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छोड़ दिए जाते बेगुनाह
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( २ )
अंश एक से आगे
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आसपास से उमड़ती
उच्छृंखल भीड़ों के उपद्रवी चेहरे
घेराव,आगजनी, और बलात्कार की
स्याह मंजिलें पार कर
ले रहे सांस
रोज – रोज की
बर्बर घटनाओं के शर्मसार से
झुकता जा रहा इतिहास
धर्म निरपेक्षता को
सिंगार रहे धर्म परायण
स्वालम्बी पढ़ रहे पराई रामायण
और मानवीय प्यार
किसी पेन्शनर की
धरोहर- सा बन गया है
अन्धकार शिक्षा का —
स्थायी सचिव हो गया है
सत्ता के पेड़ पर
फहरा रहे
अधिनायक के सम्मोहक झण्डे
कृषि प्रधान देश
राशन की दुकानों में पिचक रहा
और उधर
पेट पर हाथ फेरते हुए
गपागप सटकाते जा रहे
राज्याश्रित पण्डे
जिनके बगीचों में आधीरात के बाद
खिलाये जाते हरसिंगार
सुबह होते ही वे सब
मसल कर फेंक दिये जाते
बंगलों के बाहर
बापू,हम रोज- रोज
तेरी हत्या में रंगे हाथ पकड़े जाकर भी
छोड़ दिए जाते बेगुनाह
कोई हमें धिक्कारता तक नहीं
और राजघाट से राजभवन तक
खूनी छापे लगाते जुलूस
जिनके स्वागत में बढ़ जाते त्यौहार
दूरदर्शन से प्रसारित होने लगते
स्पेशल बुलेटिन – स्पेशल समाचार
मातृ प्रतिमा से कई गुना भव्य
बनाये जा रहे नन्दी
तमाम स्वप्न ऋचाएं कर दी गई
किसी अंधे तहखाने में बंदी
और धूप दीप की जगह
अश्रुगैस से सन रहा वातावरण
चौबीसों घण्टे कुर्सियों की परिक्रमा के लिए
अनवरत मंत्रोच्चारण
कुछ जुबानें
जो महाप्रसाद से हो गई वंचित
उन्हें काट कर
दबा दिया मेजपोश के नीचे
कल तक जो करते थे
इस पूजा पध्दति का विरोध
आज वे बैठे हैं
संग्रहालयों में आंखें मीचे वह
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज वर्तमान राजनीतिक माहौल जिस तरह के रंग – ढंग में हमें दिख रहा है वह सब हमारी नागरिक चेतना के खो जाने का परिणाम है ।जब हमारे देश को आजादी मिली और महात्मा गांधी की हत्या कर समाज में भय और अपराध समूह की जय का स्वर गूंजने लगा ।जन मानस हतप्रभ होकर निष्क्रिय हो गया ।वह केवल उदर पूर्ति और सरकारी अमला भर बन कर चाकरी बजाने लगा ।तब यह जन मानस की सबसे बड़ी भूल थी ।गांधी के बाद भी हत्यारों की पहचान और सवाल तो किये ही जा सकते थे ? जन मानस इतना निष्क्रिय हो गया कि वह एक पूर्ण आदमी कद छवि के पीछे छुप गया । लोकप्रियता का आडम्बर इतना विराट हुआ कि जनता के बुनियादी सवाल उसमें अपना अस्तित्व खो रहे थे । देश की रक्षा का सवाल ,देश के खाद्यान्न की समस्या , देश की प्रतिभा का पलायन ,देश की रोजगार की स्थितियां , जबकि आजादी के बाद देश में उद्योग – धंधें स्थापित हुए ,बड़े बांध बने ,बड़े बड़े कारखाने और औद्योगिक इकाइयों बनी , खाद्यान्न में देश आत्मनिर्भर हुआ ,हरित क्रांति हुई ,श्वेत क्रांति हुई। लेकिन आज वह हर मोर्चे पर विफल है । समस्याएं बढ़ी ।पंचशील की तटस्थता की नीति और विदेश नीति के आधार बदल गये ।विदेश नीति का आधार मुद्रा ,धन ,व्यापार बन गये । देश की सम्प्रभुता नतमस्तक होने लगी । जनता का अस्तित्व खतम हो गया । लोकतंत्र के भीतर ही अधिनायक तंत्र का चेहरा उभरने लगा ।धीरे – धीरे जनता की उपेक्षा ,सत्ता पर सीधा दखल बेमानी हो गया ।चुनाव प्रक्रिया धोखा तंत्र में बदल गयी । उच्छृंखल युवा पीढ़ी और काल पात्र के अंधेरे में उतारी जाती ऋचाएं जो मार्ग पर उजाला फैला सकती है ।यह भी बहुत बड़ी दुविधा ही है कि जिस देश में अहिंसा का पुजारी महात्मा गांधी ने जन्म लिया उसी देश में उसे रोज संवेदना शून्य समाज के द्वारा रोज मारा जाता है ।समाज पूरी तरह से चेतना हीन और वैचारिक रुप से रिक्त हो चुका है ।वह लोकतंत्र और आजादी को रोज रोज न्यायालय में ,संसद में विधानसभाओ में दफ्तरों में मार रहा है ।राजघाट से लेकर राजभवनों तक हत्या के छापे रोज रोज रखें जा रहे हैं लेकिन अवाम है कि पूरी तरह से बेहया ,बेशर्म ,और निर्लज्ज हो गयी है । मतदान पैसे लेकर हो रहा है ,सांसद बिक कर सत्ता हथिया रहे हैं , विधायक अपना मोल वसूल रहे हैं ।दल नैतिक जिम्मेदारी और मूल्य चेतना भूल गये हैं । चहुंओर भ्रष्टाचार की माया खुले आम नंगी नाच रही है । संवैधानिक संस्थाएं मृत घोषित हो गई है ।उनका कलेवर है योजनाओं के बजट को हड़पने के लिए ,उनका वास्तविक अस्तित्व और वैधानिक वजूद समाप्त हो चुका है । जनता विचार करना भूल चुकी है और अपने वजूद की अहमियत भी विस्मृत कर चुकी है ।ऐसी स्थिति में सत्ता की क्रूरताओं का दबाव उसे झेलना पड़ रहा है ।आत्महीन जनता के द्वारा जिस तरह बापू हम तुम्हारी हत्या में लिप्त हैं लेकिन रोज छोड़े जा रहे हैं बेगुनाह की तरह ? जनता ही वह गुनाहगार है जिसने गांधी को मारा ? जो रोज रोज ऐसे समझौते कर रही है जिससे गांधी की राष्ट्रभक्ति, अहिंसा,सत्य ,नैतिकता ,मूल्य चेतना सिध्दांत आहत हो रही है । हम सब ने गांधी का मार्ग छोड़ा और हम सब गांधी के हत्यारे बन गये ? हमारे भीतर की संघर्ष चेतना का हृास ही तो गांधी का हत्यारा है ?
विनीता रघुवंशी
