10
आखिरकार
**********
सिर्फ जीने के बारे में सोचा
और बिसरा दी जिन्दगी
सिर्फ जमने के बारे में सोचा
और पेड़ होना भूल गए
कुछ फूल सूरज को देखकर ही खिलते
कुछ चांद को
चीजों का मन काफी टिकता
बाहर के उद्दीपन पर
काफी समाहित हैं —-
अंदर – बाहर आपस में
भीतर से उठने वाले
सपनों को जीने जिलाने के वास्ते
आखिरकार कब करेंगे हम
बाहर की दुनिया का निर्माण !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —–” नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता का विश्लेषण कविता की अन्तिम पंक्ति को केन्द्र में रखकर —” बाहर की दुनिया का निर्माण ” बाहर की दुनिया तो बनी बनाई है उसमें मनुष्य को क्या जोड़ना है ? क्या बदलना है ? क्या सुधारना है ? क्या ठीक करना है ? क्या तरतीब बैठानी है ? यह सोचने की बात है ।क्यों बाहर की दुनिया मनुष्य के जीने लायक नहीं है ? क्यों असंगत है बाहर की दुनिया और मनुष्य के मन की दुनिया ? कौन सी ऐसी मिसाल है जो मनुष्य के अन्दरुनी चेतना और बाह्य चेतना को विसंगत बना देती है ? यही बहुत सारे सवाल तरह तरह से आदमी के आत्म बोध को झकझोरते हैं । यह असंगत समय है या मनुष्य की वह चेतना जो सभी तरह से मनोविकारों से भर चुकी है । मनुष्य इतना ज्यादा स्वार्थी ,खुदगर्ज,लालची,लोभी हो गया है कि उसका आत्म बोध ही इस स्थिति से तालमेल नहीं बैठा पा रहा है ।वह दुनिया को ईमानदार ,नेक चलन ,नीति और मूल्य की लीक पर चलता हुआ देखना चाहता है लेकिन जब खुद को रास्ता तलाशना होता है तो वह इससे हटकर अपने लिए रास्ता चुनता है ।यह है मन और आत्मा की आन्तरिक सात्विक अवस्था जिसे छोड़कर आदमी एक सरल सुविधा जीवी जीवन में सभी आदर्श छोड़कर व्यवहार जगत के उसूलों के लचीलेपन को आत्म सात कर लेता है ।क्या यह असंगतता मनुष्य के जीवन को दुरुह नहीं बना देती है ? व्यवहार कहता है आदमी को अपने जीवन पर ध्यान देना चाहिए ।किन्तु जिन्दगी के सच्चे अर्थ को छोड़ कर जीवन जिया जा सकता है ? जीवन का सच्चा अर्थ तो प्रेम में है लेकिन नफरत ने जीवन को विकृतियों से भर दिया है ? नफरत के आते ही हिंसा आ गई, झूठ आ गया ,कपट आ गया ,द्वेष आ गया अब प्रेम कहां टिका रहा ? जिन्दगी का। भरपूर आनंद तो प्रेम में है जैसे कृष्ण का बहुआयामी प्रेम ,जैसे भेद रहित श्री राम का प्रेम ।यह जीवन की पराकाष्ठा है । नफरत जीवन में तनाव और भटकाव पैदा करने वाली होती है ।नफरत और घृणा के सभी रुप जीवन को असहज और चेतना शून्य बनातें हैं प्रेम जीवन का नैसर्गिक उन्नयन है । जीवन में स्थायित्व की कामना हर मनुष्य की होती है ।हर व्यक्ति जीवन में जमना चाहता है । लेकिन वह जड़ होकर या विचार विहीन जीवन जीकर अपने स्थायित्व के बारे में सोचता है ।पेड़ की तरह अपनी जड़ों को मजबूत नहीं करता ,अपनी कर्मशीलता का परिचय समाज में व्याप्त नहीं करता ।उसका जीवन अपने आपकी कर्मशीलता से भरा होता है ।