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बेटी की याद
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खिड़की या दरवाजे से
बारिश का नजारा देखते जब कभी
चेहरे तक आ जाती बौछारें
मुझे तेजी से बेटी की याद आने लगती
जो अमरावती के आंगन से
हरदा तक आने के खयालों में
रानू को कठघोड़े पर चढ़ाये
नाना के घर चलने का
खेल खिला रही होगी
और वह बादलों के
उड़न खटोले पर बैठकर
पकी जामुन के लिए
नानी के पास आने की जिद कर रहा होगा ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– ” पकी फसल के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता में संबंधों का मर्म स्मृति के भीतर समाया है ।कविता में उभरी बेटी की याद हर एक की जेहन में बसी बेटी को जीवन्त कर रही है ।जब जब बारिश की हल्की फुहारें चेहरे को छुएंगी तब तब मन के भीतर समाई बेटी की याद मन और आत्मा के फलक को भिगो देगी ।यह तर बतर होता मन जितना जितना ही तरल और नम होगा उतनी आत्मीयता की बरसात भी माहौल को नम बना देता है ।आज आदमी की कल्पना शीलता आधुनिक जीवन शैली में कहीं खो गयी है ।आज का मनुष्य इतना बहुधंधी हो गया है और इतना निष्करुण की उस के पास भावनाएं टिकती ही नहीं ।वह निरंतर शुष्क हकीकत में डूबा रहता है । हर समय अपने पन की जद से बाहर बस बंधन तुड़ाते हुए । जिम्मेदारी से पीछा छुड़ाते हुए ।यह आधुनिक जीवन शैली का यथार्थ है ।पिता -पुत्री के नजदीकी संबंधों को आज भावनात्मक जमीन से उठाकर व्यवसायिक जीवन यथार्थ से जोड़ दिया गया है । बेटी है तो दहेज है ।बेटी है तो खर्च है बेटी है तो संरक्षण की देखभाल की सामाजिक कुदृष्टि कुप्रवृत्तियों से रक्षा की चिन्ता फिक्र है ।ससुराल और मायके के बीच की अलंघ दूरियां है ।रीति -रिवाज की रस्में और औपचारिक सामाजिक ढांचे के बीच फंसीं बेटी जो केवल पीहर को, मायके को, बच्चों के मन बहलाव में ही खेल खिलाकर पूरा करती है । आधुनिक जीवन शैली में पले बढ़े बच्चे आज नाना -नानी ,दादा -दादी के लाड़ – दुलार से अनजान और अजनबी है ।वे बहुमंजिला इमारतों ,फ्लैट- सिस्टम ,और सुरक्षित चारदीवारी में घिरे- घिरे ही कब बड़े हो जाते हैं पता ही नहीं चलता ।आज की दुरुह होती जीवन शैली में पिता को याद दिलाती है बारिश की बौछारें और बेटी अपने पुत्र के साथ पिता के आंगन के ख्याल में आ -जा रही है । यह कितना मार्मिक है ।जीवन शैली की व्यस्तता और भाग दौड़ में उलझा मानस केवल याद के बहाने खोजता है और खो जाता है कल्पनाओं में ।वह उन पलों को जो स्मृतियों में सहेजें हुए हैं उन्हें जीवन्त बना कर जी नहीं पाता । बारिश की बौछारों की शीतलता में है बेटी का स्पर्श नाती की चहक और जिद ।सब कल्पना के भीतर लुका छुपा सा । क्या ही अच्छा हो आदमी आधुनिक ता के आडम्बर और बंधन से बाहर आत्मीयता का एक मनोहारी संसार का सृजन करे । जहां बचपन के पास अपने परिजनों का लाड़ -दुलार भरा सहज जीवन हो । जहां बचपन की जिदें और बालहठ का अबूझ हास -परिहास का रचा बसा भाव हो ।
विनीता रघुवंशी
