Home आज की कवितागूंगेपन की कसमसाहट-नर्मदा की लहरों से

गूंगेपन की कसमसाहट-नर्मदा की लहरों से

by Dr. Vinita Raghuvanshi
गूंगेपन की कसमसाहट
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अग्नि ने कोई शब्द नहीं रचा
न जल ने
न वायु ने
और पुष्प कभी बोलते नहीं
आकाश ने कोई भाषा नहीं रची
न नक्षत्रों ने
न पृथ्वी ने
और क्षितिज कभी मुंह खोलते नहीं
किन्तु कर्म के अंतर्नाद से
सदैव ही अपनी संपूर्णता में
सब कुछ कहते हैं ये
और एक आप हैं कि
भाषा में रहकर
अभिव्यक्ति के आगे
गूंगेपन की कसमसाहट लिये
अब भी —
मुंह बायें खड़े रहते हैं ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता आदमी के आसपास के उस वर्तमान पर संवाद है जिसमें आदमी सब समझते हुए भी गहरी चुप्पी साधे रहता है ।आदमी गूंगा नहीं है ,जिनके पास अपने आपको व्यक्त करने के लिए कोई भाषा नहीं लेकिन वे अपनी संपूर्णता में अपने आपको व्यक्त कर देते हैं ।एक मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जिसके पास अपनी बात ,अपना मत ,अपनी सहमति – असहमति बताने का जरिया भाषा के रुप में है ।मगर वह चतुर है।जब – जब भी उसे अपनी चेतना और संवेदना को बयान बनाना होता है उस समय वह गहरी चुप्पी ओढ़ लेता है ।तब वह अपने आपकी रक्षा में जुट जाता है ।अग्नि अपनी लपटों से ,अपनी ऊष्मा से ,अपनी चंचलता और चपलता से याने अपने कर्म के अन्तर स्वर से यज्ञ से लेकर ध्वंस का एक गहरा सुखद – दुखद रुप रच सकती है ।जल मनुष्य की तीस – प्यास बुझाने से लेकर तूफानी लहरें उठाकर तबाही मचा सकता है और वायु शीतल मन्द बयार बन कर मनुष्य के मन को आनंद विभोर कर सकती है और वही बयार जब अंधड़ बनकर मचल उठती है तो तबाही के दर्दनाक दृश्य निर्मित कर देती है ।पुष्प की समग्र चेतना उसके रंगों में , सुगंध और खिलने में समाई रहती है वे कुछ नहीं बोलते लेकिन उनके रंग और गंध ही उनके प्राण हैं । सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में आकाश निर्वाक है ।ग्रह – नक्षत्र अपनी गति और दिशाओं के पथ बदल बदल कर पृथ्वी के भविष्य को सुरक्षित और संचलित करने का , मनुष्य के भाग्य और दुर्भाग्य का लेखा – जोखा बनाने और बताने का जरिया बनते हैं । खगोलीय घटनाएं ब्रह्माण्ड के चमत्कारिक परिवर्तन दर्शा कर भौतिक जगत की दिशाओं के संकेत व्यक्त करते हैं । यह है उनके निर्भय कथन । यह है उनका कहना ।जो बिना वाणी के भी अपने अन्तर स्वर से सब कुछ कह देते हैं ।नाश और सृजन के लय के स्वरों की अनुगूंज से भरी अभिव्यक्ति ।इनके पास भय नहीं चेतना का समग्र स्वरुप है जो हर समय मौन में भी मुखर है । मनुष्य हर समय अपनी चेतना की जागृत स्थिति को छल से छुपाने का प्रयास करता है । मनुष्य ही वह प्राणी है जिसके पास भाषा जैसा समर्थ साधन है जिसके द्वारा वह मानव – घाती परिस्थितियों के प्रति कारगर प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकता है ।नफरत को वह प्रेम में ,अनुदारता को वह उदारता में , निष्करुण अवस्था को करुणामय बना सकता है ।निर्मम लोक व्यवहार को वह ममता से भरी दृष्टि वर्षन से नहला सकता है ।वह जगत के नाश के दिशा संकेतों को अपनी कठोर और वर्जना युक्त वाणी गर्जना से रोक सकता है ।आदमी की सामाजिक मर्यादा ,मूल्यों के पतन और नैतिक ह्रास को भाषा से भरे उवाच द्वारा दखल दे सकता है । लेकिन यह मनुष्य की चतुराई ही है कि वह जहां चुप्पी तोड़नी चाहिए वहां भी अपने आपको गूंगा याने वाणी हीन समझता है । मनुष्य के पास समग्र चेतना ,करुणा और संवेदना का बोध है लेकिन उसके भीतर स्वार्थ, लाभ ,लोभ और प्रलोभन के मनोविकार तैर रहे हैं इसीलिए वह संपूर्ण होते हुए भी आधा अधूरा है ।वह दिखावे पाखंड में विभाजित हो कर खंडित व्यक्तित्व का स्वामी है । मनुष्य को अपनी चेतना का जहां परिचय देना चाहिए। जहां मनुष्यता के हित में हस्तक्षेप करना चाहिए वहां भी वह अपनी समर्थ और सक्षम अभिव्यक्ति पर मौन रुपी ताला डाले हुए हैं । यह मनुष्य की चेतना का गूंगापन है ।यह है मनुष्य की संवेदना की गहरी खौफनाक चुप्पी जिसके पास वाणी होते हुए भी सार्थक शब्द नहीं है । जहां आवाज बुलंद की जाना चाहिए वहां यहां वहां बंगले झांकते दिखाई दें यदि आदमी तो उसके जीवन में सार्थकता कहां है ? जीना बहुमूल्य कहां है ? केवल उदर पोषण ? केवल यौन – भोग ? केवल सम्पत्ति जमा करने का उद्योग ? केवल धन – संग्रह ? जीवन का असल मकसद क्या है ? वाणी होते हुए भी व्यर्थ ? कविता में” आप ” एक सर्वनाम है किसी व्यक्ति विशेष की ओर इंगित नहीं है ।कविता उस चेतना की सुषुप्ति को धिक्कार रही है जहां चेतना की दृढ़ता और वैचारिक कठोरता के प्रदर्शन की जरुरत है वहां बेजुबान बना आदमी सब कुछ गुजरते दृश्य की तरह देख रहा है ।वह दृश्य का हिस्सा है लेकिन हरकत हीन है । संवेदना शून्य सा ? क्या यह स्थिति चिंताजनक नहीं ? मनुष्य का मनुष्यता का अहसास गुम हो जाना कारुणिक नहीं ? यह समय एक कसमसाहट का समय है ।जो यह अनुभव करवा रहा है कि आदमी वर्तमान समय में अपनी वाक – शक्ति खो चुका है ? या आदमी के आस पास से सब कुछ इतनी शीघ्रता से गुजर रहा है कि आदमी निर्वाक सा दृश्यों के बीच अपनी वाचा कर्मणा के बोध को खोज रहा है ? टटोल रहा है ?
🙏 विनीता रघुवंशी

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