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हण्डिया – नेमावर
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हरदा से दस कोस
हण्डिया – नेमावर के बीच नर्मदा
रोज – रोज पूरब से सूरज को गोद में लिये
समुद्र यात्रा पर निकलती
जहां दोनों किनारों को जोड़ता पुल
उसकी नाभि से प्रवाहित शक्ति को देखता रहता
नर्मदा की इसी नाभि नाल से निकलती उर्मियां खोजती
प्रथम परिक्रमा पुरुष के पदचिन्ह
और उठ – उठकर पूछतीं रहतीं —-
सिध्देश्वर से मानस पुत्रों के संदेश
इसी नाभिनाल से निकलती उर्मियां सुनती
शांत कछारों से फूटती सिध्दों – अरिहंतों की गाथाएं
और उन मल्लाहों के रोमांचक किस्से
जो मगर मच्छरों से
अब भी सुरक्षित रखें हैं अपनी पतवारें
और पाल फैलाए उन धींवरों से भी
जिनके मत्स्य गीतों की टेक से —-
बेखटके पार लगती है नाव ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —–” नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता में हरदा के नजदीक बसा नर्मदा के किनारों पर याने एक किनारे पर हण्डिया और दूसरे किनारे पर नेमावर बसा है ।हण्डिया हरदा की ओर से जाने पर आता है और दूसरे किनारे पर बसा नेमावर देवास जिले की सीमा में आता है ।इन दोनों किनारों को जोड़ता है पुल ।हण्डिया के नाम के बारे में यह किंवदंती प्रचलित है कि मुगल सम्राट अकबर की सेना के फौजदार का उप नाम हण्डिया था मुगल सेना युद्ध के लिए नेमावर में डेरा डाले थी और इन फौजदार को नेमावर नर्मदा की सात्विक संगत का ऐसा असर हुआ कि इन्होंने युध्द करने से विरक्ति ले ली और नेमावर के झुनझुनी पुर याने हण्डिया में बस गये और फिर फकीरी धारण कर ली ।धीरे – धीरे झुनझुनी पुर से हण्डिया नाम पड़ गया । इसी तरह नेमावर के सिध्द नाथ मंदिर की पूरी व्यवस्था उज्जैन के महाकाल मंदिर के राज व्यवस्था से ही होती थी ।ये भी कहा जाता है कि यहां पाण्डवों ने अपने अज्ञात वास का कुछ काल नेमावर के आसपास ही बिताया था ।सिध्द नाथ मंदिर का मुख भीम ने ही घुमा दिया था ।ऐसा भी कहा जाता है कि नेमावर जैन तीर्थ क्षेत्र भी रहा आया और ऐसा माना जाता है कि जैन धर्मावलंबी सिध्दो – संतों की यह भूमि तपोस्थली भी रही और बहुत से सिध्दों ने यहां पर अपना समाधि मरण भी किया ।यह सब लोक प्रचलित गाथाएं जो इस नर्मदा के ओर – छोर पर बसे हण्डिया – नेमावर की महत्ता को सर्व स्वीकृत और लोक मान्यता के चित्त में स्थापित करते हैं ।इसके अलावा नर्मदा एक मात्र लोक को मोक्ष दायिनी है जिसके दर्शन ही सर्वश्रेष्ठ हैं ।आज भी लोक नर्मदा स्नान ,परिक्रमा ,तप साधना के लिए लोकमान्य क्षेत्र है ।इसमें स्नान के लिए अमावस्या और पूर्णिमा पर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है । हमारे देश की यह एकमात्र नदी है जो पूरब से पश्चिम की और बहती है ।अमर कण्टक से खंभाती की खाड़ी की ओर बहती यह नदी प्रातः पूरब से सूरज को अपनी जल छवि में उदित करती है ।हण्डिया नेमावर के बीच नर्मदा का जग प्रसिद्ध नाभि – स्थल भी है ।ऐसा माना जाता है कि नर्मदा का जब भौगोलिक सीमांकन और लंबाई का नाप जोख किया गया तो हण्डिया नेमावर के बीच में एक स्थल की पहचान उसी तरह स्थापित की गई जिस तरह मनुष्य की देह का महत्वपूर्ण हिस्सा नाभि ही होती है ।उसी तरह नर्मदा नदी का वह हिस्सा ,वह अंग नाभि माना गया । यहां आकर नर्मदा आधी दूरी पार करती है इसीलिए यहां नर्मदा की नाभि मानी गई ।यह स्थल भी आस्था की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है ।बहुत से नर्मदा परिक्रमा करने वाले पैदल यात्री ,तपस्वी इस नाभि कुण्ड के दर्शन ,पूजा ,स्नान में ही अपने इहलोक की पूर्णता समझते हैं । नर्मदा की परिक्रमा की शुरुआत किस ने प्रारंभ की यह अज्ञात है लेकिन लगता है कि नर्मदा रोज जिस सूरज को अपने गोद में लेकर उदित होती है तब मानों ऐसा प्रतीत होता है कि नर्मदा अपने प्रथम परिक्रमा पुरुष को खोज रही है ? यह कल्पना बहुत ही अद्भुत है ।नर्मदा में जो लहरें उठ रही है वह इसलिए कि वह अपने मानस ,तपस्वी पुत्रों के संदेश सुनना चाहती है ।यह आस्था की दृष्टि से बहुत सम्पन्न स्थान है इसके घाटों पर ईश्वर चिन्तन ,पुराण ,शास्त्र,धार्मिक कथाएं आदि का वाचन ,प्रवचन, व्याख्यान सब निरंतर किये जाते हैं । यही प्रवचन ही तो मानस पुत्रों के संदेश ,उपदेश हैं । जिन्हें आत्म सात करके समाज धर्म के मर्म का ज्ञान पाता रहता है ।यह ज्ञान का सात्विक ,पाखंड रहित रुप है जहां प्रकृति ही महात्म्य पा कर प्रेम के संचरण में निमग्न है ।नर्मदा माता है और माता किसी से भेदभाव नहीं करती ।इसी नाभि स्थल से सिध्दों और अरिहंतों की गाथाएं फूटती है ।अरिहंत वह होता है जिसका कोई शत्रु न हो ,जिसने अपने विकारों पर संयम पा लिया हो ,जिसने अपनी इच्छाओं , कामनाओं पर विजय पा ली हो ऐसा व्यक्ति ,ऐसा मनुष्य ही अरिहंत कहलाने लायक है ।नर्मदा के उस लोक को भी अनसुना और अनदेखा नहीं किया जो मल्लाहों के साथ जीवन्त है ।इन मल्लाहों के पास हैरत अंगेज रोमांच और साहस से भरे किस्से हैं ।नर्मदा की उफनती बाढ़ में कूदकर जान बचाने के किस्से , लहरों पर हिचकोले खाती नाव को संतुलित बनाने के किस्से ।एक से एक दिल हिला देने वाले ,रोंगटे खड़े कर देने वाले वाकये क्या नहीं है नर्मदा की लहरों के बीच ।मत्स्य गीतों की सुमधुर टेक । इन सबके बीच उत्साह ,भरोसे ,विश्वास और आस्था से भरा हण्डिया – नेमावर जन जन के मन में उमंग ,उत्सव की अनुगूंज लिए हर बार अपनी नाव बेखटके पार लगा ही लेता है ।माई है तो भरोसा है चेतना में ,आस्था में ।नर्मदे हर ।नर्मदा का हर कंकर शंकर है ।यह जन मान्यता है । आस्था तो है ही और है नर्मदा की गहरी जलराशि ।
विनीता रघुवंशी
