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विनीता रघुवंशी
दंगा —( ९ )
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इतनी हिंसा कि
स्तब्ध रह गई साबरमती
हो गया उसकी वैष्णवी पीड़ा का देहांत
और दरगाहों की फसील पर
झुलसकर ढेर हो गए सूफियों के कलाम
देखते – देखते सुरक्षित स्थलों के
आसपास पहुंच रहे खूनी
यह चुपचाप बैठने की घड़ी नहीं है
नहीं है समझौतों का वक्त
यह तो कातिलों की शिनाख्त का मौका है
और वक्त है
अपनी पक्षधरता के इजहार का
यह शान्ति की जमीन पर
धर्मान्धता मिटाने का वक्त है
वक्त है हिंसा से प्रतिकार का
वक्त है लौटाना – विश्वास का –प्यार का !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता में वक्त की नजाकत को समझने का प्रयास हर नागरिक को करना चाहिए ।दंगों ने पूरी सामाजिक व्यवस्था को नष्ट कर दिया है ।जन समूह भयभीत और गहरे सदमे में हैं जिस सत्ता को भरपूर विश्वास और भरोसे के साथ चुन कर अपने नेतृत्व की जिम्मेदारी सौंपी गई वहीं सत्ता जब आक्रामक होकर जनता के साथ लूट पाट ,हिंसा और अशान्ति फैलाने का काम करें तो उस राजनीतिक व्यवस्था ,उस समाज व्यवस्था पर तो प्रश्न चिन्ह लग ही जायेगा कि क्या इसी हिंसक सत्ता को सिंहासन पर बैठाया ? यह कविता गुजरात के दंगों का खुला बयान बनकर हमारे मन मस्तिष्क को झकझोरती है ।साबरमती गुजरात की प्राणधारा नदी है और महात्मा गांधी जी के समस्त अहिंसक आन्दोलनों की साक्षी रही है ।साबरमती के आश्रम से ही महात्मा गांधी जिस भजन के बोल पूरे भारत की आत्मा में संचरण करते थे उस भजन की अनुगूंज है साबरमती के किनारों पर उसकी जलधारा ,प्राणधारा,जीवनधारा सब रुक गई ? बिसर गई वह चेतना वैष्णव जन की ? वैष्णव जन तो तैने कहिए जो पीर पराई जाणे रे ? क्या सचमुच सत्ता इस भजन के अर्थ को जान पाई ? क्या सत्ता की आत्मा पर हिंसा की कालिमा इतनी ज्यादा थी कि वह भारतीय संस्कृति की गंगा – जमुनी तहजीब को ही अनसुना ,अनसमझा , अनजान बनी दंगों की बर्बरता में डूब गई ।अनगिनत हिन्दू और अनगिनत मुसलमान इस दंगें की आग में झौंक दिए गये ।यह दंगा नहीं वरन वैष्णवी पीड़ा का वह बोध था जिसका अन्त इन दंगों में हुआ ? उन दरगाहों के वे उपदेश ,कलाम जो मानवता के लिए कहें गये जिनमें समाज की एकता के अक्स ,भलाई ,और दयानतदारी भरी हुई थी ।वे सब अनसुने कर दिये गये । इतनी हिंसा की साबरमती बहना भूल गई ।धारों का ,लहरों का स्तब्ध हो जाना ? भय ,आतंक, बर्बरता की सूक्ष्म संवेदना प्रकट होती है याने प्रकृति भी आहत हुई उन हिंसा के दृश्यों को देखकर ? मनुष्य तो हतप्रभ हैं ही ? समाज की वह चेतना जिसके सहारे समाज सौहार्द की निर्मिति करता है ।