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विनीता रघुवंशी
औरत का सपना
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औरत के सपने मे प्रवेश करता आदमकद मर्द
और वह अंदर तक दाखिला देती उसे
करती ढेर – ढेर बातें
पूछती मर्द से मनपसंद औरत के बारे में
जो अक्सर उसके ही सपनों में आती होगी
सपनों को याद करता बताता वह
कि उसके सपनों में आती हर बात को मानती औरत
उसी के साथ जीती और एक पल को भी
नहीं लौटती अपने पुराने दिनों की तरफ —-
न बचपन में –न किशोर होती उमंगों में
न जवान होती चाहत में
और न मौका ही देती खुद को
कि अकेले में अपने से भी बातें करें कभी
या हंसें –रोए ,नाचे – गाए मर्जी से एकांत में भी
यह सुनते ही टूट आता औरत का सपना
और जागते ही खोजने लगती उसे —-
जिसे कह सके अपना — बिल्कुल अपना ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता में मनुष्य जीवन के बीच समाती पुरुष और स्त्री अस्मिता ,आकर्षण, अस्तित्व ,समर्पण और चाह,कामना के भीतर मौजूद स्त्री – पुरुष संबंध के मायने खोलती रचना है ।हर स्त्री के मन में एक पूर्ण पुरुष की छवि समाई रहती है उसी तरह पुरुष भी हर समय एक पूर्ण स्त्री की खोज में अपने मन को लगांए रहता है ।यह पूर्णता की तलाश ही मानव सभ्यता और संस्कृति की स्थापना का मूल विचार है ।इस समग्र संसार में पूर्ण स्त्री की धारणा ही वह अमूल्य विचार है जहां स्त्री पुरुष विग्रह की छवि को अपने समस्त क्रिया – व्यवहार में खोजती है ।यह पुरुष की पूर्णता ही स्त्री का अनमोल सपना है ।वह अपने सपनों को हकीकत में बदलने के लिए भी एक सपना बुनती है लेकिन सपने में भी पूर्ण पुरुष उसके भावनात्मक,उसके समूचे अस्तित्व और अस्मिता को अपने वशीभूत कर लेना चाहता है ।स्त्री का मनचाहा पुरुष सपनों में भी कहीं वर्तमान नहीं होता ? यह विडम्बना ही है कि जो मर्द औरत चाहती है वह उसका परिपूरक नहीं वरन उसके समूचे अस्तित्व पर अपना एकाधिकार बनाने वाला है ? यह स्त्री -पुरुष संबंध ही तो है जहां स्त्री का अपने आप पर अपनी चेतना पर ,अपनी संवेदना,अपने मन-मस्तिष्क का कोई वजूद नहीं ? यह वजूद से बाहर हो जाना ,अपने आप का विसर्जन कर देना ही आदम कद पुरुष की उपस्थिति यदि कहीं है तो वह स्त्री की चेतना कहां हुई ? ये बहुत से सवाल आदमकद ,पूर्ण पुरुष की चाह का सपना कितना कितना अपूर्ण है ? यह तो विद्यापति के पदों में राधा – माधव के सायुज्य सा हो गया — राधा राधा रटयित रटयित राधा भेलि मधाई ” याने राधा माधव का स्मरण कर रही है और खुद ही माधव में परिवर्तित हो गई ।जब एक है तो दूसरे की जरुरत ही कहां ? इसी तरह जब औरत पूर्ण पुरुष का सपना अपने मन में संजोती है तो पुरुष की मनपसंद औरत कौन सी है — जो कभी भी अपने पुराने दिनों में नहीं लौटे ।