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पानी में
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शीतलता है ज्वाला भी है पानी में
संजीवनी है हलाल भी है पानी में
गंगा रेवा सागर की भी संस्कृतियां है पानी में
कमला भी है रंभा भी है पानी में
वीणा ध्वनि अनुगूंज शंख की पानी में
धन्वंतरि की औषधसिध्दि पानी में
दूध सरीखी फेन उठाती कामधेनु है पानी में
ज्वार और भाटों से सज्जित कल्पवृक्ष हैं पानी में ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– ” नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता में धरती पर उपलब्ध चमत्कारिक भौगोलिक तत्व पानी के गुणों पर विमर्श किया गया है ।पानी धरती का मूल तत्व है ।बिना पानी के पूरे खगोल – भूगोल में जीवन की संभावनाओं पर विचार या कल्पना तक नहीं की जा सकती ? जल है तो जीवन है यह बात भले मुहावरों , नारों या चेतावनी के रुप में ही कहीं जाए लेकिन सर्वमान्य सत्य है ।पानी में भरपूर शीतलता होती है ।पानी अर्थात मनुष्य का स्वभाव ,मनुष्य की प्रकृति , मनुष्य की तासीर भी है शीतल ,शान्त, सहनशील,धैर्यवान व्यक्तित्व । यह है पानी की चमक । पानी में छुपी ज्वाला मनुष्य का क्रोध ,गुस्सा ,आक्रोश ,आवेश ये हैं ज्वाला ? ये मनुष्य के गुण समय असमय मनुष्य की सामयिक और विपरीत स्थितियों में हर हमेशा प्रकट होते रहते हैं । मनुष्य की सहनशीलता ,धैर्य और शान्त स्वभाव समाज में परिवर्तन को प्रेरणा देता है लेकिन मनुष्य का ग़ुस्सा ,आक्रोश यदि मामूली विषयों पर ही बरसने लगे ,उभरने लगे तो वह समाज निर्माण की प्रक्रिया में , परिवार की स्नेह आत्मीयता में अवरोध उत्पन्न करता है पर जब यही आक्रोश ,क्रोध समीचीन विषयों पर समूह बध्द रुप सामाजिक हित साधन के लिए तत्पर होता है तो वह बड़ी निर्माण चेतना का सबब बनता है । इसीलिए पानी में याने व्यक्ति और उसके व्यक्तित्व में शान्ति भी है और क्रोध की ज्वाला मय स्थिति भी जो समाज के दोष ,अपकर्म का नाश कर सकती है ।पानी में ही जीवन तत्व की संजीवनी भी मौजूद है और हलाहल अर्थात घातक विष भी जल में ही है । जल के बिना अमृत और विष की कोई अवस्था नहीं होती ।ये सृष्टि के सबसे बड़े रसायन हैं ।विष भी औषधि रुप धारण कर लेता है जब उसकी न्यूनतम मात्रा का प्रयोग उपचार के निमित्त होता है लेकिन पानी उसकी तरलता में घुला – मिला होता है ।पानी किसी के लिए जीवन दायक है तो पानी किसी के लिए प्राण हर लेने वाला भी होता है ।इतिहास में प्रमाण मिलते हैं कि अधिकतर संस्कृति और सभ्यता नदियों के आसपास ही विकसित होती हैं जहां पानी नहीं होता वहां से आबादी अक्सर पलायन कर देती है ,गांव के गांव और कस्बे के कस्बे खाली हो जाते हैं । नदियां और सागर ही संस्कृति के सभ्यता के रचयिता होते हैं । अप्सराओं का लावण्य और सुकुमारता भी पानी में ही होती है । यदि चेहरे पर चमक नहीं तो वह सौन्दर्य भी नहीं ? सूरत पर नूर याने आभा भी पानी की ही होती है ।पानी के बिना चेहरा ,सूरत,अक्स अपनी चमक खोया रहता है ।वह चेहरा स्त्री का हो या पुरुष का दोनों के चेहरे पर मर्यादा ,लज्जा ,आबरु और चेतना ,विवेक का पानी आभा बनकर आत्मा का नूर बनकर सहज रुप में उभरता है । यही तो है हर मनुष्य की चेतना का उद्भास पानी में ।पानी में ही सरस्वती की वीणा की झंकार है और यही अनुगूंज पांचजन्य शंख की ध्वनि में समाहित है । चिकित्सा शास्त्र के प्रणेता और महान रसायन विद आचार्य धन्वंतरि की पूर्ण औषधि विज्ञान का सार यदि कहीं उपस्थित हैं तो वह पानी में ही है ।इस धरती का सबसे चमत्कारिक द्रव पदार्थ यदि कोई है तो वह पानी ही है ।पानी सब रोग – शोक, तनाव का उपचार है । आचार्य धन्वंतरि की सभी औषधि की सिध्दि पानी में ही समाई है ।स्वर्ग की समस्त वैचारिक कल्पना लोक के सृजन के पदार्थ रचने वाली कामधेनु की दूध धारा भी पानी में ही देखी जा सकती है जब पानी लहर बनकर किनारों से टकराता है तब उसमें उठती फेनिल झाग दूध जैसी ही प्रतीत होती है । समुद्र में आते ज्वार और भाटे भी पानी के कल्प वृक्ष समान ही है क्योंकि जब वे आते हैं तो समुद्र में छुपे बहुत से मणि ,माणिक्य,मोती ,रत्न किनारों पर छोड़ जाते हैं ।यही तो सम्पदा है स्वर्ग की जो पानी में छुपी हुई है । पानी ही सब पदार्थों का मूल उत्स है ।बिना पानी के सृष्टि के सृजन की कल्पना भी असंभव है ।सृष्टि के प्रत्येक पदार्थ का सृजन ,रचना और जन्म में शामिल होता है पानी ।सब कुछ पानी में भी चला जाता है यदि मनुष्य लापरवाही पूर्ण जीवन व्यतीत करें तो ? जहां परवाह होती है वहां जीवन संचरण करता है वरना सब घट मानो मसान ? यह परवाह ही चेतना है ।यह चिन्ता का भाव ही समाज है ।यह फिक्र का विवेक ही मनुष्यता है ।यही सब पानी है मरजाद है पानी में ।वरना सब पानी में ।पानी फेरने जैसा ? आशाहीन। नाउम्मीद करता हुआ ।बेनतीजा ।व्यक्ति में चरित्र नहीं तो खाली व्यक्तित्व भी ,धन सम्पदा ,पद – प्रतिष्ठा गर्व – गरिमा ,गौरव भी सब पानी में ।
विनीता रघुवंशी
