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तिनके के टूटने की आवाज
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मैं चाहता कि पहले पहल
मेरी कविताएं वहां पहुंचे
जहां नदी नहरों के रास्ते
किसान के सपनों को उर्वर करें
मैं चाहता कि पहले पहल
मेरी कविताएं वहां पहुंचे
जहां चेतना
लोगों तक जाकर
पुंसत्व की कोशिकाएं जगाएं
मैं चाहता कि पहले पहल
मेरी कविताएं वहां पहुंचे
जहां अब भी जानते हैं लोग —
अन्न का अर्थ
पानी की तृप्ति
और महसूसते माटी की महिमा
मैं चाहता कि मेरी कविताएं
वृक्ष की ही नहीं
तिनके के टूटने की आवाज भी सुनें
और पहले पहल
दौड़ पड़े तीमारदारी को
मैं चाहता कि मेरी कविताएं
दुख की सहचरी रहे सदा
और सुख से कहें कि वह भी —
खबर लेने आता रहे वहां
मैं चाहता कि मेरी कविताएं
बेशुमार रोशनी लिए वहां पहुंचें
जहां अपनी गुह्य गुफा में
अंधेरा ओढ़े धरम करम
खुली हवा में
सांसें लेना ही भूल गए
और जिनके आत्मकेंद्रित आचरण से
संगीनों की नोक में
तब्दील होते जा रहे अनुयायी उनके
मैं चाहता कि मेरी कविताएं
म मनुष्यता का
प प्यार का
क करुणा का
र रहम का
से संवेदना का और
भी भाईचारे का अक्षर ज्ञान देती
दुनियाभर का दाखिला
एक ही मदरसे में करवाती रहें ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-“ नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता में मनुष्य का मनुष्यता के बहुत से भाव जगत की कोमलता क्रूरता में बदल चुकी है । इसलिए जो संवेदनशील मनुष्य है वह खुद जो चाहता है वहीं अपने लेखन में भी अभिव्यक्त ही नहीं वरन दुनिया भर के मनुष्यों में भी वही सब देखना चाहता है । उर्दू भाषा में जिसे मदरसा कहा जाता है उसी को अंग्रेजी भाषा में स्कूल कहा जाता है और वही हिन्दी में पाठशाला के अर्थ प्रयुक्त होता है । इसलिए यहां मदरसा संकुचित आशय में नहीं वरन व्यापक अर्थ में लिया जाना चाहिए ।मदरसा शब्द का इस्तेमाल भले ही एक समुदाय विशेष से जोड़ कर देखा जा सकता है लेकिन हिन्दी भाषा भाषी समुदाय ने अंग्रेजी के स्कूल शब्द को ही हिन्दी मय बना लिया है ।उसकी अपनी पहचान शब्दों में नहीं रह गई ।इस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए । पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति को जिस गति से भारतीय समाज ने अपनाया उसमें भाषा ,पहनावा ,आस्था ,शिक्षा सब को मूल रुप से बदल डाला । मानवीय मूल्य वहीं रहे लेकिन चेतना बदल गई ।कविता में जो संवेदनशील चाह है वह है किसान के पास तक पहुंचने की जो नदियों के पानी को खेतों में अन्न ,फल,फूल उगा कर नये रुप में लोगों तक पहुंचाता है ।यदि किसान न हों तो फसल ,अन्न फल ,फूल सब मनुष्य समुदाय तक कैसे पहुंचेगा ? किसान के मन में सबकी भूख की चिन्ता बसी है ? यह भूख ही का कमाल है जिससे वह अपनी मेहनत को नये नये सपनों में रच कर समाज को दान करता है ।चिड़िया से लेकर महाकाय जीव तक उसकी मेहनत के परिणाम पर ही निर्भर होते हैं । किसान अन्न दाता है ।वह धरती का स्वामी है और रखवाला भी है ।किसान की अहमियत कभी भी समाज में कम नहीं हो सकती ।जो कुछ फसल के रुप में खेतों में पैदा होता है उसमें लोक कल्याण से भरे सपने ही होते हैं ।पेड़ कभी फल नहीं खाते ,किसान कभी भी अपनी पूरी पैदावार को अपने उपयोग में नहीं लेता ।वह अपने श्रम को समाज हित में साझा करता है । इसीलिए कविता के दायरे में सबसे पहले किसान के उर्वर सपनों का महत्व है ।किसान नहीं तो समाज नहीं ।समाज का प्राणाधार है किसान ।”मैं चाहता कि कविताएं पुंसत्व जगाएं ” यह चाह बहुत ही महत्वपूर्ण है ।क्योंकि आज हम समाज की जो दशा और दिशा देख रहे हैं वह बहुत ही कारुणिक और दयनीय है । यह दया के लायक इसलिए भी है कि चारों तरफ मनुष्यता का ह्रास हो रहा है ।समाज मर्यादा हीन और उच्छृंखल हो चुका है ।सारा समाज अंकुश हीन और मन माफिक हांका जा रहा है ।