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विनीता रघुवंशी
दंगा —- (१०)
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वे ठहाके लगाते
तब भागे
जब उनमें से एक ने धर्म के नाम पर
विधर्मी के घर बलात्कार किया
दूसरे ने आगजनी
और तीसरे ने गले में पहनें
ताबीज को बेधते हुए
गर्दन के आर-पार कर दी तलवार
अब उसकी लाश
सड़क पर लावारिस पड़ी है
और शहर का जिस्म
दंगों की आग में झुलस रहा है ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-“ नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता में दंगों के भीतर पनपते विकृत विचारों की क्रूरता और धर्म के नाम पर किए जाते अधर्म और अन्याय हिंसा का खुला बयान है । दुनिया का कोई भी धर्म हिंसा की स्वीकृति नहीं देता ।क्रूरता और जान लेना तो घोर पाप माना जाता है ।सत्ता धर्म के प्रति आस्था और निष्ठा की कमजोरियों को अपने हित में इस्तेमाल करती हैं और जन मानस को उद्वेलित कर उकसाती है कि धर्म की रक्षा करने के लिए विधर्मी पर हमला ,नाश,हिंसा के दुष्कृत्य करके ही हो सकता है ? यह सत्ता का प्रचार तंत्र होता है जो जनमानस की कमजोरी और अतार्किकता को उकसाता है । दंगों में लिप्त किशोर और युवा जो कोमल भावनाओं की लपेट में होते हैं और अपने जन नेता के प्रति बिना किसी निष्ठा और वैचारिक चेतना के प्राणपण से समर्पित रहते हैं ।जिनके पास न तो धर्म के कोई गहरे मर्म होते हैं न गहरी समझ ही होती है ये निरे पाखंड जीवी होते हैं ? पाखंड ही इनका आदर्श होता है और धर्म रक्षक की झूठी आन – बान – शान ओढ़े ये समाज में यहां – वहां बिखरे असामाजिक जीव होते हैं ।जो अपने अपकृत्य पर हंसते हैं ठहाके लगाते हैं और समझते हैं कि उन्होंने विधर्मी के साथ बलात्कार किया ,आगजनी की और गर्दन काट दी तो इससे उनका धर्म सुरक्षित हो गया ? क्या ये अपकर्म सचमुच धर्म को सुरक्षित करते हैं या इनके होने से धर्म का नाश होता है ? धर्म जीवन की रक्षा करने के लिए होता है किसी की जान लेने या किसी पर अत्याचार करने की छूट नहीं देता ? यह समाज को विचार करना चाहिए ।धर्म तब तक ही सुरक्षित है और जब तक ही मनुष्य की रक्षा करता है जब तक वह अपने कर्म को सत्कर्म,सत्य,न्याय और आस्था की मर्यादा और करुणा की आत्मस्थ स्थिति में पालन करता है ।बाकी सब तो धर्म के नाम पर किये गये सभी कर्म अपकर्म ही है ? इनसे न तो धर्म की गरिमा बढ़ती है न गौरव ही प्रतिष्ठित होता है ? क्या अपकृत्य धर्म की सही पहचान स्थापित कर पायेंगे इस तरह के कृत्यों के दरम्यान? धर्म धर्म पर हमला करे ? धर्म धर्म का गला काटे ? धर्म धर्म का घर जलाए ? क्या परस्पर पीड़ा ,दुख,संताप,आपदा,व्यथा ,वेदना बरसाना ही धर्म की असल और सही मायने हैं ?सही रक्षा है ? यह तो केवल खुदगर्जी है ।स्वार्थ है ।लालसा का सबसे निचला स्तर है ।अमानवीयता किस तरह लोकधर्म की सही व्याख्या ,सही आदर्श ,सही प्रतीक हो सकते हैं ? फिर श्री राम,श्रीकृष्ण ,महावीर ,गौतम बुध्द,महात्मा गांधी के अहिंसा के उपदेश और मार्ग तो व्यर्थ और चेतना कालातीत हो चुकी है ? हमें हमारे आदर्श क्या यही उपदेश और संदेश दे रहे हैं ? यही विचारणीय है ।समाज जिस तरह हिंसा के घातक नमूने और उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है। वह चिन्तित करने वाला है ? यदि इन उदाहरणों और प्रमाणों को पाकर भी समाज निश्चित और बेफिक्र सो सकता है तो उस समाज के अन्त की शुरुआत हो चुकी है यह मान लेना चाहिए ।क्या हत्या ,आगजनी ,बलात्कार ठहाके लगाने जैसे कृत्य हैं ? जिन्हें करके या अन्जाम देकर कोई मनोरोगी,कोई विक्षिप्त ही ठहाके लगा सकता है ।यदि कोई संवेदनशील मनोवृत्ति का मनुष्य है तो वह खुद ऐसे दृश्यों को देखकर पागल हो जायेगा ? स्वयं कारुणिक अवस्था में चला जायेगा ? क्या समाज में रचे जाते अपकृत्यों के दृश्य हमारे धार्मिक होने ,हमारे सामाजिक होने ,हमारे अनुशासित होने ,हमारे न्याय प्रिय होने ,हमारे नीति और मूल्यों के अनुपालक होने , हमारे आचरण – विचार की शुद्धता के परिचायक ,प्रमाण और सबूत है ।जिन पर आंख मूंदकर भरोसा किया जा सकता है ? या ये वे प्रमाण है जो समाज की घोर विकृतियों ,रोग ,शोक की तरफ संकेत हैं ? इन्हीं को तो महाकवि तुलसीदास जी ने अधिभौतिक संताप कहा है ।यही तो है समाज की रोग ग्रस्त स्थितियां जिनका उपचार करने की जरुरत है ।शहर का जिस्म हर बार हर समय झुलसता रहेगा दंगों की आग से ।हमें ही विचार करना है कि सत्ता कभी हमारे आदर्श प्रतीक वे चाहे – श्री राम हों ,श्री कृष्ण हों ,या अहिंसा के उपासक महात्मा गांधी जी ही क्यों न हों , उनका राजनीतिक स्वार्थ के लिए विकृत उपयोग न करें और न ही नागरिक चेतना हर हमेशा इन प्रतीकों ,आदर्शो के प्रति सचेत,सजग, और सतर्क रहे ।तब ही ये दृश्य समाज के व्यापक अक्स पर कभी नहीं उभरेंगे ।यह संचेतना तो हर भारत वासी के मन ,आत्मा का हिस्सा होनी चाहिए ।कोई भी जन नेता भारत की आत्मा से बड़ा नहीं हो सकता की उसके अंगुली संकेत भर से शहर नगर के चौराहे धूं धूं करके जल उठे ।यह विचारणीय है ? समस्त समाज को इसी चेतना के बरअक्स विचार करना चाहिए ।
