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फकीर है पानी
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भूखे की रोटी प्यासे का नीर है पानी
नंगें की लंगोटी अक्खड़ का जमीर है पानी
करुणा का आंसू दुखिया की पीर है पानी
दुआएं बांटता फक्कड़ फकीर है पानी
प्रलय को विश्व का कहर है पानी
फसल को खेत का पलेवा है पानी
स्वाभिमान की नाभि का अमृत है पानी
अहंकार की दाढ़ी का जहर है पानी ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता में घुमक्कड़ साधु और बहता पानी दोनों समाज की भलाई करने वाले होते हैं । पानी कभी अपना प्रवाह नहीं रोकता और साधु कभी एक जगह नहीं स्थिर रहता यह उक्ति समाज में प्रचलित है ।जो साधु एक स्थान पर स्थिर हो जाए याने एक ही स्थान को अपना निवास बना लें उसका साधु धर्म और मर्यादा दोनों नष्ट हो जाती है ।इसी तरह यदि पानी अपना प्रवाह अशोक कर एक जगह पर जमा हो जाए तो उसमें विषाणु और कई तरह के जीवाणु ,रोग के किटाणु हो जायेंगे ।वह पानी पीने योग्य नहीं रहता ।फकीर ,साधु सज्जन व्यक्ति का भ्रमण और पानी की गतिशीलता दोनों समाज में चेतना , स्फूर्ति,और ताजगी का संचरण करते हैं। समाज में पानी से ही फसल की संभावना देखी जाती है ।वह है तो बहुत से मजदूर ,बहुत से मनुष्यों के लिए खाद्यान्न की संभावना दिखती है ।किसान जब उत्पादन करता है तो वह खुद के लिए नहीं होता वह पूरे मानव समाज के लिए श्रम करता है इसीलिए कहा है कि पानी भूखे की रोटी है ।पानी है तो खेत हैं ,खेत मजदूर हैं ,किसान है ,जनता है ,सत्ता है उपज है और उपज से भूख मिटती है ।पानी नहीं तो अकाल है ,सूखे खेत हैं और चारों तरफ विपन्नता ही विपन्नता हैं।इसी तरह धरती के ओर – छोर हर जीव की प्यास मिटाता है पानी ।जिसकी जितनी चोंच उसकी उतनी प्यास और उसमें समाता पानी ।पानी हर नग्न मनुष्य की लंगोटी है । मनुष्य की अस्मिता बताता है पानी ।पानी है तो हर प्राणी के भीतर वह उसकी शक्ति और ताकत होता है ।उसके अस्तित्व की गरिमा और शान होता है पानी ।निर्बल का बल है पानी याने अपने इलाके के चेतना का बखान होता है पानी ।जमीर है पानी ।पानी ही पहचान होता है आदमी की वैचारिक शक्ति की ।जो करुणा। की अश्रु धारा बनकर आंखों को नम कर देता है वह पानी का ही रुप होता है लेकिन वह मनुष्य के और हर प्राणी के अन्तर विचार का प्रमाण होता है ।करुणा विचार से उत्पन्न होती है वह केवल आंखों की नमी भरी नहीं होती ।करुणा में आंखों का नाम होना अन्तर धारा के वैचारिक स्तर का प्रमाण होता है ।जब हर प्राणी ,जीव मात्र सहृदय होकर चेतनावान होगा तब ही आंखों से करुणा की धारा बन आंसू बहेंगे ।करुणा वहीं अपना प्रमाण देती है जहां दुख की अनुभूति होती है ।पूरे संसार में दुखी व्यक्ति की पीड़ा का साक्ष्य है आंसू ? जहां दुख नहीं वहां आंसू भी नहीं । जहां सहानुभूति नहीं वहां करुणा और पीड़ा भी नहीं ।