न राजनीतिक चेतना है ,न धार्मिक चेतना है ,न आर्थिक हालात ही संभले हुए हैं , समाज और जन नकल जीवी जीवन शैली में बंधें हुए हैं ।आत्म सम्मान खोया हुआ है ,शिक्षा खुद दिग्भ्रमित है , रोजगार के भ्रष्टतम रुप सब ओर पसरे हुए हैं , युवा आक्रोश में डूबा हुआ है लेकिन सही दिशा से अनभिज्ञ हैं , पुंसत्व की कोशिकाएं बहुत बारीक या कहें सूक्ष्म निरीक्षण का संकेत है , जनता में स्थितियों को बदलने की इच्छा है लेकिन आत्मज्ञान नहीं है । आज पुलिस ,प्रशासन , नेतृत्व, सब आत्म ज्ञान शून्य ,कर्तव्य की निष्पक्ष चेतना खोया हुआ अन्याय का मुखर मुखौटा बना हुआ है ।किसी भी पद पर आसीन व्यक्ति का मूल कर्तव्य क्या है ? यह भूल कर वह राजनीति की दलबंदी में घिरा हूं केवल पक्ष पोषण में अपना दायित्व निर्वाह कर रहा है ।यह चिन्ता और फिक्र का विषय है । इस समय नागरिक चेतना की जरुरत है ।जन को नेतृत्व का पक्षधर नहीं वरन राष्ट्र प्रेमी होना होगा ।यही नागरिक चेतना की पहचान है । कविताएं सबसे पहले पहल उन गरीब बेसहारा लोगों के बीच पहुंचे जहां भूख है ,मजलूम हैं ,बेसहारा लोग हैं ।उस पीड़ित मानवता की सेवा के लिए संवेदना जागृत करें तब कविता की सार्थकता है ।भूख ही अन्न का अर्थ जानती है ,प्यासा ही पानी की तृप्ति का अर्थ जानता है ,माटी की महिमा वैभव हीन मनुष्य ही जानता है याने जो जमीन से जुड़ा है सामान्य और साधारण ,मामूली हैसियत वाला यथार्थ जीवी व्यक्ति ही संवेदना के। गहरे मायने से परिचित होता है ।तब ही तो वृक्ष के टूटने की नहीं मामूली तिनके के टूटने से होने वाली पीड़ा का अहसास कविता में समाए यही तो कविता का मर्म है । इसीलिए कबीर कहते हैं कि —” चींटी के पग नूपूर बाजे तो भी साहेब सुनता है ” कितना सूक्ष्म अहसास है तिनके के टूटने की आवाज भी जब व्याकुल कर दे ।वेदना से भर दे ।उस सूक्ष्म वेदना से उत्पन्न व्यथा की पीड़ा को महसूस करना और निदान के लिए मौजूद हो जाना ।सेवा में तत्पर हो जाना ।यह है इंसान होने का स्वभाव ,यह है करुणा की बारीक अनुभूति जिससे आत्मा द्रवित हो जाती है । यह द्रवण शील हो जाना ही तो मानवीय चेतना है । इसीलिए कहा जाता है —” करुणाकर करुणानिधि रोए ” ।कविता वहां अवश्य पहुंचे जहां मनुष्यता दुखी हो और ऐसे दुख भरे स्थान पर सुख भी कभी कभी अपना फेरा लगाए । दुखों की अभिव्यक्ति में सदा कविता सन्नध्द रहे ।जब जब भी मनुष्य दुखी हो संताप में हो तब तब कविता उसकी सहचरी बने ।मित्र बने ,संग साथ खड़ी हो ।कविता सत्य का सदा उद्घाटन करे ।हमेशा मनुष्य के धरम और करम के सच्चे मायने स्थापित करने के लिए तत्पर रहे ।आज वर्तमान समय में मनुष्य की धार्मिक चेतना में आस्था कम और दिखावा ज्यादा हो चुका है । जन समुदाय अपने धार्मिक क्रिया – कलाप द्वारा समाज में यह जताता रहता है कि वह आस्तिक है ,धार्मिक है ,पूजा – पाठी है यह सब प्रदर्शन किया जाता है ।यज्ञ में भले आस्था बहुत थोड़ी हो लेकिन प्रदर्शन बहुत ज्यादा हो रहा है ।समाज में एक दूसरी स्थिति यह भी है कि बेरोजगारी बहुत ज्यादा है तो अपनी रिक्तता को भरने के लिए भी आस्था ,धर्म,के विकृति भरे मायनों के साथ क्रिया – कलाप समाज में व्याप्त हैं ।धर्म का और यज्ञ आदि कर्म- काण्डों का सच्चा अर्थ गुम हो गया है । इनमें फिर से आस्था ,विश्वास ,सत्य की रोशनी और प्राणवंत बनाना बहुत जरुरी है ।अन्यथा समाज दिग्भ्रमित सा धर्म और कर्म के विकृत अर्थों के साथ ही खुदगर्ज,स्वार्थी,सत्ता लोभी ,नफरत के भ्रष्ट आचरण में ही डूबा रहेगा ।कविता की आत्मा सदा आलोकित रहे मनूष्यता ,करुणा ,प्यार ,रहम, संवेदना ,भाईचारे के पठन – पाठन के लिए हमेशा हमेशा यही सबक पढ़ने के लिए दुनियाभर के मदरसों ,स्कूलों , पाठशालाओं, गुरुकुलों में पढ़ायें जाते रहें ।सबसे पहला सबक ही दुनिया भर के समाजों का यही हो । जब इस स्तर की संवेदनशीलता समाजों में आ जायेगी तब ही कविता की सार्थकता होगी । दुनियाभर के हमलों ,युध्दों,संग्राम, संघर्षों का भी अन्त हो जायेगा ।
विनीता रघुवंशी
