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बच्चों के स्मशान की बगल से
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बच्चों के स्मशान की बगल से
गुजरते हुए
कोई भी पद मत गुनगुनाओ
वरना गहरी नींद में सोए
मासूम जाग उठेंगे
उठते ही मांगेंगे
साबुत खिलौने
चाहेंगे —
अपने टूटे संकल्पों को
जोड़ने के सिलसिले
खाली हाथों के लिए काम
पढ़ने को स्कूल
चढ़ने को सर्ग नसैनी
खाने को रोटी -कांदा
तब तुम्हारे पास
दोना भर आटा भी नहीं होगा
उनके लिए
मचलेंगे सबके सब
कहानी के वास्ते
तब क्या सुनाओगे – – – ?
जानना चाहेंगे
कच्ची उम्र में मरने की वजह
और पूरी उम्र जीने के
मौलिक अधिकारों पर करेंगे सवाल
तब कौन – सा उत्तर दोगे उन्हें ?
जानना चाहेंगे
कि मां की गोद में अब भी —
उनकी पगथलियों के निशान हैं या नहीं
कि गांव की नदी के किनारे
उनके घरघूले कितने सुरक्षित हैं अब भी
और चांद सूरज धरती आकाश से
जो दोस्ती की थी हमने
वह अब भी कहां तक कायम है
तब तुम क्या कहोगे उनसे ?
जब वे जामुन के पेड़
फूली फूली अमराई
शरबती गेहूं
जला लिया का दलिया
पैंठ चरी गाय – भैंस का दूध
और हरे – भरे खेतों के लिए मचलेंगे
तो तुम किस तरह मना पाओगे उन्हें ?
इसलिए बेहतर है
बच्चों के स्मशान की बगल से गुजरते हुए
कोई भी पद मत गुनगुनाओ
वरना स्वतंत्रता का भय
और गहरा हो जाएगा तुम्हारा
और मनुष्यता के इतिहास से
स्वयं को बहिष्कृत पाओगे तुम ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता सूक्ष्म संवेदना से भरी हुई है ।आज समाज में जिस तरह की व्यवस्था कायम है ।जिस तरह के चलन प्रचलित हैं ।बचपन को वे तमाम बुनियादी सुविधाएं और जरुरतें नहीं मिल रही हैं जो उन्हें जीवन के नाम पर मिलना चाहिए ।समाज में आज बचपन की अबोधता का इस्तेमाल उनकी भरपूर उपेक्षा के लिए किया जा रहा है । उनके साथ वह व्यवहार जो अमानवीय है किया जा रहा है ? यह विचारणीय है ? बच्चों को जिस अकाल मृत्यु ने आ घेरा है उस सब के लिए हमारी सामाजिक परिस्थितियां ही जिम्मेदार नहीं हैं ? यह समाज के चिन्तन का विषय है ? क्यों हम बच्चों की नींद में खलल डालना नहीं चाहते ? क्या वे अपने हिस्से की दुनिया मांगने लगेंगे इसलिए ? उनके हिस्से की दुनिया का मतलब क्या है ? यह हम जानते हुए भी उनके लिए मुहैया नहीं कर पा रहे हैं ? यह दुनिया हम उन्हें नहीं दे पा रहे हैं ? उनकी दुनिया में क्या उनके लिए होना चाहिए ।यह भी समाज के चिन्तन में जरुर होना चाहिए ? बच्चों की मृत्यु के भीतर से जिस सवाल को बीच में लाया गया है वह मृत्यु का नहीं जीवन का सवाल है ? बेहतर जीवन जीने के लिए बच्चों के पास होना चाहिए —साबुत खिलौने ,टूटे संकल्पों को जोड़ने के सिलसिले ।ये सिलसिले क्या है ? जहां संकल्प हैं ,इरादे हैं ? ये इरादे हैं बड़े होकर डाक्टर बनने के इरादे ,बड़े होकर इंजीनियर बनने के इरादे ,बड़े होकर शिक्षक होने के इरादे ,बड़े होकर कारखाना मालिक होने के इरादे वकील बनने के इरादे ,न्यायाधीश बनने के इरादे बेहतर मिस्त्री और मजदूर बनने के इरादे ,बढ़िया कलाकार बनने के इरादे ,बढ़िया कारीगर और हुनर मंद बनने के इरादे या वह सब बेहतर मुकाम जो वे पा सकते थे ।