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विनीता रघुवंशी
आदमी होते ही
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हमसे ज्यादा
कल्याण कारी हैं टेबल
कार्बन का गरलपान करते
और बदले में
लुटाते आकसीजन का अमृत
हमसे ज्यादा ततववती है लताए़
जो फलती फूलती समर्पित होती है़
हमसे ज्यादा
कर्म निष् हैं मेघ
जो सूर्य किरणों की
सीढ़ियां चढ़
आकाश से मारते
धरती पर छलांग
हमसे ज्यादा
मैथुनी है सृष्टि
तभी तो
अपने वंश वर्द्धन में
भओगमग्नआ है
योनियां सभी
हमसे ज्यादा
दहाड़ते हैं शेर
बोलते हैं हमसे ज्यादा
रुपकों में उल्लू
हमसे ज्यादा जड़ हैं
चंचल है हमसे ज्यादा नदियां
हमसे ज्यादा
स्थूल है पदार्थ
सूक्ष्म है हमसे ज्यादा अवकाश
सब कुछ है ज्यादा हमसे
इसके बावजूद
इन्सान होते ही
सबसे ज्यादा हैं हम
उनसे भी
जो सबसे ज्यादा हैं
या हमसे ज्यादा
कि ज्यादा से ज्यादा होते जाते हैं जो !
( श्री प्रेमश़कर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” नहीं रहने के बाद भी ” से उद्धृत )
आज की कविता में मनुष्य की भौतिक बौध्दिक और मनुष्यता का विचार संसार के समस्त कल्याण कारी स्वरुप से महत्त्वपूर्ण है । जीवन को संरक्षित करता पृथ्वी का हर तत्व बहुत महत्वपूर्ण है । जल अग्नि समीर क्षिति और आकाश में जीवन लायक तत्व है ।पर सबसे अहम है आदमी जो अपनी करुणा विचार बुध्दि बोध तन मन की अतुलित शक्ति से संपन्न है ।मानव बुद्धि ही संसार के समस्त पदार्थों में से मनुष्योपयोगी ,लाभ दायक जीवन दायी तत्व को खोज कर उसका मानव हित में इस्तेमाल करती हैं । पेड़ हो लताएं हों आकाश हो या सृष्टि मनुष्य से ज्यादा नहीं हो सकती है ।मनुष्य के पास भलाई करने की सामर्थ्य ज्यादा है । संसार का हर तत्व अपनी परिधि में बंधा है लेकिन मनुष्य ही अपने स्वरुप में स्थित रहते हुए भी अपनी चेतना अपनी संवेदना अपनी करुणा अपने विचार अपने विवेक का प्रयोग करके दुनिया के किसी भी आदमी की पीड़ा दुख तनाव कष्ट संताप वेदना चिन्ता ,प्रेम लगाव आत्मीयता कुछ भी ले दे सकता है । आदमी ही आदमी की कम अक्ली मूर्खता निर्बुद्धि किसी को भी प्रयासो़ से खत्म कर सकता है । अपनी बुध्दि के चातुर्य से अपनी बुध्दि के कौशल से वह पृथ्वी को परस्पर प्रेम का सौहार्द का उदाहरण बना कर प्रस्तुत कर सकता है । पृथ्वी विभाजन की लकीरें खींच कर केवल नक्शे बनाने का ही साधन नहीं है ।वह एक समूचे जीवन को स्मरणीय और आदर्शमय बनाने का भी विकल्प है । मनुष्य भी जब तक जातियों धर्मों भाषाओं की सीमाओं में बंध कर सोचता रहेगा तब तक उसे अपने भीतर समाई शक्ति का अपनी सामर्थ्य का अहसास नहीं होगा क्योंकि वह इंसानियत से अंजान है उसे अपने मानवीय रुप का परिचय नहीं है ।वह केवल अपने भोग ,अपने सुख,अपने दुख अपने स्वार्थ अपनी चिन्ता अपनी रक्षा तक ही सोच को स्थिर किए हुए हैं । इसीलिए वह सिर्फ मनुष्य रुप में श्रेष्ठ पशु भर है । जब वह अपने दायरे से बाहर परदुख पर कातरता दूसरे की भूख दूसरे के आराम नींद सुख दुख के साथ अपनी चेतना और संवेदना को जोड़ कर देखा उसी दिन उसके भीतर इंसान का स्वरुप प्रगट होगा ।अन्यथा वह केवल दो पैरो़ पर खड़ा एक काठ का पुतला भर है । इस काठ के पुतले में प्राणतत्व तभी स्पन्दन में झलकेगा जब यह करुणा और संवेदना से परिचित होगा ।तभी मनुष्य अकेला होकर भी ज्यादा से ज्यादा हो जायेगा ।उसकी समूह दृष्टि की चेतना कल्याणमय और परोपकार से भलाई के ज्ञान से उन्मीलित होगी । यही इंसानियत का उजाला ही जिस दिन उसकी चेतना विचार विवेक का हिस्सा होगा उस दिन परपीड़ा की अधमाई के सभी किस्से मिट जायेंगे ।फिर मनुष्य अकेला होकर भी बहुसंख्यक होगा ।संख्या केवल आंकड़ा भर होती है लेकिन समान चेतना विचार संवेदना से भरपूर कम से कम लोग भी बड़े से बड़े परिवर्तन कर सकते हैं ।विचारहीन और संवेदना शून्य व्यक्तियो़ की बहुसंख्यक समुदाय केवल उच्छृंखल भीड़ ही होती है ।अपने को इस विचार शून्य भीड़ से विलग करके अपने इंसानी वजूद को प्रतिष्ठित कीजिए ।
