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पृथ्वी के जन्म पर
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पृथ्वी का जन्म हुआ तो
पहले पहल चुम्बन को दौड़ आया सूरज
हवा ने डाल दिये झूले डाल – डाल
और इतने इतने गीत रचे निर्झरों ने
कि वे सदा – सदा को कल- कल छल छल हो गये
पृथ्वी का जन्म हुआ तो
बिना सलवटें खाये पूरी की पूरी चांदनी
बिछ गई चादर – सी
छा गया लिहाफ – सा आकाश
और प्रकृति की छाती से
फूट पड़ी वात्सल्य की असंख्य रंगीन लहरें
पृथ्वी का जन्म हुआ तो
जहां जहां दृष्टि डाली उसने
वहां वहां प्रार्थना- सा किलक उठा जीवन
और जड़ से चेतन तक
व्यक्त हो उठी प्रकाश की भाषा
पृथ्वी के
जन्म पर !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पकी फसल के बीच ” से उद्धृत )
यह उक्ति सर्वथा सत्य ही है कि — ” जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि ” ।पृथ्वी के जन्म की उद्भावना सचमुच अद्भुत और अनूठी है । किसी भी मनुष्य के मन में इस तरह का विचार उत्पन्न नहीं हो सकता कि जब ब्रह्माण्ड में पृथ्वी का जन्म हुआ होगा तो क्या क्या अद्भुत नजारे पैदा हुए होंगे ।पृथ्वी के आगमन का स्वागत किन किन ने किया होगा ।जब पृथ्वी जन्मी होगी तो उसके पूर्व ब्रह्माण्ड में कौन कौन से ग्रह ,कौन कौन से तत्व उपस्थित रहे होंगे ।पृथ्वी जन्मी तो सबसे पहला ग्रह सूरज ब्रह्माण्ड में चक्कर लगा रहा था और पृथ्वी के जन्म लेते ही वह सबसे बुजुर्ग मुखिया की तरह पहला चुम्बन पृथ्वी को देने पहुंचा यह कोई मामूली बात नहीं है ।यह आगमन का स्वागत है सूरज के द्वारा पृथ्वी का । सूरज ही तो है पृथ्वी पर जन्म लेने की परिस्थितियां बनाने वाला ग्रह । इसीलिए तो पृथ्वी सूर्य की निरंतर परिक्रमा करती है ।सूर्य पृथ्वी के पारिस्थितिक चक्र को नियमन करता है ।हैं न पृथ्वी और सूरज का अनमोल रिश्ता । बिना सूरज के पृथ्वी का कोई मोल नहीं ।पृथ्वी के आगमन पर हवा ने उसकी अगुवाई की और पेड़ों की डाल डाल पर झूले डाल दिये पृथ्वी के लिए सिरजा प्रकृति ने पहला झूला ।नन्ही मुन्नी पृथ्वी का आगमन और उसके अनूठे स्वागत का अंदाज भी अनूठा ।निर्झरों ने अपनी कल कल छल छल से पृथ्वी के आगमन पर गीत रचे और प्रकृति का कण कण गीतमय हो गया । चांदनी चादर सी बिछ गई । नन्हीं पृथ्वी के मुलायम बिछोने- सी । चांदनी की चादर कितनी मोहक कल्पना है। इतनी इतनी कोमल और मुलायम नरम चांदनी का बिछोना अद्भुत । उस पर ओढ़ने के लिए लिहाफ बना आकाश । उदार घना विस्तृत और सर्वव्यापक आकाश का कोना कोना ज्ञान से भरा उजला आकाश । धवल कपास – सा । प्रकृति में जो फूल – फल के भांति – भांति के रंग – बिरंगे पन लिए हैं वह भी। पृथ्वी के जन्म पर प्रकृति की खिलखिलाहट ही है । यह प्रकृति का वात्सल्य भाव ही व्यक्त हुआ है । पृथ्वी एक अपरुप बालिका है और उसने जहां जहां अपनी दृष्टि डाली वह सब अपरुप हो गया ।जीवन मय हो गया ,प्राणमय हो गया । यह पृथ्वी के जन्म का रुपक रचा गया है ।जिस तरह मलिक मोहम्मद जायसी पद्मावती के रुप को पारस कहते हैं और उसने जिस जिस को छुआ ,स्पर्श किया वह सब रुप मय हो गया ।अर्थात पृथ्वी पर जहां भी सौन्दर्य है वह सब पद्मावती के रुप – स्पर्श का ही प्रभाव है ।इसी तरह पृथ्वी ने जहां जहां भी दृष्टि डाली वहां वहां प्रार्थना सभा जीवन किलक उठा । जहां जहां भी जीवन का स्वर समाया हुआ है वह सब पृथ्वी की दृष्टि के स्पर्श का परिणाम है । पृथ्वी की दृष्टि के फलस्वरुप ही जड़ से लेकर चेतना तक सब जो अभिव्यक्ति की प्रकाश मय भाषा दिखाई और सुनाई देती है वह सब पृथ्वी की अपरुप दृष्टि का ही नतीजा है ।यदि पृथ्वी का जन्म नहीं होता तो यह संसार का सृजन भी महसूस नहीं होता ।ब्रह्माण्ड के पंच तत्वों में पृथ्वी ही वह चेतन तत्व है जिसके जन्म के साथ ही अदृश्य सृष्टि दृश्य रुप में व्यक्त हो पाई । पृथ्वी के होने पर ही संसार का अस्तित्व संभव है ।यदि पृथ्वी न हो तो संसार की संभावना भी नहीं हो सकेगी । पृथ्वी के साथ ही प्रार्थना सभा जीवन संभव है ।यह विचार भी बहुत ही अनूठा है कि पृथ्वी के जन्म के साथ ही प्रार्थना सभा जीवन किलक उठा ।याने जीवन ही पृथ्वी पर अवतरित वह पहली दुआ है, वह प्रार्थना है , वह मन्नत है जिसमें लोक कल्याण और लोक मंगल की अभिलाषा समाई है ।जीवन है तो आस्था है । पृथ्वी पर जहां भी जीवन की किलक है वह प्रार्थना का ही समुच्चय है
विनीता रघुवंशी