न कभी बचपन में न वह किशोर हो ,न जवान हो ,न उसके मन में उमंगें हो न वह खुद को कभी कोई अभिव्यक्त होने का मौका ही नं दे ,न कभी खुद के लिए नाचे न गाए ,न कभी अकेले में अपने आपसे तक बातें न करें ,न कभी अपने लिए रोए ,न कभी अपने लिए हंसें ही , उसका हास्य ,रुदन सब पुरुष के लिए ही हो यह है मर्द की मन पसंद औरत ? जब औरत का कोई अपना वजूद ही नहीं है और मर्द के मन में समाई औरत की छवि का आत्म विरुपण करके यदि पूर्ण पुरुष की प्राप्ति औरत को होती है तो फिर ऐसे सपने को यथार्थ में पा लेना तो चेतना के विपरीत ही है ? यह आत्म विसर्जन करके पाना औरत की उपलब्धि तो नहीं मानी जा सकती ? यह एक चेतना सम्पन्न और विचारवान औरत का सपना कैसे हो सकता है ? औरत भी मानवीय चेतना का ही एक प्रतिरुप है ।मर्द की मनपसंद औरत बनती औरत कहीं अपना अस्तित्व विसर्जन तो नहीं कर रही ? यह सवाल हर समय चिन्ता और चिन्तन का विषय है ।आज जो औरत के अस्तित्व और अस्मिता पर प्रहार किए जा रहे हैं वह विचारणीय है ? औरत को पूर्ण पुरुष की तलाश छोड़नी होगी ? पुरुष सत्ता के श्रेष्ठता के भ्रम को औरत को ही तोड़ना होगा ? औरत को अपनी गुणवत्ता स्वयं सिध्द करनी होगी ? अपने बौध्दिक अस्मिता को प्रकट करना होगा ? पुरुष छवि में अपनी गरिमा से बाहर आना होगा ? औरत का वजूद आत्मार्पण में नहीं वरन समाज में मनुष्य बनकर पूर्ण औरत के रुप को धारण कर उभरना होगा। ,वह सहधर्मिणी है ,वह सह चेतना गामी है , वह पूर्ण मनुष्य है ,वह वैचारिक सत्ता की प्रतिनिधि हैं , वह शक्ति स्वरुपा है , वह संवेदना की छवि और करुणा मयी है ।उसे खुद से खुद की पहचान बढ़ानी होगी ।तब ही वह पूर्ण पुरुष के मन – भावन छवि को पा सकेगी ? अपनी इयत्ता ,अपने आत्म- रुप को औरत को अपने अंदर ही खोजना चाहिए ।पुरुष की दृष्टि में समाई औरत अपना वजूद खो चुकी औरत है ।यदि औरत को खुद का वजूद खोजना है ? अपनी पूर्णता तलाशनी है तो वह खुद औरत बनकर तलाशनी होगी ।पुरुष के अनुरुप बनकर तो उसका अस्तित्व और अस्मिता दोनों नष्ट होगी । औरत ही वह अस्मिता है जो पुरुष की छवि का निर्माण करती है और अपने वजूद से उसे बड़ा बना देती है ।औरत का अपने वजूद में अपने आपको खोजना ,स्थापित करना ही औरत का सपना होना चाहिए ।औरत और मर्द के वजूद का महत्व अलग अलग भूमिका में अलग अलग है ।औरत के दायरे और मर्द के जगत दायरे अलग – थलग है ।औरत हर वक्त एक अपनी संवेदना और सहानुभूति रखने वाले मर्द की तलाश में जुटी होती है ।जो औरत के मन को समझें ,उसके दुख ,संताप,पीड़ा,व्यथा ,वेदना को गहरे से महसूस करें ।औरत के मन को पढ़ने की ,समझने की ,चेतना और विचार भूमि को जान सके वहीं औरत के मन का अपना मर्द होता है ।मर्द सपनों में नहीं बल्कि औरत को अपने यथार्थ से जुड़े हुए मर्द को तलाशना चाहिए ।औरत का पुर्ण पुरुष यथार्थ का साथी हो सपनों में छवि बनाता मर्द तो औरत के वजूद को पूर्णतः अपनी मुट्ठी में समेट लेने वाला होगा ? औरत को सपनों से बाहर आना होगा ।अपने संवेदना ,करुणा ,सत्य,दया और भावना की भूमि पर ही खोजा गया मर्द पूर्ण पुरुष होगा ।औरत और मर्द सपनों के नहीं यथार्थ की जमीन का हिस्सा होते हैं ।यही सर्वमान्य सत्य है ।