वहीं जब समाज के धुरी से मिटा दी गई तब ही तो समाज के वे प्रतीक ,वे स्मारक,वेआदर्श ,जिन पर समाज और जनसमूह गहराई से भरोसा करता है जब वे ही सत्ता के हमलों की निशानदेही पर होंगे तब ऐसे हालातों में जनसमूह की चेतना तो जागृत होना ही चाहिए ? इसीलिए तो कहा है जब शान्ति और अहिंसा के प्रतीकों पर सत्ता आक्रामक हो और उन्हें मिटाने की चेष्टा करें तब चुपचाप बैठने की घड़ी नहीं है ।क्या यह सारी सत्ता की कार्रवाई समाज से अहिंसा ,प्रेम , सौहार्द मिटाने के प्रयास नहीं ? इन प्रयासों के प्रति समाज को सचेत तो होना ही होगा ? अपने विवेक को ,न्याय बुध्दि को भी सतर्क करना होगा ।यह वक्त शान्ति , अहिंसा,प्रेम के हत्यारों को पहचानने का समय है ? समाज के हर नागरिक को अपनी पक्षधरता याने आत्मा पर हाथ धर कर यह सोचने का समय है कि हम समाज में हिंसा चाहते हैं ? या अहिंसा? हम समाज में अमन चाहते हैं या अस्थिरता ,अशांति ,खून- खराबा ,मार- काट लूट – पाट चाहते हैं इस का चुनाव हमें करना होगा ।मेरे ख्याल से कोई भी शान्ति और मार- काट को नहीं चुनना चाहेगा ?यह भयंकर दंगों का माहौल ही है जो हमारी चेतना को सक्रिय करता है कि हम बेवजह फैलाई गई धर्मान्धता की कालिमा को हटा दें दंगा ही वह दृश्य है जो हमारे सामने जलते हुए घर ,मकान,दुकान और बिखरती ,बिसूरती गृहस्थी के बिलखते बच्चे ,महिला और वृध्द जन बेबसी में आंसू पौंछ ने की कोशिश करते हमारी आंखों के सामने घूम जाते हैं ।हिंसा से प्रतिकार का तो एक ही तरीका है बस समाज में अहिंसा का आचरण अपना लेना ? क्या यह बेहतर बदला नहीं है हिंसा का ? नफरत छोड़ कर प्रेम को अपना लेना ,सबको समान मानना यही तो है हिंसा का बदला मनुष्यता में ढल जाना ।नफरत ने जिस तरह समाज को विभाजित किया है हम उसको प्रेम और अहिंसा के तागों से रफू कर सकते हैं ।समाज में दंगों ने जिस तरह से आदमी और आदमी के बीच के परस्पर भरोसे को तोड़ा है ,विश्वास को नष्ट किया है ,जिस प्यार की मिठास को तहस – नहस किया है ।उस सबको पुनः समाज में स्थापित किया जाना चाहिए ।उजड़े ,बिखरे समाज की कोई न तो पहचान होती है न कोई अस्तित्व,न कोई अस्मिता ,न कोई उन्नति ,न उसकी कोई गरिमा और गौरव ही होता है ।समाज की वास्तविक सम्प्रभुता तो उसकी जनता में होती है और यदि जनता ही लुटी – पिटी भयाक्रांत होगी ? उसके प्रतीक ही जब मिटा दिए जायेंगे तो वह अटूट भरोसा कहां खोजेगी ? महात्मा गांधी जी भारतीय समाज के ही अहिंसा के प्रतीक नहीं बल्कि वे विश्व मानवता के अहिंसा पुरुष के रुप में सर्वस्वीकृत हैं ।सत्ता के द्वारा फैलाए जाते दंगों के सत्य को तो नागरिक चेतना के साथ समझना ही होगा ।सत्ता चाहे जितना भय ,हिंसा फैलाए लेकिन जनता को अपने अमन और शांति के हित सर्वोपरि रखने चाहिए ।अपने प्रतीक पुरुषों ,आदर्श, स्मारकों के राजनीतिक स्तर हीनता के नियंत्रण में जाने से रोकने के लिए सजग रहना होगा ।