उसकी सारी कर्मठता खुद के निर्माण पर टिकी रहती है जबकि पेड़ की कर्मशीलता अपने वजूद के साथ लोकहित में होती है ।जड़ से लेकर फल फूल छांव शाखाएं सब जनहित के लिए समर्पित होती है । मनुष्य की समग्र चेतना केवल अपने आसपास ही घूमती है फिर उसे समाज में स्थायित्व कैसे मिलेगा ? मनुष्य के सभी कर्म समाज हित में होना चाहिए तभी वह समाज में पेड़ की तरह प्राणवायु देने वाला और जरुरी होगा । फूल की भी अपनी पहचान और अस्मिता होती है ।प्रकृति में कुछ फूल सूरज के निकलने पर और कुछ फूल रात में चांद निकलने पर खिलते हैं ।यह उनका अनुशासन है ।आदमी के पास ऐसा कोई नियम ,विधि – विधान या उसूल नहीं होता ,वह या तो भेड़ चाल चलता है या नियमों को त्याग कर , या समाज के अनुकरण ,धारणा ,नफा – नुकसान आदि पर अपनी जीवनचर्या का पालन करता है जिसके कारण जीवन में विसंगति उत्पन्न होती है और वह चिन्ताग्रस्त होकर खिलना भूल कर बस मुरझाया सा मायूस जीवन रुपी डाल पर लटका रहता है । यह मायूसी और उदासी उसके जीवन का उत्साह ,उमंग,जोश, सब निचोड़ लेती है ।ऐसी विसंगतियों में उलझा जीवन काटा जाता है । समय और काल पर आश्रित होता है । जिनका जीवन सुमन खिला खिला नहीं रहता । मनुष्य अपने जीवन में चीजों , वस्तुओं को बहुत महत्व देता है । वस्तुएं और चीजें बाहरी चेतना को प्रभावित करती है उनका असर मनुष्य की मानसिक ,आत्मिक चेतना का स्पर्श भी नहीं करती ।यह बहुत ही सूक्ष्म निरीक्षण है ।सच में जिस तरह मनुष्य के बाह्य जीवन को उत्तेजित करने के लिए कीमती तोहफे,उपहार, गिफ्ट थोड़ी देर के लिए उत्साहित करते हैं लेकिन प्यार भरा लगाव आत्मीयता मनुष्य को आन्तरिक आल्हाद देती है ।यही वास्तविक जीवन का आनंद है ।किन्तु मनुष्य का मन बाहरी वस्तुओं से ज्यादा बहलता है आन्तरिक लगाव पर चेतना , संवेदना का कोई मूल्य नहीं आंका जाता ।यह भी है कि बाहरी वस्तुओं को प्रदर्शित किया जा सकता है ,दिखाया जा सकता है ,उनका दाम बताया जा सकता है लेकिन प्यार और लगाव अनमोल होते हुए भी प्रदर्शन की जद में नहीं आते ? यही तो जीवन की असंगत अवस्था है । दुनिया भर में प्यार ,लगाव ,आत्मीयता , ईमानदारी,भरोसे ,विश्वास ,आस्था आदि कायम हो यह केवल मानव समाज का सपना है क्योंकि आदमी ने इन सपनों को हकीकत में बदलने के लिए कोई सामाजिक भू रचना ही तैयार नहीं की और नहीं इन मनोभावों का मोल ही जाना – समझा है तो फिर दुनिया तो आदमी के जीवन के लिए बेतुकी और बेतरतीब ही रहेगी ।आखिरकार हम कब इन आन्तरिक और बाह्य विसंगतियों में उलझे रहेंगे । मनुष्य मन में भावनाओं में चाहता कुछ हैं और यथार्थ में उसके आसपास विद्यमान कुछ और होता है ।यही है भाव और सत्य का बेमेल होना ।खुद बेईमान हैं और दुनिया भर से ईमान की उम्मीद ।यही विसंगति है । सपना कुछ और सच कुछ । सपने और सच में समन्वय हो तो ही जिन्दगी को जिया जा सकता है ।जिन्दगी खिलखिलायेगी ।
विनीता रघुवंशी
