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विनीता रघुवंशी
बाहर निकलो
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जाल चाहे जिस रुप में हो
जाल होता
जिसमें उलझता ही जाता
समूचा शरीर
बल्कि अस्तित्व भी
बाहर निकलो प्रेमशंकर
इतने बाहर
कि ठीक से खोज सको
जाल के ठिकाने
जहां वे करीने से बुने जाते हैं
और देखते देखते
इशारों ही इशारों में
इतिहास भूगोल की हदों को लांघ
बहेलियों द्वारा चाहे जहां
चुपचाप भेज दिए जाते हैं ।
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता मनुष्य के आसपास बुने जाते आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक , वैचारिक, विज्ञापन,बाजारवाद ,रुप – श्रृंगार ,फैशन आदि ऐसे बहुत से जाल हैं जिनमें आदमी अनायास ही घिर जाता है । आधुनिक समय आदमी के चारों तरफ एक लुभावना मोह जाल फैलाया जाता है और आदमी उसमें मोहाविष्ट सा घुसता जाता है ।बाजार आदमी की रोजमर्रा की जरुरतों को पूरा करने के लिए होता है लेकिन बाजारवाद की अवधारणा उससे ज्यादा घातक है । यहां जरुरत पैदा की जाती है । सुविधाएं बताई जाती हैं और विज्ञापन आदमी के मन में जरुरत पैदा करता है । अभाव की तीव्रता की मनोदशा रची जाती है और बाजारवाद अपने जाल में फंसा लेने में सफल हो जाता है ।इसी तरह समाज भी मुक्ति और आजादी का राग छेड़ता है ,रुढ़िया तोड़ने , उन्हें बदलने का ,बिगुल बजाया है और बहुत सारी मानवीय परम्पराओं , मर्यादाओं को हटा देने का जाल इस सबकी आड़ में सफल हो जाता है । समाज समझ ही नहीं पाता कि वह किस तरह और कैसे अमानवीय धारणाओं ,विचारों के जाल में जा फंसा ? वृक्ष काटने लगा ,फसलों पर दवाओं का और कीट नाशकों का इस्तेमाल करने लगा , पानी में जहर डाल कर मछली मारने लगा , सब्जियों पर ताजगी दिखाने के लिए रंग रोगन का इस्तेमाल करने लगा ,जंगलों को कुल्हाड़ी की धार के करिश्में रचे और जंगल साफ हो गये ।लोक में तंत्र अलग और लोक अलग नजर आने लगा ।तंत्र पर पूंजी का चमत्कार हावी हो गया और राजनीति मैली हो गयी।राजनीति से नीति , सिध्दांत,उसूल ,नैतिक आचरण ,मूल्य सब गायब हो गये बस तंत्र की चालाकियां और साजिशें ,नफरत और आतंक भय और दबाव का अन्याय भरा माहौल ही दिखने लगा । राजनीति की समूची दिशा ही धनतंत्र के टकसाल में ढल गई । जिसके पास कारोबारी वही सत्तासीन बन बैठा । व्यापार भी ,लाभ और हानि भी एक तरह का जाल ही है ।लालच लोभ और लालसा के जाल किसी न किसी रुप में आदमी की कामनाओं और इच्छाओं को अपने वश में कर लेते हैं और आदमी इन जालों में लिपटा हुआ छटपटाता है , मोह ग्रस्त रहता है ।धर्म भी एक जाल है ।धर्मी और विधर्मी ,आस्तिक और नास्तिक, मूर्ति पूजक और काफीर ये सब वे ठिकाने हैं जहां आदमी को बस में करने के लिए जाल बुनें जाते हैं ।सच्चा धर्मी कभी इन जालों या धारणाओं में नहीं उलझता उसे तो अपनी आस्था भाव पर दृढ़ भरोसा होता है लेकिन जिन लोगों को धर्म का व्यापार और व्यवसाय करना होता है वे ही काफीर और नमाज़ी की या धर्मी – विधर्मी के टोकन में समाज को बांटते हैं ।ये सब एक तरह के जाल ही हैं जिनके जरिए आदमी की मनुष्यता को शिकार बनाया जाता है । मनुष्य की करुणा और संवेदना पर प्रहार किया जाता है ।समाज में भांति भांति के शिकारी और बहेलिए मौजूद हैं और वे निरंतर आदमी के शिकार के लिए कोशिश करते रहते हैं ।आजकल टेक्नोलॉजी की दुकानें जो आई टी सेल के नाम पर चलन में है वे भी आदमी के दिमाग पर कब्जा करने के तरह तरह के जाल बिछाया करते हैं । आदमी को आज के इन जालों को समझने के लिए सबसे पहले जाल से बाहर निकलना होगा याने समूचे आकर्षण ,स्वार्थ,लोभ और मोह से मुक्त होना होगा तब ही उसकी चेतना सक्रिय होगी तब ही वह ठीक से खोज सकेगा जाल के ठिकाने ? जो जाल आदमी के इतिहास और भूगोल की सीमाओं के आसपास बुनें जा रहें हैं याने इतिहास में दर्ज सत्य को झुठलाया जा रहा है । इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के जरिए परदेस से भौगोलिक हदों को पार कर जिस तरह से संप्रभुता और सांस्कृतिक आघात पहुंचाएं जा रहे हैं उन्हें भी जानना समझना है तो सब तरह से चेतना शून्य स्थिति और यथास्थिति से बाहर आना होगा ।यह बाहर आना बिलकुल अपनी अस्मिता चेतना और संवेदना की जागृति के साथ बाहर आना है। सब तरह से कामना और इच्छा हीन होकर वस्तु स्थिति का निरीक्षण,समीक्षण,और परीक्षण करने की चेतना के साथ ।यह बाहर निकलना देह ,शरीर या तन का बाहर निकलना नहीं है यह बाहर आना मतलब जिस तरह श्रीकृष्ण का अर्जुन को ज्ञान देकर मोह के व्यूह से बाहर निकालने की प्रक्रिया थी बिलकुल उसी तरह लोभ के ,आकर्षण के ,लालसा के चक्रव्यूह का भेदन करने पर ही आत्मा पर चढ़े जाल का खुलासा हो सकेगा ।तब ही आदमी अपनी चेतना के असल रुप से परिचित होगा ।आज दुनिया बहेलियों की गिरफ्त में हैं ।इससे तो बाहर आना ही है अन्यथा मारे सभी जायेंगे कोई आगे कोई बाद में । चेतना में वैचारिक जागृति ही इस स्थिति से उबार सकती है ।
