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रोटियों के शिल्प-आंगन बुहारते वक्त

by Dr. Vinita Raghuvanshi
रोटियों के शिल्प
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रोटियों के शिल्प को लेकर
कोई ज्यादा तरक्की न हो सकी आज तक
अब भी गोलमगोल है रोटियां
जो तोड़कर टुकड़ा -टुकड़ा
खायी या खिलाई जाती हर जगह
और जिन्हें पाने की क्रिया में
मौजूद हैं अब भी
प्रतिक्रियाओं के ऐसे -ऐसे हस्तक्षेप कि —
कई मर्तबा हाथों में
धरे के धरे रह जाते हथियार
और रोटियां छीना- झपटी की शिकार हो
टुकड़ा -टुकड़ा होती रहती हर कहीं ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– “ आंगन बुहारते वक्त ” से उद्धृत )
आज की कविता आदमी की उस संवेदना से जुड़ी है जो भूख के अहसास का संकट है ।यह मामूली संकट नहीं है ।हर प्राणी की हर हलचल का सिरा इस भूख के अहसास से जुड़ा हुआ है ।पेट की इस क्षुधाग्नि को बुझाने के लिए ही हर प्राणी अपनी क्षमता के अनुसार उद्यम करता है ।आदमी ही ऐसा प्राणी है जो अपनी क्षुधा तृप्ति के लिए व्यवस्थित प्रबन्ध अथवा इन्तजाम करते पाया जाता है । रोजगार से शुरु होती दिनचर्या आदमी की भूख और रोटी का ही इन्तजाम करने की सभी तैयारियां पूरी होती है । प्राणी मात्र और देखा जाये तो आदमी की भूख और रोटी का गहरा रिश्ता है ।रोटी की बनावट में भले ही युगों युगों से कोई खास बदलाव नहीं आया लेकिन रोटी के जायके बहुत तरह और बहुत भांति के बदलते रहे ।आदमी के रोटी के लिए ही जुगाड़ के बहुत सारे किस्से और बन्दिशों के हलफनामे भी जुबानों पर चढ़े मिलते हैं ।आदमी की सबसे पहली और सबसे बड़ी लड़ाई ही रोटी याने रोजगार की लड़ाई है ।यदि रोजगार ,काम -धंधें का सुभीता सरलता से मिल जाता है तो आदमी की शख्सियत में बदलाव आ जाता है ।आज आदमी को यदि मिटाया जा रहा है तो उससे रोजगार के साधन जरिए छीने जा रहे हैं ।आदमी को यदि पस्त हिम्मत करना है ।हौंसला तोड़ना है तो उसको बेरोजगार कर दो ।वह खुद ब खुद मर जायेगा ।रोजगार ही आदमी की हौंसला अफजाई करता है ।वह पल के पल में अपने उद्यम के बूते मैदान जीत लेगा ।हर संघर्ष हर लड़ाई हर हमला हर दुख का सामना कर सकेगा । लेकिन आज के इस आधुनिक समय में यदि आदमी से कुछ छीना जा रहा है तो उसके काम करने , रोजगार करने , आमदानी के जरिए ,पर रुकावटें खड़ी की जा रही हैं ।आदमी की भूख से खेला जा रहा है । आमदानी के जरिए पर पहरे बैठाए जा रहें हैं ।ऐसे हालात ही तो आदमी को विवश कर देंगे लूट के लिए । बेरोजगार लोगों के जन समूह भी खूनी संघर्ष के लिए आमादा हो जाते हैं ।भूख ही वह सबसे बड़ी लड़ाई का कारगर हिस्सा है जिसके सामने हथियार भी उठने से इंकार कर देते हैं ।यह रोटी नहीं रोजगार की लड़ाई की दरकार है ।रोजगार के लिए किया जाता संघर्ष भी कई मर्तबा रोटी के हिस्सेदार बढ़ा देता है और रोजगार के बंटवारे हो जाते हैं ।याने दो खाली जगहों को भरने के लिए बीस हजार आवेदन दाखिल हों तो एक रोटी के कितने हिस्सेदार बन गये ।कभी कभी नहीं अक्सर सत्ताएं और सरकारें खुद रोजगार के अवसरों को घटाने का खेल रचती है और बेरोजगार उस खेल का हिस्सा बन कर अपनी साबुत रोटी के टुकड़े टुकड़े होते हुए देखते रह जाते हैं ।यह सत्ता का मनोरंजक खेल हो चुका है ।यह सत्ता में बैठे धनपति ,राजपति ,और कुबेरों का दिलचस्प खेल है ।रोजगार ,उद्यम,काम,धंधें सब मेहरबानियों के हाथों में भीख या नियामत की तरह अटकी हुई है ।कविता की इस पंक्ति में ही हालात का मर्म छुपा हुआ है –” प्रतिक्रियाओं के ऐसे- ऐसे हस्तक्षेप कि — ” भूखों पर लाठी बरसाना या गोली दागना या जेल में डालना या दण्ड देना सब फिजूल की कार्यवाही लगती है । क्या भूख को हथियारों से काबू में किया जा सकता है? यह तो जठराग्नि है जो दोनों वक्त बिना नागा जलती रहती है ।इससे खेलना याने मनुष्य का राक्षस हो जाना है या पशुता की पराकाष्ठा को पार कर जाना है ।भूख को शान्त करने के लिए यह हर समय नैतिक जिम्मेदारी है कि रोटी के टुकड़े न ही किये जायें ।मतलब स्पष्ट है कि रोजगार ,रोजी और रोटी के बीच खाई पैदा न की जाये ।रोटी रोजी से जुड़ी है खैरात कितने समय तक पेट भर सकती है विचारणीय तो यह भी है ? आदमी रोटी के लिए ही कई- कई तरह के समझौते ,बहुत भांति- भांति के दबाव शोषण और अनुभव के बीच संतुलन बनाता रहता है ।यह समझौते यह गरदन झुकाए रखना या जान की जोखिम उठा कर भी रोटी का टुकड़ा सम्भाले रखना या समर्पण कर देने की लज्जाजनक स्थितियों को भी झेल जाना यह सब वे प्रतिक्रियाएं ही हैं जहां वह अपने रोटी के टुकड़े को बचा लेने का मकसद जोड़े रखता है ।आदमी को इससे कोई मतलब नहीं होता कि रोटी का आकार -प्रकार कैसा है ? उसके लिए सबसे बड़ा मायना है भूख के मुताबिक रोटी का टुकड़ा मिल जाना अर्थात रोजगार और रोजी ही आदमी को आदमी बनाये रखने के लिए बेहद जरुरी है ।यह सवाल और मायने बेहद अनमोल हो जाते हैं जब पूरा समाज अपने वर्तमान में बेरोजगारी से जूझ रहा है ।युवाओं की हताशा भरी आत्म हत्या इसका विकल्प नहीं वरन हताशा के बीच से रोटी रोजी का इन्तजाम ही बेहतर समाधान है ।समाज को चेतना के साथ विचार करना चाहिए।
हरदा बलास्ट के अनाम दिवंगतों को हरदा वासियों और मेरी ओर से सादर नमन🙏💐 विनम्र श्रद्धांजलि
🙏विनीता रघुवंशी

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