Home आज की कवितागूंगे पन की कसमसाहट

गूंगे पन की कसमसाहट

by Dr. Vinita Raghuvanshi
गूंगे पन की कसमसाहट
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अग्नि ने कोई शब्द नही रचा
न जल ने
न वायु ने
और पुष्प कभी बोलते नही
आकाश ने कोई भाषा नहीं रची
न नक्षत्रों ने
न पृथ्वी ने
और क्षितिज कभी मुँह खोलते नहीं
किन्तु कर्म के अंतर्नाद से
सदैव ही अपनी संपूर्णता में
सब कुछ कहते हैं ये
और एक आप हैं कि
भाषा में रहकर
अभिव्यक्ति के आगे
गूंगेपन की कसमसाहट लिये
अब भी
मुँह बाये खडे़ रहते हैं !!
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह “नर्मदा की लहरों से ” उद्धृत )

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