्न मना बनाये रखती थीं। लेकिन आज जीवन का समूचा आधार यांत्रिक -भौतिक हो चुका है । इसीलिए आदमी की मन: स्थिति भी तनाव और मायूसी से भर गई है । वह प्रेम जैसे सार्वभौमिक मानवीय भावना को स्वीकार करने में हिचक रहा है ।उसने उसे भी बुध्दि और चेतना की असहज मुट्ठी में बंद कर रखा है ? क्या प्रेम की अनुभूति मानवीय नहीं ? वह प्यार करता है लेकिन प्रलोभन ,लालच के बदले में ? इसीलिए कविता में प्रस्ताव रखा है कि अब प्रेम करने या उसकी अनुभूति की अभिव्यक्ति के बारे में सोचने का वक्त नहीं है ।प्रेम ,प्यार ,स्नेह,लगाव आत्मीयता यह मन की सहज अवस्था है ।हर प्राणी हर प्राणी से प्यार कर सकता है ।यह देह भोग की दशा नहीं वरन मन की सहज अवस्था है ।प्रेम से प्राणी मात्र का आत्मिक विस्तार और चेतना में विराटता आती है । प्रेम वह अनुभव है जो मनुष्य को संकीर्ण विकृतियों की वीथियों से निकालकर मन के मुक्त गगन में विचरण का राजमार्ग बताता है ।यह बंधन नहीं वरन आदमी की मुक्ति का रास्ता है जिसमें तन, देह और शरीर एक दम जरुरी नहीं यह तो उपादान है ।तन से जुड़ा भोग नहीं मन से जुड़ी सच्ची अनुभूति और अनुभव है ।यह एक प्राकृतिक स्थिति है जिसको मनुष्य ने विकारों की मुट्ठी में बन्द कर रखा है ।मानवीय उच्चादर्श की चोटियों पर खड़ा हरकारा या कहें संदेसिया खड़ा मनुष्य को प्रेम की अनुभूति मय पहाड़ियों से संदेश भेज रहा है कि आओ प्रेम करो प्रकृति से ,आओ प्रेम करो प्राणियों से ,आओ प्रेम करो वन,जंगल,नदी ,पहाड़,पेड़ -पौधे सब से यही तो मनुष्यता के हित में किया गया सबसे कारगर प्रस्ताव है ।
