Home आज की कविताबेहद उदास है धरती-नर्मदा की लहरों से

बेहद उदास है धरती-नर्मदा की लहरों से

by Dr. Vinita Raghuvanshi
बेहद उदास है धरती
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धरती की गोद में
जो प्रकाश है
प्रकट होकर इतना हरा होता
कि दूर दूर तक
वनस्पतियों से भर जाते कछार
वनस्पतियों की कोंख में
जो प्रकाश है
प्रकट होकर इतने रंगों वाला होता
कि फूलों – फलों से
भर जाते पहाड़ – जंगल -मैदान
लेकिन कुल्हाड़ी के मन में
जो अंधेरा है
प्रकट होकर इतना हत्यारा होता
कि दूर तक
वीरान हो जाती बस्तियां
पेड़ों को छाती से चिपकाए धरती
इसीलिए उदास है आजकल ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —“ नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता में प्रकाश का फैलाव पेड़ – पौधों के अस्तित्व में ही सिमटा हुआ है ।यदि धरती पर पेड़ – पौधे नहीं होते तो धरती पर गहरा अन्धकार छाया रहता ।तब न तो सूरज की रोशनी परावर्तन करके धरती को उजाले से भरती और न ही धरती के भीतर समाई हरियाली ही जीवन्त होकर धरती को सर्जनात्मक ऊर्जा से भर ही पाती ।जो कुछ भी मनुष्य प्रकाश मय होकर महसूस करता है वह सब उसके आस पास फैली हरियाली और पेड़ – पौधों से झरते प्रकाश का ही परिणाम है ।आज आधुनिक चलन और आधुनिकता के बहाव में आदमी अपने परिवेश और पर्यावरण को विकास के नाम पर बलि चढ़ाता जा रहा है ।वह बिल्डिंग, भवन ,इमारत बनाने के फेर में जंगल , उपजाऊ जमीन ,नदियों तालाब,सरोवर , झरनों को बहुत तेजी से मिटाता जा रहा है ।आदमी समझ रहा है कि इस तरह वह उन्नति के रास्तों में आती रुकावटों को खतम कर रहा है लेकिन यह चेतना शून्य विकास मनुष्य के आस पास की जीवन स्थितियों को भी सुरक्षा के दायरे से बाहर कर दे रहा है ।हरे भरे जंगल और पहाड़ आदमी के चारों तरफ एक मनोहारी और शीतल परिवेश की रचना करता है ।इस रंग – बिरंगे परिदृश्य में ही मनुष्य की सृजन – ऊष्मा उत्पन्न होती है । नव किसलय ,नवजात शिशु, नवजात परिन्दे और नन्हें शावक ,बछड़े और मेमने ये सब धरती की सम्पदा है लेकिन ये सब तब ही सांस लेंगे ,तब ही जीवन पायेंगे जब धरती पर लता ,पेड़ – पौधे वनस्पतियों लहलहायेगी ।धरती को सूखेपन के अन्धेरों में ढकेल देने पर धरती पर मनुष्य का ही जीवन संकट में नहीं हो जायेगा वरन धरती पर प्राणी मात्र का जीवन नष्ट होने की दहलीज पर जा खड़ा होगा ।यदि धरती की मायूसी को दूर करना है तो धरती पर नित निरन्तर पौध रोपण ,बीज रोपण की प्रक्रिया बनाए रखनी होगी ।केवल मनुष्य के तकनीक और यांत्रिक ज्ञान से धरती पर खुशहाली नहीं होगी ।धरती के मित्र किसान ,गंवई जन मानस जो पेड़ पौधों को रात्रि में हाथ लगाने को भी पाप मानता है ।जो फूल और पत्तियों को भी उनसे अनुमति और आज्ञा के बाद तोड़ते हैं ।जो वृक्षों में पेड़ पौधों में तीन पादप याने प्राण मानते हैं ।ऐसी धारणा है कि पेड़ पौधों का जन्म होता है ,पेड़ पौधों की ऊंचाई बढ़ती है ,दूसरा उनके पास जड़ में प्राण होते हैं ।फूल और फल उनकी सन्तति होती है । यह सब एक जीवन्त धारणा है ।विज्ञान अनुकूल भी ।यदि पेड़ पौधों को काटा जाता है तो यह भी माना जाता है कि तीन प्राण धारी की हत्या हुई है अतः उस घर द्वार या गृहस्थ से भोजन या खाद्य पदार्थ ग्रहण करना त्याज्य माना जाता है ।यह सब लोकमान्यताएं संभवतः पेड़ पौधों से मिलने वाले जीवन दायक दशा के कारण हो ।याने कुछ भी कहें या माने पेड़ – पौधों के बिना धरती पर जीवन बिल्कुल संभव नहीं हो सकता ।इस धरती पर फैले जीवन वर्धक उजाले के लिए सबसे बड़ा संकट तो कुल्हाड़ी के मन में विकार है ।जिसका जन्म या खोज आदमी ने केवल वृक्षों पेड़ पौधों के सफाए के लिए ही किया है ।जब जब कुल्हाड़ी का पैनापन और तीक्ष्ण धार दिखाई देती रहेगी मतलब वृक्ष काटे जायेंगे तब तब धरती उदास होगी ।धरती की सन्तानें हैं वृक्ष ,पेड़ पौधे ।आदमी की नृशंसता से परेशान हैं धरती क्योंकि धरती की सैंकड़ों वृक्ष रुपी सन्तानों को कुल्हाड़ी की पैनी धार ने काट काटकर उजाड़ दिया है ।आज धरती पर जंगल बहुत कम ही बचे हैं ।क्या हम और हमारा विकास धरती को अन्धकार की तरफ ढकेल रहा है और जो बस्तियां सुनसान और सन्नाटों में डूब रही है उनकी वजह भी वृक्षों का कटना तो नहीं ।हरियाली आदमी के जीवन स्वर का हिस्सा नहीं रही।न अब सांझ को चिड़ियों के समवेत कलरव से चहचहाहट से आसमान गुंजित होता है न गलियों में खेलते बच्चे परिन्दों की नकल में दौड़ ही लगाते नजर आते हैं । कहीं न कहीं हम धरती से रोशनी के धागे मिटा रहे हैं ।जंगल काट कर धरती को सूने उदास अन्धकार में तो नहीं पहुंचा रहे ।यह विकास और उन्नति की रफ्तार में भागते आदमी को , मनुष्य को धरती की उदासियों के मायने रुक कर समझने ही होंगे । यह बेहद चिन्ता का विषय है कि धरती पर जंगल बहुत सिमट चुके हैं जिस देश में अरण्य की बहुतायत थी ।आदमी के उपचार के लिए वनोषधि और वनस्पतियों का भंडार था आज उसी देश में धरती अपनी जंगल की अस्मिता को खोकर उदास है ।क्या धरती की इन उदास खामोशी भरे स्वर को मानव जगत सुनेगा ? आज कल जंगल काटे ही नहीं जा रहे उनमें आग लगाई जा रही है । उनमें तेजाब डाला जा रहा है । धरती पर से हरियाली की रोशनी मिटाई जा रही है क्या मनुष्य तैयार है अन्धकार में रहने को ? यह तो मानव समाज को ही समझना और सोचना होगा ।
🙏विनीता रघुवंशी

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