Home आज की कविताबेमौसम बरसात-नर्मदा की लहरों से

बेमौसम बरसात-नर्मदा की लहरों से

by Dr. Vinita Raghuvanshi
बेमौसम बरसात
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नदी की धार के नीचे चमकती बालू
जितनी सुहानी लगती
उतनी ही बुरी लगती घरों में घुसती रेत
चूल्हे या अलावा की आग
जितनी सुहानी लगती
उतनी ही बुरी लगती गांव तक आती दावानल
पिकासो की गुएर्निका स्पेन के बाहर भी
जितनी सुहानी लगती
उतनी ही बुरी लगती तानाशाह फ्रांकों की उस पर प्रशंसा
कोढ़ी का स्वाभिमान
जितना सुहाना लगता उतना ही बुरा लगता
कोढ़ी के हाथ चूमने का प्रदर्शन करता पादरी
वीणा पर थिरकती अंगुलियां
जितनी सुहानी लगती
उतने ही बुरे लगते वीणा के पृष्ठ से कील ठोंकते हाथ
बरसात में झमाझम बरसतीं बूंदें
जितनी सुहानी लगती
उतनी ही बुरी लगती खेतों पर बरसती बेमौसम बरसात ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता में चित्त को सुकून देने वाले बहुत सुहाने प्रसंग विमर्श के लिए दृश्य बनकर आए हैं साथ ही वे दृश्य भी हैं जिन्हें देखकर मन दुखी होता है ।हर दृश्य मन में उत्साह उमंग और उल्लास का संचार करता है ।और हर वह दृश्य जो मन के अन्दर एक वितृष्णा उभार देता है ।नदी की धार के नीचे चमकती बालू हो ,चूल्हे या अलावा की आग हो ,पिकासो का बनाया गुएर्निका की मुस्कान हो ,कोढ़ी का स्वाभिमान हो , वीणा पर स्वर साधती अंगुलियों की थिरकन हो ,बरसात में बरसती बूंदें हों सब को देखना महसूस करना बड़ा ही सुहाना है ।मन को भाने वाले दृश्य हैं लेकिन जब यही दृश्य मन की गहराई में जाकर अपने स्वरुप को बदलते हैं ।उनकी अति मन में वितृष्णा भर्ती हैं ।मन उन्हें आत्म सात नहीं करना चाहता ।नदी के किनारों पर नदी को जीवन्त बनाती बालू बहुत सुहावनी लगती है लेकिन जब वही रेत पांवों में ,जूते – चप्पल में चिपक कर घर में आकर फैल जाती है तब हर आदमी उसे बुहारने में जुट जाता है ।वह रेत घर में गंदगी और दुर्घटना का सबब बन सकती है ।तब वह आदमी के सौन्दर्य बोध की वस्तु या सामग्री से बाहर होती है । इसी तरह गांव में दावानल बनकर घुसती आग कैसे जन हृदय का आकर्षण हो सकती है ।चूल्हे की आग और अलावा की आग का मकसद तो मनुष्य को लाभ पहुंचाने का है लेकिन गांव को ,शहर को, नगर को तबाह करती आग कैसे मनोहारी हो सकती है ? यह तो सोचने की बात है ।आग आग ही है लेकिन एक में ऊर्जा है ,ऊष्मा है , और एक में नाश है विनाश है ? जहां विनाश की संभावना है वह चित्ताकर्षक कैसे हो सकती है ? पिकासो की पेंटिंग गुएर्निका का पोर्टेट कलाकारों को अवश्य प्रेरित करेगा ही ,हर संवेदनशील मन को वह तृप्त और चेतना गत आनंद प्रदान करेगा लेकिन एक तानशाह जिसकी आत्मा में रंच मात्र भी कोमलता या संवेदना ,या करुणा का स्पन्दन नहीं है वह कला मर्मज्ञ बन कर किसी चित्र की तारीफ करे यही विश्वास करने लायक बात नहीं हो सकती । एक जुल्म और अत्याचार करने का अभ्यस्त व्यक्ति करुणा के मर्म को ,कला के सौन्दर्य का बोध कैसे जान सकता है ? उसका यह कृत्य अविश्वसनीय है ? किसी धर्म गुरु का करुणा का दिखावा भी विश्वसनीय नहीं हो सकता यह सब केवल एक दिखावा है ।कोढ़ी का मन स्वाभिमानी हो सकता है । दुनिया को अपने दयालु होने का भाव एक प्रदर्शन और पाखंड की ही श्रेणी का कर्म है ? वीणा स्वर मोहक हो सकते हैं थिरकती अंगुलियां स्वरों का जादू बिखेर सकते हैं लेकिन वीणा को हाथ में उठाकर उससे हथौडी का काम लेना लज्जाजनक है ।यह मन को आहत करने वाला दृश्य ही है ।इसी तरह बरसात की झमाझम गिरती बूंदें मन के तनाव को हलका करती है लेकिन जब खेतों में अन्न , खाद्यान्न पका हो तब होती बारिश बुरी लगती है क्योंकि वह अन्नदाता की मेहनत पर पानी फेर देती है ।विश्व के करोड़ों लोगों की भूख पर कहर बनकर बरसती है ।किसान की दिन – रात के परिश्रम पर कहर ढाती है ।ऐसी बेमौसम बरसात कैसे चित्ताकर्षक हो सकती है ।जो खेतों में खड़ी फसल का नुक़सान करती हो वह सुहानी कैसे हो सकती है ।उसकी तो हर बूंद चुभन पैदा करने वाली होती है । इसीलिए उन सारे दृश्यों को विचार की कतार में संजोते हुए और उनकी तुलना कला ,जीवन, आग पानी से करते हुए भी यह कहना कि बेमौसम बरसात जो किसान के पेट पर लात मारती है ।उसकी मेहनत के क्षणों को उजाड़ती है वह मन भावन कैसे हो सकती है ? वह तो मन में व्यथा ,वेदना ,दुख ,और संताप का कारण ही है ? बेमौसम होती बरसात पर मन किस तरह हर्षित हो सकता है ? यह तो जन मन ,और किसान सब के मन के उल्लास को चिन्ता में फिक्र में डालने वाली बारिश होती है ? दुनिया के हर उस कृत्य को सुन – समझकर और विचार करने के बाद ही मानव – जीवन के अनुकूल मानना चाहिए जिसमें विरोधाभास और चेतना के विरोधी तत्व समाए हों ? एक तानाशाह संवेदनशील नहीं हो सकता ? कोढ़ी का आत्माभिमान स्तुत्य हो सकता है लेकिन पादरी एक धर्म गुरु का दयालुता का दिखावा समाज की प्रेरणा का विषय नहीं हो सकता ? यहां प्रेरणा का स्रोत तो कोढ़ी का आत्माभिमान और स्वाभिमान है ।इसी तरह बरसात से हर बार मन तनाव रहित हो यह संभव नहीं बल्कि बेमौसम बरसात की बूंदें मन को तनाव से भर देती है क्योंकि बरसात की बूंदों के साथ बरसती है चिन्ता ,भय ,संताप ,व्यथा ,अकाल ,अभाव के पीड़ामय दृश्य ? इसलिए बरसात बेमौसम की अच्छी नहीं ? ऋतु – वर्षा ही मनोहारी और मन भावन लगती है । समय अनुकूल आचरण और कृत्य ,कर्म ही मनुष्य के मनोभावों की सही अभिव्यक्ति होते हैं ।विपरीत स्वभाव और विरोधाभासी आचरण हमेशा दुखदायी होते हैं ।
🙏विनीता रघुवंशी

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