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चौखट – दर – चौखट
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ऐसा क्या है कि हर बार
दरवाजे तक आ कर लौट जाती कविता
और गलियारे का घना पीपल भी
( दो घड़ी अपनी छांव में )
नहीं खड़ी करता उसे
ना ही एक घूंट पानी का पूछता
बस्ती का लबालब कुआं
आखिरकार कब – तक कहां – कहां
भटकती रहेगी कविता इस तरह
चौखट – दर- चौखट ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —–“ तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की छोटी सी कविता में बहुत बड़े सवाल किए गए हैं ।शायद समाज के मिजाज की पड़ताल भी इसमें शामिल हैं । कविता का आना मतलब संवेदना से वाकिफ होना है ।जब तक समाज संवेदनशील और चेतना सम्पन्न नहीं होगा तब तक कविता भी सहृदय की तलाश में यहां – वहां भटकती रहेगी । सहृदय ही तो उसका सच्चा भावक ,ग्राहक,भोक्ता,और अनुभूत करने वाला होता है ।यह सब बिना करुणा की दृष्टि के संभव भी नहीं । मनुष्य के मन में सच्ची दया की भावनाएं होना चाहिए ।वह करुणा विगलित मन और आत्मा होनी चाहिए जो दुख के ताप को ,संताप ,व्यथा ,वेदना का अनुभव बिना कहे महसूस कर ले ।जिसमें परिताप तो हो लेकिन आडम्बर या दिखावा नहीं हो ।आज आधुनिक समाज जिस भावनात्मक आडम्बर की उपज बना हुआ है वहां कविता बार बार चौखट से लौट लौट ही जायेगी क्यों कि समाज में ,आदमी में सहृदयता शून्य अवस्था तक पहुंच चुकी है । आज आदमी का सारा कुछ लोक व्यवहार ,संवेदना ,करुणा , सत्य झूठ के व्यवहार में छुपा हुआ है ।आज के युवा तो युवा बुजुर्ग पीढ़ी भी असंवेदनशील हो चुकी है ।इसी वजह से कविता का याने संवेदना का कोई मुकाम ही नहीं बचा ,कोई स्थान और दशा ही नहीं बची ,किसी के मन में भी संवेदना और करुणा की द्रवणशीलता ही बची है । इसीलिए तो कविता को चौखट – दर – चौखट भटकना पड़ रहा है ।किसी भी व्यक्ति में इतनी तमीज या सभ्यता या आवभगत ,स्वागत – सत्कार के ,आतिथ्य के संस्कार ही नहीं बचे की थकी हुई कविता को कोई दो घूंट पानी ही पेश कर दे ।मतलब स्पष्ट है कि समाज खुद बहुत संवेदन शून्य ,खुदगर्ज, लोलुप,और चेतना हीन हो चुका है कि समाज के सभी लोक व्यवहार लोप हो गये ।आतिथ्य भाव खतम हो गया ।आज आधुनिक समाज इतना खुदगर्ज हो चुका है कि साहित्य के प्रति उसमें कोई वैशिष्ट्य का भाव नहीं रहा । इस तरह के हृदय हीन समाज में साहित्य का सृजन और सरोकार किस तरह स्थिर रह सकेंगे यह भी विचारणीय तथ्य है ।यह समाज की हकीकत ही है कि राजनीति का अमानवीय दखल समाज में बहुत ज्यादा बढ़ गया है ।समाज खुद भी धन की ओर खिंचा चला जा रहा है ।धन की सत्ता और राजनीतिक सत्ता मिलकर पूरे सामाजिक ढांचे को जर्जर कर रही है ।सामाजिक ढांचा क्रूर , बर्बरता और पतन शील कृत्यों में सक्रिय हैं ।ऐसी दशा में साहित्य घोरतम उपेक्षा का शिकार है । आज के दौर में साहित्य समाज का दर्पण होते हुए भी समाज की दिशाहीन स्थितियों का बयान नहीं कर पा रहा । इसीलिए कविता सहृदय आदमी की तलाश में ,खोज में भटक रही है ।कविता का समाज से बेदखल हो जाना या साहित्य के मर्म से समाज का विलग हो जाने का ही परिणाम है कि समाज में आज दुर्योधन पैदा हो रहे हैं अर्जुन का निर्माण ,सर्जन करना समाज ने रोक दिया है ।ये दोनों समाज की चेतना और दृष्टि के समग्र ,समुचित उदाहरण और प्रमाण है ।आज की शिक्षा व्यवस्था , राजनीति, अर्थव्यवस्था,धर्म की ग़लत व्याख्या का ही नतीजा माना जा सकता है कि समाज आज दुराचारियों के हस्तक्षेप के दंश झेल रहा है । इन हृदय हीन स्थितियों और हालातों पर समाज को ही अपनी शिक्षा – दीक्षा ,अपनी सत्ता के फैलते अंधकार ,आचरण की मर्यादा पर विचार करना जरुरी है । समाज चिन्तकों ,बुध्दि जीवियों , साहित्यिक माध्यमों के रचयिताओं का जागना बेहद बेहद जरुरी है ।समाज की बढ़ती हृदय हीनता , संवेदना ,करुणा सब को समाज में सुखाया जा रहा है यह समूचे समाज की चेतना ,विवेक को निगल जाएं उससे पहले समाज का विवेक जागृत होना चाहिए। फिर कविता कभी चौखट – दर -चौखट नहीं भटकेगी ।मानवता फिर कविता की चौखट पर नत मस्तक मिलेगी ।पहले समाज में साहित्य का स्वागत ,और आव भगत का माहौल तो बने । समाज के सभी दुराचार समाप्त होंगे । साहित्य आज चौखट दर चौखट भटक रहा है जिस दिन समाज साहित्य की चौखट पर आ खड़ा होगा उस दिन समाज की दुरावस्था सुव्यवस्था में बदल जायेगी ।
विनीता रघुवंशी