एक बेहतर स्कूल के जरिए ? क्या आज की शिक्षण व्यवस्था ,आज की चिकित्सा व्यवस्था ,आज की न्याय व्यवस्था सब बच्चों के बेहतर जीवन की बुनियाद रखती है ? यह सोचने – विचारने का विषय है ? क्या बच्चों को सुनाने के लिए नैतिकता की कहानियां परिवार ,समाज ,और शिक्षा के पास बची हैं ? आज समाज जिस तरह से भ्रष्ट आचरण की गिरफ्त में हैं वहां बच्चों के लिए कोई किस्सा नैतिकता का बचा ही नहीं है और ना ही समाज में नैतिक मूल्य ही सुरक्षित बचे हैं ? यह हालात विचारणीय है ? आज पढ़ने के लिए स्कूल नहीं बनाए जा रहे वहां शिक्षा बेची जा रही है ? शिक्षा के असल मायने आज स्कूलों में खो चुके हैं ? शिक्षा आज बाह्य प्रदर्शन और दिखावों पर जा टिकीं है ,शिक्षा में व्यय की अधिकता और चेतना की न्यूनतम स्थिति देखी समझी जा सकती है । बच्चों के लिए पोषण के नाम पर कांदा – रोटी तक समाज और पालक के पास नहीं रही है ।समाज आदर्शों से रिक्त हैं ? यहां दोना भर आटा ? यह महाभारत कालीन प्रसंग है ऐसा माना जाता है कि कौरवों के गुरु द्रोणाचार्य धृतराष्ट्र की सभा में गुरु पद पाने के पूर्व बहुत ही विपन्न थे उनके पुत्र अश्वत्थामा को पिलाने के लिए दूध तक नहीं था तो उन्होंने बालक अश्वत्थामा की क्षुधा शान्त करने के लिए एक दोने में आटा घोल कर उसे दूध की तरह पिलाया था ।यह प्रसंग अति मार्मिक है । लेकिन आज के बच्चों के लिए गरीबी निर्धनता और बेरोज़गारी के कारण चुटकी भर आटे का भी इंतजाम कर पाना मुश्किल काम है । —” जानना चाहेंगे
/कच्ची उम्र में मरने की वजह / और पूरी उम्र जीने के / मौलिक अधिकार पर करेंगे सवाल / तब,कौन सा उत्तर दोगे उन्हें ? “
सच है हर बच्चा अपनी मौत का कारण जानना चाहेगा ? और उसका एक ही जवाब होगा –मुफलिसी ? गरीबी? निर्धनता ? असमानता ? क्या सही जवाब बन पायेगा ? एक बच्चे के मौलिक अधिकार सबसे पहले जीने के लायक बनती स्थितियां होनी चाहिए ? पालन कर्ता के पास बेहतर रोजगार हो , बच्चों के पेट भरने को आमदानी हो ।बच्चे जब जागेंगे तो उनके पास समाज से पूछने को बहुत से सवाल होंगे ,मां की गोद में पगथलियों के निशान कितनी मार्मिक अनुभूति और अहसास है जो केवल ममत्व से भरी मां ही समझ सकती है ।नदी किनारे घर घूले ,चांद सूरज को अपना दोस्त बनाना भले बहुत मासूमियत भरा हो लेकिन बच्चों की संवेदना में ये सब कायम होते हैं ।अब हमने बचपन को मैदानों छतों आंगनों से बेदखल कर दिया उन्हें फ्लेट की चार दीवारी में बांध दिया ।उनके पास कहां है बचपन की उन्मुक्तता ? बच्चो के भीतर बहुत से सवाल हैं जिनका जवाब तो युवाओं व्यस्कों और बुजुर्ग पीढ़ी को देना ही होगा ।ये सवाल ही तो उनकी मृत्यु की गुत्थी खोल पायेंगे ? कविता के अंत में जो दो पंक्ति है वह बहुत तंज भरी है ? बच्चों के जागने से युवाओं की स्वतंत्रता खत्म होने का भय ? यह भय क्या है ? आज की युवा पीढ़ी जिम्मेदारी से स्वतंत्र होना चाहती है और बच्चे का पालन – पोषण एक जिम्मेदारी है जिससे हर युवा भागना चाहता है इसलिए भी वह बच्चों के जीवन के प्रति गैर जिम्मेदार बन गया है ? यह विचारणीय संकेत और तथ्य है ? और युवा पीढ़ी का यह कृत्य मनुष्यता के बाहर खुद ब खुद हो जाने का प्रमाण है ? सन्तति संरक्षण हर मनुष्य की चेतना, संवेदना,और करुणा सहानुभूति से जुड़ा दायित्व है ।बच्चो के लालन – पालन और उनके जीवन को संरक्षित करना हर मानव का पहला धर्म है ।यदि ऐसा नहीं किया जाता तो आज की पीढ़ियों को मनुष्यता के इतिहास से स्वत: बाहर कर दिया जायेगा ।बच्चो के लिए भी लोरिया ,बाल गीत गाये जाने चाहिए ।बच्चे सन्तति संरक्षण के माहौल से समाज का निर्माण होता है ।यही हर मनुष्य का पहला कर्म है ।
विनीता रघुवंशी
