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विनीता रघुवंशी
इतना ही नहीं सोचा
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जब देने ही निकले
तो गालियां ही दी तुमने !
दुआएं भी तो दे सकते थे
जबकि दोनों ही आवाज की बेटियां हैं !!
इतना भी नहीं सोचा
कि वे सब पलटकर
कलोंच जैसी चिपकती रही तुम पर !
तुम्हें तो होली से
खेत की मुट्ठी भर बालियां सेंक —
प्रतुल भर अंगारे लेने भेजा था मां ने
लेकिन तुमने तो —
अपना चेहरा ही झुलसा लिया वहां !!
अब कहां पा सकेंगे पिता —
पुत्र गर्व का भरोसा तुममें ??
वो देखो ! भोर से
रेवा में नहा धोकर लौटी भौजी
नए गेहूं का
प्रांत भर आटा मीड़े
खण्डों का जिला लगा रही है
और पहले रोक की मंगल होम से
घर – आंगन – गांव को महकाने
मलरियों की माला संजोए
चौके में बैठी अन्नपूर्णा मां
रसोई बनाने को आतुर
चूल्हा चेताने की चिन्ता में
बार बार उसांसें ले रही है !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह की पांडुलिपि —- ” पकी फसल के बीच ” से उद्धृत )
गाली और दुआ दोनों आवाज की ही बेटियां हैं । यह कितना मामूली होते हुए भी बहुत ही विचारणीय है ।कविता में मनुष्य के ,युवाओं के संस्कार पर सवाल उठाये गये हैं ।होली भारतीय संस्कृति का बहुत ही महत्वपूर्ण त्यौहार है । इस उत्सव के माध्यम से समाज में व्याप्त द्वेष पूर्ण सम्बंधों को रसमय बना कर सरसता का माहौल बनाया जाता है ।समाज में आई खटास, बिगड़े रिश्ते , उखड़े सम्बंधों को क्षमा मांगकर, गले मिलकर , रंग – गुलाल लगाकर समरसता पैदा की जाती है । समाज के बीच पसरी गलत फहमियो को दूर किया जाता है । आपसी रिश्ते सुधारे जाते हैं । आज की युवा पीढ़ी विचार विहीन बनी इस पर्व के सांस्कृतिक महत्व को भुलाकर केवल वैमनस्य और रंजिश निकालने का पर्व बना बैठी है ।होलिका दहन हमारा पौराणिक प्रसंग से जुड़ा मिथक है । होलिका हिरण्यकश्यप की बहन थी । हिरण्यकश्यप को यह वरदान था कि वह न रात में मरेगा न दिन में ,न नर से न पशु से न घर के अन्दर न बाहर ।उसके इसी वरदान की रक्षा करने के लिए नरसिंह का अवतार हुआ और इस भक्त प्रह्लाद के जीवन की रक्षा हुई ।इस प्रसंग के प्रतीक स्वरूप होली का उत्सव मनाया जाता है ।आज की युवा पीढ़ी आधुनिक रंग – ढंग में रची इन उत्सवों के सांस्कृतिक महत्व को भुला बैठी है और बस त्यौहारों को रंजिश ,दुश्मनी ,और द्वेष रचने के लिए उपयोग करती है । प्रौढ़ पीढ़ी सांस्कृतिक प्रसंगो के अनुरुप परम्परा का निर्वाह करते हुए होली दहन से करछुल भर आग से अपना बारह महीने का चूल्हा चेताना चाहती है क्योंकि होलिका की आग पवित्र आग है ।द्वेष रहित आग , सभी तरह के विकारों को भस्म कर चुकी आग ।किन्तु आज की पीढ़ी इस तरह के आस्था – भाव को भूल चुकी है ।वह दुआ का ,मंगल कामनाओं का सार्वभौमिक अर्थ और असर से नावाकिफ है । वह अपशब्द कहने , गालियां देने में ज्यादा भरोसा करती है ।उसके लिए भौजी का रेवा में स्नान कर भोजन बनाने की शुद्धता में भी विश्वास नहीं है ।वह अपनी संस्कृति से बहुत दूर जा चुका है ।वह संस्कृति के बेहतर मायने से भटक गया है ।उसके लिए संस्कृति का प्रयोग विकार ,विद्वेष, बदला और अमानवीय कृत्य में हिंसक हो गया है ।जबकि संस्कृति मानवीय लोक व्यवहार का ही सृजन करती है ।आज के युवा पुत्र गर्व के संदर्भों से रिक्त हो चुके हैं ।उनमें स्वार्थ ,ईर्ष्या,द्वेष के ऐसे गलत अर्थ और संदर्भ रच दिए गये हैं कि उनके आन्तरिक जगत में संस्कृति मटमैली हो गई है । मां उसांसें ले रही है , उसका अन्नपूर्णा का रुप विकल है ।वह परम्परा का निर्वाह करना चाहती है लेकिन पुत्र के सांस्कृतिक भटकाव ने उसे बेबस कर दिया है । प्रहलाद की दृढ भक्ति पिता हिरण्यकश्यप को सही रास्ता दिखाती है लेकिन आज वर्तमान में पुत्रों के सांस्कृतिक भटकाव ने पिताओं को चिन्ता में डाल दिया है ।मां उसांसे लेने को मजबूर हैं । भौजी आटा मीड़े जगरा लगाने बैठी है । सारी परम्परा तहस – नहस हो चुकी है क्योंकि युवा पीढ़ी के सांस्कृतिक भटकाव और नासमझी ने समाज की वैचारिक दिशा बदल दी है ।आज युवा पीढ़ी को अपने परम्परागत वैचारिक सांस्कृतिक सन्दर्भों को सही तरीके से समझना होगा । सांस्कृतिक उत्सव ,पर्व और त्यौहार उच्छृंखल हरकतों , सीमाओं , मर्यादाओं को विकृत करने के माध्यम नहीं है बल्कि इनके माध्यम से समाज को सृजन की दिशा में मार्गान्तरित किया जा सकता है । समाज के निर्माण का रास्ता तलाशा जा सकता है ।एक बेहतर कार्यसंस्कृति को समाज की बुनियादी वैचारिक बदलाव के लिए प्रयोग किया जा सकता है ।युवा पीढ़ी को वर्तमान में विचार शून्य नहीं वरन विचार वान होना चाहिए ।समाज के सांस्कृतिक उत्थान के लिए पाखंड का नही वरन सच्चाई से युक्त आस्था की जरुरत है ।जीवन के स्वर में यदि आस्था होगी तो समाज विकृत संस्कृति के हिंसक पाखंड से मुक्त हो सकेगा । विचार से दायित्व निभाती युवा पीढ़ी ही आज की जरुरत है । वैचारिक समझ युवाओं को ही बनानी है । उन्हें ही संस्कृति के , राष्ट्र के गहन प्रश्नों पर विचार करना है । बुजुर्ग और प्रौढ़ पीढ़ियां युवाओं का पथ प्रशस्त करने का बेहतर दायित्व निभा सकती है ।विचार की भूमिका में समाज की सभी पीढ़ियों को गहन और गंभीर चिन्तन अवश्य करना होगा ।
