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रबी की कटाई के बाद
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बनगूलों के
साथ गोल पंखों से
हवा करते
सूरज की पहुनाई में लगे खेत
यह जान ही नहीं पाते आषाढ़ तक
कि उनके पांवों में
फट रही कितनी बिवाई
और कितनी
काली पड़ती जा रही देह
इसके बाद भी ये
अपनी एड़ियां सहलाते
चांद तारों से रातभर कहानियां सुनते
भोर के साथ ही खड़े हो जाते सूर्यासन को
जिन्हें अपनी सतह से उठ
भाप – भाप देखता समुद्र
तानने लगता —-
मेघों के शामियाने आकाश में
और खेतों को —-
मंगलकामना की पुरवैया सौंपता
बदलियों से आंख मिचौली खेलते
चल पड़ता सूरज ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —–” नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता में चेत की कटाई याने रबी के सीजन की कटाई के बाद भी किसान खेत में मेहनत करता है और खाली हुए खेतों में फिर से बुआई की तैयारी में जुट जाता है ।गर्मी बीत रही है आषाढ़ का महीना आ गया है और खेत राह तक रहे हैं बरसात के होने की ।आषाढ़ मास के मौसम का चित्रण किया गया है । आषाढ़ के आगमन से पूर्व आंधी – तूफान बन हवा चौतरफा गोल गोल बह रही है और सूखे खेत सूरज की ऊष्मा को अपने कण – कण में ज़र्रे जर्रे में उतार रहे हैं ।यही तो है सूरज की पहुनाई ।अब गर्मी बीत गयी है ।सूरज जब तब आने लगा है ।सूरज अतिथि बन गया है ।धूप – छांव हो रही है और कभी भी बारिश आ जायेगी ।किसान रबी की कटाई से निवृत्त हुआ और फिर खेत की जुताई में लग गया ।यह जाने सोचे बिना की अभी तो वह रबी से फुर्सत हुआ है और कितना श्रम कर चुका है ।तन का दर्द ,श्रम की थकान भूल कर वह फिर से काम में जुट गया ।खेती किसानी के लिए चौबीस घंटे का रोजगार है ।चाहे देह धूप में काली पड़े या पांवों में बिवाई फटे लेकिन किसान अपने खेत के कामों को कभी भूल नहीं सकता है । खेती में जुटा किसान हर हमेशा सन्नध्द रहता है ,तत्पर रहता है खेत में काम ,मेहनत ,और श्रम करने के लिए ।वह कभी चूकता नहीं है खेत बिखरने ,बोने और काटने के कामों में जरा भी शिथिलता उसे भारी नुक्सान पहुंचा सकती है । इसीलिए किसान रात दिन मेहनत में लगा रहता है और भोर होते ही सूर्यासन के लिए खेतों में मौजूद हो जाता है ।किसान की इस मेहनत का असर समुद्र में उठती भाप पर भी हो रहा है । यहां कितनी मनोरम कल्पना की गई है कि समुद्र में जो भाप उठ रही है वह किसान की मेहनत को देखने के लिए सतह से ऊपर उठ उठकर देख रही है ।याने समुद्र में भाप का उठना प्राकृतिक वजह से नहीं वरन किसान की मेहनत के परिणाम स्वरुप उठ रही है । मेघ भी खेतों पर शामियाने तानने लगे हैं ,याने मेघ बरसने के लिए तैयार हो चुके हैं । आषाढ़ का महीना आया और बारिश का मौसम की धूप – छांव शुरु हो गई । समुद्र मंगल कामना के संदेश खेतों को सौंप रहा है कितनी सुहावनी उद्भावना है यह सारी सृष्टि का अभिनंदन करता समुद्र ।बदलियों से आंख मिचोली खेलता सूरज का ढकना – निकलने के दृश्य अभिभूत करने वाले हैं ।यह अनुभूति केवल आषाढ़ आगमन के समय ही हो सकती है ।बरसात का सुहावना मौसम गर्मी की ऋतु की तपन और खेतों में हल्की हल्की होती बरसात का सुहावना दृश्य सारी थकान ,तनाव और शिथिलता को स्फूर्ति में ताजगी में बदल देता है ।यह है किसान की व्यस्तता और कर्मशीलता जो हर हमेशा मेहनत में प्रकृति के साथ जुटी रहती है । न किसान थकता है न प्रकृति थकती है । प्रकृति जिस तरह सृजन में रात दिन लगी रहती है वैसे ही किसान भी उसके साथ हम कदम चलता रहता है ।
जय किसान ,जय जवान
विनीता रघुवंशी
