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औरत
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महाप्रलय के वक्त भी औरत
जमीन पर चलती है
चलते – चलते हंसती है
हंसते – हंसते गाती है
गाते – गाते स्वरों में लीन होती है
होते – होते समर्पण बोती है
बोते – बोते विश्वास में खो जाती है
खोते – खोते दुनिया के दुख – दर्द पर रोती है
रोते – रोते अवसाद धोती है
धोते – धोते करुणा का बदन पोंछती है
पोंछते -पोंछते पृथ्वी के मानिन्द
सृजन भाव में रत रहती है औरत ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता में औरत की अस्मिता से जुड़े महत्वपूर्ण भाव जगत को जानने की जिज्ञासा ने औरत के वजूद को अबूझ पहेली बना दिया है । संभवतः यही वजह है कि उसके अस्तित्व से जुड़ी हलचल और अबूझता को कविता में विमर्श की तरह इस्तेमाल किया है ।अक्सर औरत को लेकर तमाम सवाल पुरुष के जेहन में हर समय हलचल मचाए रहते हैं कि वह क्या सोचती है ? क्या फैसले हैं उसके मन में ,गुस्सा वह किस किस बात पर होगा ? आदि बहुत से कयास लगाए जाते हैं ।यह सब कयास इसलिए भी जानदार होते हैं क्योंकि औरत का सारा वजूद भोग मय सामग्री की तरह आंका जाता है ।शिव का अर्धनारीश्वर का विग्रह हमें यह जताता है कि यह समग्र विश्व औरत और मर्द के अस्तित्व से ही चलायमान है । अर्धनारीश्वर में समाई स्त्री – पुरुष की छवि ही विश्व है ।बिना औरत के और बिना पुरुष के विश्व की कल्पना संभव नहीं है ।जब धरती पर महाप्रलय आयेगा तब औरत क्या करेगी ? अरे क्या करेगी वह तब भी जमीन पर ही चलेगी ! औरत भी मनुष्य ही है ।औरत के वजूद से जुड़े रहस्य को जानने की जिज्ञासा पुरुष संरचना को खूब रहती है । लेकिन औरत भी इस धरती का सामान्य मनुष्य ही होती है ।औरत की कोमलता और उसका भाव जगत बहुत बहुत लचीला होता है । इसलिए वह सिर्फ सृजन को महत्व देती है ।इसी वजह से वह चलते चलते हंसती है और हंसते हंसते गाती है ।वह अपने में ही लीन रहती है ।यही तो उसकी शक्ति है ।यदि यह लचीला पन न हो तो वह भी अपने अहम में घिरकर टूट सकती है ।उस पर भी महाप्रलय का दुष्प्रभाव उसी तरह होगा जैसा पुरुष अहंकार पर पड़ता है ।पुरुष धरती की हर हलचल और क्रियमाण जगत का नियंता समझता है ? औरत इस अहंकार से विलग रहती है । इसीलिए उसका चलते – चलते हंसना और हंसते हंसते गाना सामान्य क्रिया है ।उसके मनोभाव सहज सरल है इसीलिए वह स्वरों में लीन हो जाती है ।यह स्वर सृजन के स्वर है ।वह केवल समर्पण के भावों में ही निमग्न है इसलिए वह अपने समूचे परिवेश पर्यावास में समर्पण को ही सिरजती है ।यह समर्पण का भाव ही उसका अपना निजी संसार है ।इस निजी संसार के रहस्य को जानने की जिज्ञासा ही तो है जो औरत को अबूझ बनाती है ।औरत चमत्कार नहीं मनुष्य है । उसकी सहनशीलता ही उसकी ऊर्जा है ।उसका यह समर्पण बोना ही उसके विश्वास को अटूट बनाता है ।वह दुनिया पर अटूट भरोसा करती है और दुनिया के हर दुख – दर्द पर सहज भाव से अपनाकर रोती है ।ये दुख खुद उसके हों या दुनिया जहान के इंसानों के वह हर दुख से विचलित होती है ।सबके दुख उसके अपने दुख हैं यह आत्म दीनता ही उसके भाव जगत को सृजन की ओर क्रियाशील करती है ।औरत का वजूद सीमित नहीं है ।उसके आंसू केवल खुद के लिए नहीं ? उसकी संवेदना और करुणा में वह अकेली कहीं भी खड़ी नहीं होती ।उसकी संवेदना और करुणा में समग्र संसार समाया हुआ है वह खुद के दुख में अकेली हो सकती है लेकिन दुनिया का कोई दुख ,संताप, पीड़ा ऐसी नहीं जिसे औरत को स्पर्श ना किया हो ? सारे संताप औरत के अहसास में समाए रहते हैं ।वह महसूस करती है सारी दुनिया को अपने भीतर ।औरत के पास दुनिया की सबसे बड़ी दौलत है उसके आंखों में तैरते आंसू वह इन आंसुओं से ही अपने मानसिक अवसाद को धोती है इसीलिए वह प्रसन्नवदना बनी रहती है ।यह आंसू ही अवसाद से बाहर आने की ताकत है । मनोवैज्ञानिक भी यह मानते हैं कि मनुष्य के अवसाद को मिटाने में आंसू ही बहुत बड़ी भूमिका निबाहते हैं । मनुष्य में दो भावनात्मक क्रियाएं बहुत जरुरी होती है —एक विस्मृति और दूसरी रुदन । यह रुदन की क्षमता और दक्षता ही अवसाद को करुणा में बदल देता है ।अवसाद फिर खुद के लिए नहीं वरन संसार भर के संताप को रेखांकित करने के लिए उठ खड़ा होता है और यह भाव जागरण करुणा बन सृष्टि के दायरे में फ़ैल जाता है ।जहां जहां दुख के ,पीड़ा के कण बिखरे पड़े हैं वहां वहां करुणा का स्पर्श पहुंच जाता है ।यह स्पर्श साधारण नहीं है ।यह स्पर्श औरत की करुणा का स्पर्श है । यह करुणा का तन मन पौंछते -पौंछते औरत खुद पृथ्वी बन जाती है । पृथ्वी जिस तरह अपनी विराट चेतना में सृजन का ही दायित्व -भाव समाए रहती है ।वैसे ही औरत भी सृजन का दायित्व ही निर्वाह करती है ।यही उसकी निजता का उत्स और उत्साह है ।जो उसके अस्तित्व को , अस्मिता को करुणामय पृथ्वी की सम- स्वरुपात बना देती है ।यह सृजन की चेतना , संवेदना और करुणा ही उसके वजूद को अबूझ और जिज्ञासा से भर देती है । इसीलिए तो औरत के वजूद को तरह तरह से टटोल कर खोज कर तलाशकर,खंगाल कर देखा जाता है ।औरत खुद अपने अस्तित्व के इस सत्य से वाकिफ नहीं ? औरत का अस्तित्व ना- ना प्रकार के रुपकों ,अर्थों से , चमत्कृत कर देने वाला है ।उसका वास्तविक रुप तो मनुष्य का ही है ।वह न तो देवी है न वह मायावी है न वह रहस्य मय है वह तो इस समग्र सृष्टि में समाई अर्धनारीश्वर की वह चेतना है जिसमें संसार की समग्र संभावना प्रगट है । उसका अस्तित्व भी पुरुष के समान ही चेतन मानवीय सरोकार सा ही इस जगत में व्याप्त है ।औरत जिज्ञासा नहीं सत्य मय उत्तर है ।यथार्थ है उसका अस्तित्व और अस्मिता ।
विनीता रघुवंशी
