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रोशनी का अखण्ड सुहाग-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by Dr. Vinita Raghuvanshi
रोशनी का अखण्ड सुहाग
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( १ )
उग रहा
तुम्हारे भीतर आहिस्ता
महसूस करो
अपने उमड़ते खिलते जिस्म में
कि वहां —-
बह रही एक नदी
और महक रहा रोम – रोम
मनचाही खुश्बू से
उतर रहा
तुम्हारे खून में आहिस्ता
रोशनी का अखण्ड सोहाग बन कर
महसूस करो
अपने जिस्म में
कि कहां – कहां
अंदर – बाहर हूं मैं
भरपूर उष्मा के साथ ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —“तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की कविता में आदमी का अपने आपको जानने समझने और महसूस करने का जरिया है आत्म तत्व ,आत्मा ,मूल्य चेतना , नैतिकता,ईमानदारी ,भरोसा ,प्रेम ,सेवा त्याग और सत्य ।इनके जरिए ही आदमी खुद से खुद की पहचान कर सकता है ।यही वह खुलूस है जो आदमी के अन्त: करण को ज्ञान के प्रकाश से भर देता है ।यही वह रोशनी है जो मनुष्य को मनुष्य के करीब लाती है । खुद के गुणों से खुद परिचित होना भी एक प्रकार से ज्ञान की रोशनी ही मानी जायेगी ।यों तो प्रतिभा हर आदमी में होती है और कुछ दुर्गुण भी होते हैं । यदि मनुष्य अपने दुर्गुणों पर संयम की लगाम कस लें तो फिर उसके गुणों का प्रकाश हर तरफ चकाचौंध पैदा कर सकता है ।किन्तु वह खुद पर आत्म नियंत्रण नहीं रख सकता है तो फिर उसे उसके दुर्गुण अपने वश में कर लेंगे ।यह गुणों की एक नदी मनुष्य के मन में चेतना में और विवेक में निरंतर बहती रहती है ।इस नदी के बहाव को महसूस करना ही आत्म चिंतन है ।आत्म परख है ।आत्म तत्व का ज्ञान है । मनुष्य समर्थ और बुध्दि बल की अपरिमित क्षमता का गाहक है । वह चेतना से ग्रहण करता है और विवेक और बुध्दि द्वारा उसका उपयोग करता है । मनुष्य की चेतना ही वह अनमोल अवस्था है जो मुक्ति के लिए प्रयास करती है ।जिसकी आकांक्षा आत्मा को रहती है ।यह मुक्ति चेतना अध्यात्म की भाव – दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है और आत्म मुक्ति अर्थात विचार मुक्ति , ग्रंथियों से मुक्ति,कुण्ठाओं से मुक्ति ,तनाव से मुक्ति ,वेदना और संताप ,व्यथा से मुक्ति ,पीड़ा और आत्म दया से मुक्ति ।ये सब प्रकार की मुक्ति ही तो मन को ,आत्मा को दबाए रहती हैं ।इन सबसे परे आदमी की वैचारिक मुक्ति ही वास्तविक मुक्ति है । मनुष्य जन्म जात धारणाओं और विचारों से भयभीत ,आक्रान्त, और दबाव में जीवन गुजारता है ।वह समग्र जीवन में यह खोज ही नहीं पाता कि उसका आत्मिक आनंद कहां और किस तरह की भाव – स्थितियों में रचा – बसा है ।वह किन पलों में आनंदित है और किन पलों में दुखी हैं ।यह महसूस करने पर ही उसको आत्म ज्ञान और आत्म परिचय की अवस्था मिल सकेगी ।यही तो सच्चा प्रकाश है ।यही तो ज्ञान की रोशनी है ।यही तो आत्म सत्य है ।यही आत्म चेतना है ।यही तो रोशनी का अखण्ड सुहाग है । जहां मनुष्यता का भाव सर्वोपरि हो , सर्वोत्तम और सर्वोच्च हो । 🙏 विनीता रघुवंशी

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