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दोस्त का फोन
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दोस्त का फोन आते ही
बारिश से भीगते पेड़ की तरह
लगता रहा घर
समाती रही कोने कोने प्यार की खुश्बू
पुलकती रही देर तक खिड़कियां
इतने बरसाए
क्यारियों ने फूल
कि छानी तक भर गई
आंगन की देह ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता आत्मिक आनंद की अनुभूति की कविता है ।आज के समय में बहुत से मित्र सोशल मीडिया के जरिए बनते हैं ।बहुत से मित्र दूरभाष और अन्य इलेक्ट्रॉनिक संसाधनों की देन होते हैं ।इनमें घनिष्ठ मित्र की अनुभूति किसी किसी के साथ ही जुड़ती है ।बहुत से मित्र कामकाज के सिलसिले में बन जाते हैं और बहुत से संस्थानों , अकादमियों ,या कारोबार के चलते बन जाते हैं । इनमें भी बहुत कम ऐसे मित्र होते हैं जिनके साथ दिल – दिमाग और भावनाओं का परस्पर मिलाप होता है । यह सामान्य स्थिति नहीं होती ।इस स्थिति में मित्र सुख – दुख की दशा में परस्पर सहयोगी बन कर खड़ा होता है । आज आदमी मित्र दिवस मना मनाकर खूब खुश होता है । लेकिन जो अंतरंगता निकटस्थ मित्र के साथ होती है वह इन मित्र दिवस के परिभाषित मित्रों के साथ कहां ? आज कोसों दूर मौजूद मित्र तो बहुत होते हैं लेकिन जिनकी आवाज ,जिनका स्वर सुनते ही मन और आत्मा आनंदित होकर खिल जाए वह मित्र ही वास्तव में मित्र होता है ।जिसके फोन मात्र से मन में आह्लाद फूट पड़े ऐसे मित्र हजारों में बहुत कम होते हैं। यहां तो केवल फोन आने पर ही दोस्त की नजदीकी महसूस की जा रही है ।ऐसा अहसास हो रहा है कि दोस्त का फोन आते ही बारिश का मंजर चारों तरफ छा गया ,पेड़ जिस तरह आनंद विभोर हो बारिश को अनुभूत करता है बिल्कुल वैसा ही अनुभव ,अहसास याने दोस्त के फोन ने आदमी को भी भावनाओं से तरह स्तर कर दिया ।यह अनोखा अनुभव है ।घर के कोने कोने में दोस्त के प्यार की खुश्बू की महक पसार गई ।जब खिड़कियों और दरवाजों जैसी निर्जीव वस्तुओं पर भी पुलक भर गई हो ।रोमांच से भर गई हों तो उस आत्मिक आनंद की उमंगों की कल्पना का अहसास सरल कार्य नहीं । मित्र आत्मास्थ आनंद की वह दशा है । दोस्त दारुण दुख का भी निवारण कर सकता है ।सच्चे मित्र और सच्ची मित्रता हर संकट का सामना पहाड़ की तरह कर सकते हैं ।पूरा घर परिवार और परिजन का भरोसा भी इस मित्रता पर अटूट होता है ।मित्र के फोन भर आ जाने से आंगन की क्यारियां भी फूलों से लटालूम हो जाती है । परिजन का हौंसला भी बढ़ जाता है ।दिल खिल जाते हैं ।यह है मित्रता का वजूद । दोस्ती का यह अनुभव कल्पनातीत है ।मित्र हों अहसास से भरे सुख – दुख को समान रुप से महसूस करते हुए ।
विनीता रघुवंशी
