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विनीता रघुवंशी
शान है पानी
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बिलाशक —
प्यासे का प्राण है पानी
चमक है धरती की
चेहरों का नूर भी
बिलाशक —-
धरती की दमक है पानी
गमक है रोटी की
चौके की चमक भी
बिलाशक —-
आदमी की शान है पानी
आन है जीवन की
चेतना की तरंग भी —
बिलाशक —!!
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता में पानी की आभा के बारे में किसी तरह का संशय या आशंका मन में नहीं उठाई जा सकती ।बिना किसी संशय के पानी की चमक ,दमक और गमक का अहसास हम हमारे जीवन के आसपास फैली प्रकृति ,अन्न ,फल ,फूल ,और वनस्पतियों में आसानी से कर सकते हैं ।यह महसूस करना तब और भी ज्यादा गहरा हो जाता है जब प्यास से कण्ठ सूख रहा हो ,मन चारों ओर पानी की खोज में भटक रहा हो और आत्मा व्याकुल हो तरस रही हो ।ऐसे आकुल मन की तृप्ति होता है पानी ।ऐसी दशा में हर प्राणी यही सोचता है काश घूंट दो घूंट पानी मिल जाये तो जाते प्राण थोड़ी देर रुक जाएं ।यह कैसी जरुरत है जिसकी पूर्ति केवल पानी जैसी मामूली चीज से हो रही है । लेकिन जाते प्राण को रोक लेने की ताकत केवल पानी में ही है । इसीलिए अन्तिम समय में आबे जम जम या गंगाजल डाला जाता है ।पानी ही मोक्ष का साधन है । धरती में जो चमक है वह पानी से ही है ।अन्न ,फल फूल वनस्पतियों की हरियाली सब में जो चमक कान्ति दिखाई देती है वह पानी की वजह से ही है ।हम अन्न और अनाज ,फल ,फूल की जो गुणवत्ता की परख करते हैं वह पानी की ही देन है ।किसान इस तरह के अर्थ को खूब जानता है ।हमारे यहां ऐसे खेतिहर समूह भी रहे हैं जो यह विशेषज्ञता रखते हैं – एक पानी की फसल ,दो पानी वाला गेहूं या अन्य दाल दलहन ,तिलहन ,फल ,आदि की किस्में ।यह खेती – किसानी का हुनर है ।जो पानी के इस्तेमाल से जुड़ा है । खेती के लिए पानी जरुरी तो है लेकिन उसका सही सदुपयोग और बेहतरीन फसल के जो परिणाम है वह पानी की अल्पता या इफरादी पर आश्रित हैं । फसल और जंगल में पनपती वनस्पतियों के फलने फूलने और बढ़ने के पीछे पानी की उपलब्धता ही मायने रखती है ।अबूझ जंगल और सघन वनस्पतियां ही पानी के अस्तित्व को अपने भीतर बचा कर रखती है ।जंगल है तो पानी भी है ।धरती की चमक पानी पर ही टिकी है ।पानी नहीं तो धरती भी चमक विहीन हो जायेगी ।प्राणी मात्र के चेहरों पर जो लावण्य और नूर दिखता है वह पानी की ही देन है ।आज के युवा चेहरे इस तरह के लावण्य को खो रहे हैं कारण यह है कि वे इलेक्ट्रॉनिक संसाधनों का ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं जिससे उनकी त्वचा रुखी और लावण्य हीन दिखाई देती है ।उनके भोजन ,आराम सब का भक्षण ये इलेक्ट्रॉनिक संसाधन उन्मुक्त भाव से कर रहे हैं ।ऐसे चेहरे और सूरतें अपने पोषण के दोहन का खुला बयान है ।इस दोहन का असर स्त्रियों की सख्त होती त्वचा और कान्ति खोते चेहरे देख कर समझ आ जाता है ।बाह्य उबटन ,क्रीम ,फेशियल या प्रसाधन का बहुत मात्रा में प्रयोग भी कर लिया जाये लेकिन चेहरों पर पानी से आया लावण्य नही उभरता । आज के युवा लड़के – लड़कियों की त्वचा कान्ति और लावण्य विहीन नजर आती है ।यह त्वचा के कुपोषण का प्रमाण है ।युवाओं में यह लावण्य हीनता चेहरों की मासूमियत और कोमलता को चुरा लेती है । इसलिए कन्या और युवक सख्त सूरतों वाले समानान्तर दो पुरुष छवि में प्रतीत होते हैं ।यह है नूर की कमी ? पूरी धरती जिस चेतना से दमकती हुई प्रतीत होती है वह सब पानी की ही चेतना होती है ।दूर खेत खलिहान गांव खेड़े शहर नगर महानगर ,फुटपाथ ,या किनारों पर जहां भी आंच पर रोटी सेंकी जाती है उसकी सौंधी महक पूरे वातावरण को खुश्बू से भर देता है ।यह है रोटी के अनाज में बसी पानी की गमक ।बहुत दूर से यह पता चल जाता है कि कहीं न कहीं रोटी बन रही है ।रोटी सेंकी जा रही है ।यह रोटी की सौंधी गमक भरे पेट पर भी भूख का अहसास करवा देती है ।रसोई में भी भोजन पकाने ,उबालने और सेंकने के सभी तरीकों में पानी एक महत्वपूर्ण पदार्थ की तरह ही है ।रसोई या चौके में या आधुनिक जीवन शैली की किचन में यदि पानी न हो तो रसोई सूनी लगती है ।बिना घड़े या मटके वाला किचन तो हो ही नहीं सकता ? रसोई की अवधारणा तो घड़े या मटके या कलश के सम्पूर्ण ही नही होती ।सचमुच पानी के अस्तित्व को बिना किसी शक या संशय के स्वीकार करना ही पड़ेगा कि पानी ही आदमी की शान है । इसीलिए महाकवि रहीम ने कहा है — रहिमन पानी राखिए , बिन पानी सब सून ।
पानी गये न उबरे , मोती, मानुस, चून।।
आदमी को भी पानीदार होना चाहिए ।पानी उतरने के बाद आदमी का सम्मान और गरिमा का नाश हो जाता है ।यह गरिमा ही उसका पानी है ।यह गरिमा वचन ,चेतना ,ईमान ,सत्य ,करुणा , संवेदना के पैमाने पर आंकी जाती है ।यदि आदमी में यह है तो वह पानीदार आदमी है ।भरोसा करने लायक है ।यही तो है आदमी की शान बना पानी जो गरिमा से भरपूर है ।आदमी के मन में बैठा संकल्प और वैचारिक चेतना में व्यक्त होती कसम है इंसानियत की यही कसम तो उसकी आत्मा है ।यही कसम यही आन मर्यादा ही तो आदमी का अखलाक है ।यही तो जमीर है ।यही तो चेतना की तरंग है जो एक से दूसरे तक अप्रतिहत प्रवाह मान है । सचमुच बिना शक ,बिना संशय के आदमी की वास्तविक पहचान और परिचय यही आन मर्यादा गरिमा पानी ही है ।यह पानी भौतिक पदार्थ नहीं वरन अन्दरुनी चेतना का बेमिसाल प्रमाण और सबूत है ।यदि आदमी अपनी मर्यादा की शान को छोड़ता है तो वह आदमी के दायरे से बाहर केवल पशु भर होकर रह जाता है । आदमी की गरिमा उसके परहित चिन्तन और अहिंसा के आचरण से नापी ,परखी जा सकती है । इसीलिए आदमी के भीतर बहती पानी की रसधारा ही शान है आदमी की ।