करुणा और पीड़ा में पानी हर तरह से शामिल हैं ।पानी सृष्टि का नियामक है । जहां जहां संसार और सृष्टि का सृजन है वहां वहां पानी रुपी फकीर की दुआएं ही है।ये वे प्रार्थनाएं हैं जिनके शब्द अस्फुट है ,अस्पष्ट है ,अनसुने हैं लेकिन मानव मात्र की भलाई और कल्याण के लिए कहें गये हैं ।ये अप्रगट शब्द हैं ।जो मानव के इतिहास की चेतना में रहस्य बनकर गुंथे हुए हैं ।प्रकृति के द्वारा मनुष्य को ही नहीं प्राणी मात्र को दी गई सबसे बड़ी दुआ है पानी ।पानी ही संसार का सबसे बड़ा प्रकट आशीर्वाद है जो संसार सृजन का चेतन तत्व है ।जीवन रक्षक पदार्थ है ।महाद्रव है ।पानी ही महाप्रसाद है ।पानी है तो जीवन है ।पानी का अभाव भी प्रलय है ।संसार के नाश की स्थितियां हैं ।पानी की बहुलता भी संसार पर कहर है ।विपदा है ।विनाश का सबूत है ।इसका प्रमाण है सागर में उठते तूफान ।नदियों में आती बाढ़ ।और यही पानी जब खेतों में पलेवा बनकर बहता है तो फसल का जीवन रक्षक है ।हर प्राणी की नाभि से जुड़ा हुआ स्वाभिमान होता है पानी ।पानी है तो गर्भ से लेकर धरती पर उतरने तक जिंदा रखने का जरिया है पानी । लेकिन यदि मनुष्य हो या सृष्टि का कोई भी प्राणी अपने अहंकार के भ्रम में मदमस्त हो जाए तो यही अवस्था उसके लिए जहर में डूबी दाढ़ होती है ।जिस तरह कहा जाता है कि सर्प के मुख में विष ग्रंथी होती है ।वह जब अपने पर खतरे का अहसास करता है तब उस विष ग्रंथी का इस्तेमाल करता है ।किन्तु मनुष्य में उसका अहंकार का भाव ही वह विष ग्रंथी है जो पानी अर्थात स्वभाव बनकर आदमी की दाढ़ में दबा रहता है ।यह जहर उसके पद,प्रतिष्ठा,धन- सम्पदा ,सत्ता ,शासन,ओहदा ,गरिमा,गर्व,और गौरव की दशाओं में समाया रहता है ।यह आत्म भ्रम की स्थितियां मनुष्य के हाव – भाव,विचार, मद,प्रमाद से झलकती है ।पानी लेकिन किसी का दास नहीं होता ।वह तो फकीर है ,साधु है किसी के बंधन में नहीं है ।वह स्वायत है ।स्वतंत्र है ।आजाद है ।मनमौजी है ।जिस तरह फकीर ,दरवेश, साधु ,संत ये समय ,दशा,और स्थान के आग्रही नहीं होते स्वतंत्र विचरण ही इनकी चेतना, गति और दिशा होती है । इसीलिए कहा जाता है रमता जोगी और बहता पानी कब किधर निकल चले कोई तय नहीं है ।धरती के नियामक तत्वों में अग्नि ,जल,वायु , पृथ्वी और आकाश चंचल हैं ।यही तो प्राणी मात्र के जीवन रक्षक और निर्माता तत्व हैं ।पानी ही धरती का सबसे बड़ा फकीर है ।जो धरती के कण – कण में समाया है ।संत ,साधु ,फकीर ,दरवेश सब इस संसार में स्वतंत्र विचरण करते हैं और पानी भी संसार की भलाई और कल्याण के लिए हर समय प्रवाहित रहता है ।साधु – संत की प्रकृति और पानी की प्रकृति समान चेतना की ही है । इसलिए पानी धरती का सबसे बड़ा फकीर है ।जो कल्याण चेतना के धर्म का संवाहक बना यहां – वहां प्रवाहित रहता है ।उसका प्रवाह ही उसकी सृजन चेतना है ।
विनीता रघुवंशी
