Home आज की कवितादंगा —-( ११ )-नर्मदा की लहरों से

दंगा —-( ११ )-नर्मदा की लहरों से

by Dr. Vinita Raghuvanshi
दंगा —-( ११ )
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लूटपाट से उबरकर
उनने
जिंदा जला दिए लोग
इसके बाद भी
जब उनकी हिंसा की दुकान
कलोनी रही
तो जायकेदार बनाने
वे बार बार
दंगों के खूनी जबड़ों पर
जेहाद का नमक भुरकते रहे
और गली मोहल्ले
पागलों – से बहकते रहे
जिन्हें देख दिन – रात
कांपती रही बस्तियां – – – ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —” नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता “दंगा” विषय पर विमर्श करती इस कड़ी की अन्तिम कविता है । दंगों में उन्माद फैलाती भीड़ का अपकृत्य चरम पर जब आ पहुंचा तब उसी से ऊब होने लगी ? ऊब भी उस अपकर्म से ? कब तक सामानों को लूटे कब तक बस्तियों को तहस – नहस करें तो उसी अपकर्म में नयापन लाने के लिए हिंसा ने नया बदलाव किया और दंगें को और भीषण रुप दे दिया जिन्दा लोगों को आग में झौंक कर ? यह कर्म क्या बदलाव है ? यह सोचने की बात है ? भीड़ का अपना कोई विचार नहीं होता वह तो बस हुजुम होती है ? उन्मादी और उच्छृंखल ।अनुशासनहीन ।उसके सभी कृत्य केवल अत्याचार का प्रमाण होते हैं ? दंगा केवल लूटपाट का जुल्म ही नहीं करते बल्कि वे नर संहार करने में भी नहीं हिचकते ? यही तो गुजरात – दंगों में किया गया ।यह कविता उन दंगों पर की गई तीखी प्रतिक्रिया का सबूत ही समझी जानी चाहिए । संवेदनशील मन हर बार हिंसा से आहत ही होगा ।जो मन अपकृत्यों से न दहले ,न दयार्द्र हो वह मनुष्य का मन नहीं है ? उसमें पशुत्व का संचार होता है ? दंगों में इस तरह की दरिंदगी की बस्तियां धर्म युध्द के जयकारों से गूंजती रहे और पीढ़ियां भय से कांपती हुई बड़ी हों ? यह दंगा पीड़ितों को नहीं बल्कि दंगाइयों के मनोविकृतियों को खोल रहा है ।क्या अत्याचार ,क्या अन्याय जायकेदार होते हैं ? मौत का चेहरा क्या खूबसूरत होता है ? मौत भी स्वादिष्ट और ज़ायके वाली होती है ? यह विचारणीय है ? आदमी के भीतर हिंसा का यह चटकारा कितना पशुता भरा है ? यह समाज को सोचना चाहिए ।क्या नफरत की अवस्था इस हद तक पहुंच गई कि आदमी आदमी को खाद्य सामग्री की तरह उपयोग कर रहा है ? कहां है ये खूनी जबड़े आदमी केएस जिस्म में ? दिल में या दिमाग में या उस सत्ता की नृशंसता भरे बहकावे में जहां दिमाग कहीं और हिंसा की रचाव में लगा हो और प्रयोग में बद दिमाग लोगों का औजार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा हो ? अंध भक्त और वैचारिक रुप से कमजोर मनोभाव वाला जन समूह इस तरह के इस्तेमाल के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है ? यही तो उकसाती सत्ता पहचान और खोज – खबर रखती है ? इस तरह के जन समूह धर्म के गहरे अर्थ से किसी प्रकार का गहरा नाता नहीं रखते ? लेकिन धर्म की रक्षा करने के लिए हमेशा बेताब रहते हैं ? यह उनका धंधा है ? क्या आदमी का आदमी पर से एतबार और भरोसा टूटने का परिणाम ही नहीं होते दंगें ? या निरीह और बेबस भरोसे में सांस लेते समाज को इस तरह जिन्दा आग में झौंक देना ? यही अपकर्म ही चटकारा है ? गंदी जुबान का ? हिंसा की वृत्तियों में इस तरह द्वेष का नमक ? नमक तो आदमी की ईमानदारी और सात्विक चेतना का सबूत होता है ? जिसका नमक खाया जाता है उसके साथ वफा भी निभाई जाती है ? लेकिन यहां तो नमक भुरक कर हिंसा का स्वाद बढ़ाया जा रहा है ? यह नमक की कैसी तासीर है जो सिर्फ स्वाद भर बन कर रह गया ? नमक ने अपनी वफ़ा ,अपने हलाल होने का भरोसा तोड़ दिया और वह बस जायके के साथ जा जुड़ा ? नमक तो भरोसा है वफा का ? इंसानियत का ? आदमी के आदमी बने रहने का ? लेकिन हिंसा के खूनी जबड़े तो आज नमक की तासीर को ही बदल दे रहे हैं ? आदमी का आदमी पर से भरोसा टूटना ही तो नमक हरामी है ? सत्ता की भूमिका इसमें सबसे बड़ी होती है ।सत्ता अपने स्वार्थ ,हित,और मतलब के लिए जनता में हिंसक विचारों को प्रसारित करती है ।नफरत के माहौल को बनाती है और जन समूह को उकसा कर दंगा फैलाती है ।यह सब इस साफगोई से किया जाता है कि लगता है कि जनता के ही दो समूह उग्र होकर अपना आपा खो बैठे और हिंसक होकर परस्पर मार – काट मचा रहे हैं और सत्ता और सरकार बीच – बचाव और राहत पहुंचा रही है ।यह सब सरकार और प्रशासन की स्वीकृति और इशारों पर होता है । जिसमें जनता पिसती है ।पीड़ित होती है । यंत्रणा भोगती है और परिजनों को खोती है ।घर- गृहस्थी उजाड़ती है । अपना अमन,सुकून और शान्ति खो देती है ।दंगे सत्ता के ही खूनी जबड़े से बाहर आता है और बस्तियों को निगल जाता है ।यह मनुष्य रचित आपदा है ? जिसका इतिहास हर बार मानव बस्तियों को दहला देने वाला है ? हर बार बस्तियां दंगों के किस्से सुन सुनकर कांपती रहती है ? लेकिन आदमी है कि आदमी के लिए कहर बना सत्ता के इशारों पर पागल होता रहता है । दंगा मनुष्य के भीतर बैठा मनोविकार विक्षिप्तता ही है । अपनी बस्ती की शान्ति और सुकून की रक्षा ही आज का वास्तविक धर्म और संस्कृति की रक्षा है ।न कभी जेहाद सफल रहा है न रहेगा ? महाभारत भी एक धर्म युध्द ही था जिसके परिणाम पूरी मानवता के लिए विचारणीय है ? अन्त में कुछ मुट्ठी भर पांडव ही बचे रहे थे उनकी मासूम पीढ़ियां तक उसके परिणाम की मुक्त होंगी रही ? क्या हम भी हमारे समाज को इसी तरह की नफरत की आग में झौंक कर समाज का ,लोक का अन्त करना चाहेंगे ? यह समाज के चिन्तन की ,विचार की, विवेक के मंथन का विषय है ।जागरुक समाज इस ओर विमर्श के पग जरुर बढ़ायेगा ।
🙏 विनीता रघुवंशी

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