Home आज की कवितासल्फी का पेड़-नर्मदा की लहरों से

सल्फी का पेड़-नर्मदा की लहरों से

by Dr. Vinita Raghuvanshi
सल्फी का पेड़
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सल्फी का पेड़
मानों जमीन की जलहरी पर
समाधिस्थ शिव
जिनकी जटाजूट में
समाहित गंगा
बस्तर पुत्रों के पात्रों में
बूंद – बूंद प्रकट होकर
भरती गांव – गांव
झोपड़ी – झोपड़ी —-
कल- कल ,छल- छल उत्साह
जहां भर भर दोने
बांटी जाती
चरणामृत की तरह मनुहार से
उर्जस्वित प्यार से ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —–” नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता में सल्फी का पेड़ ग्रामीण अर्थ व्यवस्था की रीढ़ माना जाता है ।यह ताड़ के वृक्ष के समकक्ष होता है ।जिस तरह ताड़ के वृक्ष से एक प्रकार का रस टपकता है ।उसी प्रकार सल्फी के वृक्ष से भी एक पेय पदार्थ रस की बूंद बूंद टपकती है और बस्तर का आदिवासी समाज इस पेय रस को पात्र में संग्रहित करते हैं ।यह पेय रस पोषण युक्त होता है ।यह ताड़ी की ही एक किस्म समझी जा सकती है ।जिस तरह ताड़ी में एक प्रकार का सुरुर होता है उसी भांति इसके रस में भी मदद होश कर देने वाला सुरुर होता है ।नगरीय सभ्यता में जिस तरह चाय आतिथ्य के लिए परोसा जाने वाला पेय है उसी तरह बस्तर के अंचल में सल्फी का रस मेहमान नवाजी के लिए सत्कार स्वरुप परोसा जाने वाला पेय है ।ग्रामीण अर्थ व्यवस्था की यह मेरुदण्ड की तरह है ।यह उसी तरह समाज की अर्थ व्यवस्था को सहारा देती है जिस तरह पशु- पालन और छोटे स्तर पर की गई सब्जी – तरकारी का उत्पादन करना ।सल्फी का पेड़ अपने आकार – प्रकार और ऊंचाई आदि में बेहद खूबसूरत होता है ।इसका तना मोटा और चौड़ा होता है । सामान्यतः दूर से देखने पर यह समाधिस्थ शिव की तरह प्रतीत होता है । कविता में शिव की समाधि की कल्पना ने गंभीरता का बचाव किया है ।वृक्ष की फेली जटाओं में बंधी छोटी छोटी मटकियां और उनमें संग्रहित होता सल्फी का पेय रस ।बस्तर के आदिवासी अंचल में सहेजे जाते यह सल्फी के वृक्ष वहां के जीवन को पोषण ,स्वास्थ्य, और ऊर्जा देते हैं । हर वस्तु के सेवन की अति के दुष्परिणाम होते हैं।सल्फी का सेवन भी आदमी को मदमस्त कर सकता है लेकिन जब यह आग्रह के साथ अतिथि को सत्कार के रुप में परोसा जाता है तो इसका सेवन ऊर्जावान और उत्साह से भर देता है ।सल्फी के वृक्ष से मिलता पेय पदार्थ अंचल के आदिवासी समाज की शक्ति कहां स्रोत है ।यही उनकी अथक मेहनत करते रहने का रहस्य है ।यह एक प्रकार से औषधि भी है ।जिस तरह चिकित्सक नगरीय इलाकों के जन समुदाय को ग्लूकोज के जरिए शक्ति देते हैं उसी तरह ग्रामीण खासकर बस्तर अंचल के आदिवासी परिवार अपने जन समुदाय को शक्ति ,ताकत ,पोषण के लिए सल्फी के पेड़ से प्राप्त रस का पान करके ऊर्जावान बनाते हैं ।हमारी ग्रामीण अर्थ व्यवस्था में पेड़ ,पशु ,कृषि,का आश्रय एक मजबूती देते हैं ।वृक्ष ,पशु ,कृषि ये आय के बुनियादी जरिए हैं ।इनसे भले रुपया – पैसा सीधे तौर पर आमदनी का स्रोत नहीं होता लेकिन खर्चों में कमी जरुर ला देते हैं ।यह भी आय का एक तरीका बन जाता है ।व्यय का रुक जाना भी तो आय का ही माध्यम होता है ।सल्फी का पेड़ हो या ताड़ का वृक्ष ये आदिवासी समाज के जीवन की बुनियाद से जुड़े हैं इनका महत्व कम नहीं ।पेड़ ,पौधे, वृक्ष , कहीं भी हो उनका महत्व कम नहीं होता ।ये प्रत्यक्ष या परोक्ष समाज के कल्याण के ही कारक होते हैं । इसीलिए तो महादेव लोक कल्याण कारी देव हैं तो उनके समान प्रतीत होता पेड़ भी लोक मंगल का हेतु ही होगा । 🙏विनीता रघुवंशी

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