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नामुमकिन-नहीं रहने के बाद भी

by Dr. Vinita Raghuvanshi
नामुमकिन
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नहीं पढ़ी होती हयग्रीव की कथा तो मैं भी
तुम्हारे द्वारा लगातार परोसी गालियां खाते हुए
लगातार मुस्कुराता नहीं वत्स !
वेदों को चुराने तक तो क्षम्य था हयग्रीव
क्योंकि तब कंठस्थ थे लोक को वेद
लेकिन उसने जब पूरा देवलोक ही मांगना चाहा
तो अन्तर्ध्यान हो गये थे
विष्णु यह जानते हुए कि
जब भी ग़लत हाथों में चला जाता है राज्य ,
तो वहां की प्रजा जीते जी मर जाती है ।
जब तुम्हें देने वाला था अपना ब्रह्मास्त्र
तुम अपनी गुलेल से चिड़िया मार रहे थे
तब मैंने महसूसा कि उस वक्त तुम हयग्रीव हुए जा रहे थे
तभी से मैं तुम्हारे लिए अन्तर्ध्यान हूं वत्स ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– ” नहीं रहने के बाद भी ” से उद्धृत )
आज की कविता में आदमी के विचार और विवेक की परख को संवेदना और करुणा के धरातल पर मापा गया है । कविता में हर बार हयग्रीव की अवान्तर कथा को प्रासंगिक बना कर प्रयोग किया गया है । हमारे पुराणों और उपनिषदों में ऐसी बहुत सी कथाएं हैं जो हमारे विवेक को जागृत करती है ।जो हर बार हमारी निर्णय क्षमता को धारदार और तटस्थ बनाती है ।यह भी रेखांकित करती है कि प्रजा का विवेक कैसा होना चाहिए और उसे अपना राजा या लोक नेतृत्व कैसा चुनना चाहिए । हयग्रीव और अवतारी ईश्वर के वरदान में भी विवेक की महत्ता पर संकेत निर्देशित है । हयग्रीव एक पौराणिक पात्र हैं ।जिसने ब्रह्मा जी से वेदों को चुरा लिया था । हयग्रीव के द्वारा चोरी का अपराध तो फिर भी लोक क्षमा कर सकता है लेकिन उसका निष्करुण रुप और समाज पर ,ऋषियों ,मुनियों ,साधु -संतों पर किये गये अत्याचार और घोर यातनाएं अक्षम्य कृत्य थे ।इन करुणा हीन और संवेदना को नष्ट करते अपराध को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है । हयग्रीव एक उदण्ड पात्र हैं जो समाज के नीति नियम अनुशासन विधान को न मानते हुए अपनी गति अर्थात घोड़े की शक्ति अर्थात हार्स पावर का अनुचित उपयोग किया ।यह का मतलब होता है घोड़ा और घोड़े के दैहिक बल को सभी पशुओं में सबसे ज्यादा माना जाता है ।यह ग्रीव अर्थात घोड़े की शक्ल और शेष तन मनुष्य का ।यह है हयग्रीव का स्वरुप । स्वयं विष्णु को भी हयग्रीव पर नियंत्रण के लिए हयग्रीव का अवतार ग्रहण करना पड़ा तब जाकर हयग्रीव का नाश संभव हुआ ।यह है कविता के भीतर अवान्तर प्रसंग । आज वर्तमान समय भी जनजागरुक लोकतंत्र की मांग करता है ।जन नेतृत्व आज अपनी करुणा और जनता के प्रति संवेदना की भावनाएं खो चुका है ।खुद जनता प्रजा भी मत तय करने में भ्रमित है ।वह दबाव और झूठे जुमलों पर बहकी हुई अपनी बेहतरी के विचार से भटकी है ।उसके विचार जातिगत ,नफरत,घृणा को उकसाने वाले हैं ।इस बहाव में वह अपने जमीनी और हकीकत के मसले भूल चुकी है ।उसे जब जन नेतृत्व को चुनना है तब यह विचार तो जरुर ही करना चाहिए कि किसमें नेतृत्व की सच्ची क्षमता है ? और किसमें नहीं ? कौन संवेदनशील और करुणामय है ? नारी का सम्मान और बाल -बुजुर्ग ,किस की प्रजा बनकर सुरक्षित रहेंगे ।जो छोटी से छोटी हिंसा को भी उचित मानता है याने जरा सी गुलेल भी यदि उसके पास शक्ति के रुप में मौजूद हैं तो वह चिड़िया जैसे मासूम प्राणी को भी मारने के उपक्रम में मसरुफ़ हो जायेगा ।ऐसे हिंसक और असंवेदनशील मनुष्य के हाथों में यदि राजसत्ता का बल ,ताकत , शक्ति सौंप दी जाये तो यह सबसे बड़ा अनर्थ ही होगा ।यहां आशय यह है कि जनता को अपने नेतृत्व कारी प्रतिनिधि को सत्ता की शक्ति सौंपते समय बहुत ज्यादा विचारवान और विवेक का ध्यान रखना चाहिए ।स्त्री किसी भी समाज,जाति ,समुदाय ,सम्प्रदाय , किसी भी राष्ट्र की हो उसका सम्मान सदा सुरक्षित रहना चाहिए ।सत्ता लोलुप व्यक्ति को कभी भी अपना नेतृत्व करने का जरिया नहीं बनाना चाहिए ।यह विष्णु भी हयग्रीव को सृष्टि का नियन्ता बनने की इच्छा बताने पर अन्तर्ध्यान हो गये ।जनता को भी कभी निर्दय नेतृत्व नहीं चुनना चाहिए ।नेतृत्व की क्षमता सौंपते समय विवेक पूर्ण विचार बहुत बहुत जरुरी होता है अन्यथा प्रजा जीते जी मर जाती है ।जनता हर हमेशा जागरुक और चिन्तन शील होनी चाहिए तब ही वह अपने रोजमर्रा के जीवन की समस्याओं को ठीक से सुलझा पायेगी ।प्रजा की पहली जरुरत है शान्ति ,रोजगार ,बेहतर शिक्षा भारतीय परिवेश के अनुकूल ,बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, पेय जल , कृषि , आर्थिक स्वायत्तता , आरक्षण ना हो चलेगा , समान अवसर ।ये है जनता के मसले । आज जनता भी विष्णु अवतारी है यदि सामने हयग्रीव सत्ता मांगने खड़ा है तो ब्रह्माण्ड देने से पूर्व जनता को भी अन्तर्ध्यान हो जाना होगा । यह है हयग्रीव की औपनिषदिक कथा का सार ।यह है मर्म कथा का ।यही है कथा की चेतना और विवेक । हयग्रीव की हिंसक वृत्ति को ब्रह्माण्ड नहीं सौंपा जा सकता ।यह विवेक तो प्रजा को रखना बेहद जरूरी है ।हर जन विचार वान विवेकवान और चेतनावान है ।देखने सुनने और समझने वाली दूरदृष्टि से सम्पन्न है ही ।हिंसक के हाथों में सत्ता कदापि नहीं । 🙏विनीता रघुवंशी

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