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देना ही चाहते हो तो
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पानी से कहा
हवा चाहिए ?
तो जोर से हंसा और बोला —
वह तो मुझमें ही समाहित है
फिर पूछा —
आग चाहिए ?
अबकी ठहाका लगाया उसने और बोला —
वह तो ज़र्रे ज़र्रे में है मेरे
चुप हो गया तो
मेरी तरफ देखते हुए बोला —
कि बादलों के कंधों पर बैठा मैं
आकाश के एकांत से ऊब चुका हूं
देना ही चाहते तो जमीन दो
उसकी यह फरियाद लिये
धरती के पास गया
तो वह पोर पोर से
सौंधी गंध उलीचती
सृजन को आतुर हो उठी तत्काल !
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —” नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता में पानी के हाथों रची जाती धरती के सृजन क्रम को व्यक्त किया गया है ।दुनिया भर के खोज और शोध , आविष्कार का केन्द्र है पन बिजली ,भाप ,पवन चक्की, पन चक्की ,और न जाने क्या क्या ? इन सब के निर्माण और विकास में पानी की उस शक्ति का ही उत्सर्जन किया जाता है जिसमें कि पानी की शक्ति का दोहन ज्यादा से ज्यादा होता है और पानी की ऊर्जा व्यर्थ होती है ।पानी संसार की सबसे बड़ी ताकत और क्षमता है ।बिना पानी के सभी खोज ,सभी आविष्कार बेमानी और बेमतलब है ।सभी पन चक्की का उपयोग सीमित होता है ।इसकी बजाए आदमी खुद अपने बल बूते चक्की चलाकर ( घट्टी ) पिसाई कर सकता है ।इस छोटे से काम में मानव श्रम के अच्छे और सच्चे परिणाम भी हासिल हुए हैं ।यह पानी का बेहतर उपयोग नहीं माना जा सकता ।न ही ऊर्जा के उत्पादन में ही पानी का उपयोग बेहतर परिणाम जनक होता है ।पानी का सबसे बेहतर उपयोग का तरीका है वनस्पतियों ,पेड़- पौधों ,फसलों ,जंगलों में प्यास से तड़पते पशुओं,जीव – जन्तुओं तक पहुंचाना ।यही पानी को धरती तक पहुंचाने का जरिया है ।जंगलों के पास पानी रहेगा तो वन्य जीव – जन्तुओं , पशुओं के प्राण सुरक्षित रहेंगे ।शहरी क्षेत्र में यदि पानी रहा भी तो वह कूलर ,एसी ,नालियों और सड़कों पर व्यर्थ बहाया जायेगा ।पानी के दुर्पयोग के बहाने ज्यादा होगें जबकि यदि पानी धरती के पास रहा तो वह पानी सृजनात्मक रुप धारण कर लेगा । सच है पानी की असल और सच्ची ऊर्जा ,ताकत ,स्वरुप यदि कहीं व्यक्त होता है तो वह जमीन के करीब पहुंच कर ही होता है ।आकाश की ऊंचाई भले मोहक हो लेकिन है तो उसमें एकांत की ऊब ही ।जमीन पर पानी के वैविध्य भरे रुप ,रंग ,स्वाद और सेहत,पोषण और रुचियां हैं ।हर जगह के पानी की अपनी पहचान और ठसक है । फसलों के भी आस्वाद और चमक है ।क्या पानी का सबसे बेहतर उपयोग जमीन पर ही तो है ।बाकी सब ज्ञान की कवायदें और उठ बैठ है ।जमीन के भीतर या बाहर जहां जहां भी पानी होगा वहां की ठसक शान और रौब दाब अलग ही होगी ।आज पंजाब का किसान खुश हाल है।उसके पास पांच पहाड़ी नदियों का पानी है । यहां के किसान में हौंसला है ,हिम्मत है ,और जोश है ।नये नये तौर तरीके अपनाने का जज्बा है ।यह सब पानी की करामात है ।धरती आतुर है सृजन और सरोकार की चेतना के साथ सौंधी गंध बिखराने को लेकिन आदमी है कि पानी को जमीन से दूर ही दूर ले जा रहा है ।पानी और जमीन जब समाहित होंगे तब धरती का रंग और आब देखने लायक होगी । मनुष्य को जो असल ज्ञान समझना है वह धरती और पानी के समागम का तात्विक ज्ञान समझना होगा ।तब ही सृष्टि का लोक मंगल कारी रुप अभिव्यक्त होगा ।
विनीता रघुवंशी
