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सम्मोहन उसका-आकार लेती यात्राएं

by Dr. Vinita Raghuvanshi
सम्मोहन उसका
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उसके मुंह से
भूख शब्द निकलते ही
उसने उसे हिप्नोटाइज करके
अचेत कर दिया
फिर बोला — ‘जमूरे इधर आओ ‘
बोलो — ‘क्या चाहिए ‘
रोटी
सिर्फ रोटी
हां
कुर्सी नहीं चाहिए ?
नहीं
कोई पद ,प्रतिष्ठा या सुन्दरी ?
कुछ भी नही पहले सिर्फ रोटी !
उसके पहले शब्द पर वह हंसा और
जमूरे के सामने
रोटियों के आश्वासन बरसाता रहा
तालियां पीटता रहा मजमा
मदारी ने पूछा –क्यों पेट भरा ?
बोला जमूरा — आश्वासनों में पापड़ का स्वाद है
बढ़िया है गंध
पर स्वाद और गंध तृप्ति नहीं देते
भड़काते हैं भूख
मैं सिर्फ रोटी चाहता हूं
तो ले रोटी — ऐसा कहकर उसने
सपने में खूब रोटियां खिलाई
जमूरा डकारें लेता तृप्त हो गया
पूछा मदारी ने — भर गया पेट
हां !
अब क्या चाहिए ?
आराम कुर्सी और पद – प्रतिष्ठा और सुन्दरी
मजमे की तरफ देख कर बोला जादूगर
सुना — सम्मोहित जमूरे से
भूखे और भरे पेट का वक्तव्य !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह — ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
आज की कविता एक नाटकीय संवाद शैली का बेहतर उदाहरण है । यह संवाद शैली भारत के समाज का वह यथार्थ उजागर कर रही है जहां जनता मजमा बनी हुई है और राजनीतिक व्यवस्था जादूगर बनी हुई है ।वह जनता से-‘ भूख ‘ शब्द का उच्चारण सुनते ही खेल दिखाने लगती है और ढेर सारे आश्वासनों के पिटारे उसके सामने खोल देती है ।इन पिटारों में जनता को भ्रमित करने वाली योजनाएं हैं । ऐसे चमत्कार और संकल्प है जिनमें आत्म विस्मृत जनता चक्कर काटती रहती है । योजनाओं को संचालित करते दफ्तर हैं, सरकारी अफसर हैं ,सरकार है ,सत्ता है ,शासन – प्रशासन है और है सम्मोहन जादुई आंकड़े बाजी का लेकिन रोजगार से निकलती –‘रोटी’ कहीं नहीं है ? जमूरा बनी जनता केवल रोटी चाहती है ! सत्ता ,सरकार, शासन,प्रशासन उसे हर संभव लुभाने की कोशिश करती है लेकिन इस बार जमूरा अड़ गया है रोटी के लिए ,रोजगार के लिए ,आजीविका के लिए ? सत्ता सपनों में उसे रोटी खिलाती है और जमूरे का पेट भर गया ? कितना सुन्दर दृश्य सृजित हुआ ? जमूरे ने फिर अपनी चेतना को जगाया और कहा कि स्वाद और गंध भूख भड़काते हैं तृप्ति नहीं देते ! केवल स्वाद और गंध से किसकी भूख मिटती है ? रोटी का ख्याल तो भूख को भड़काता है ? जमूरा बनी जनता भी रोटी चाहती है और जब पेट भर जाता है तो उसकी मांग ,उसकी जरुरतें , उसकी इच्छाएं बदल जाती है । मनुष्य की जनता की पहली आवश्यकता–” रोटी ” होती है ।यह खाली पेट की जरुरत है ।यह प्राथमिक जरुरत है ।जब पेट भर जाता है तो जमूरा बनी जनता की जरुरतें बदल जाती हैं ।जनता को फिर — “आराम” चाहिए । काम करना फिर उसके ज़ेहन का हिस्सा नहीं रहता ? उसकी चेतना में फिर वैभव ,विलास, आलस्य तैरने लगता है ।वह फिर उच्च स्तर में अपने आपको शामिल महसूस करता है । उसकी पहली जरुरत पूरी होते ही वह एलीट वर्ग ( आभिजात्य वर्ग ) में दाखिल हो जाता है । वह अपने आपको शासित नहीं शासक मानने लगता है । – ” रोटी “के बाद –” सुरा” चाहिए ? फिर — ” सुन्दरी ” चाहिए । फिर – पद – प्रतिष्ठा सब चाहिए । यह सम्मोहन कितना फितरती है जो आदमी के अन्दर से चेतना को बाहर निकाल देता है और जनता के बीच से वह अलग स्तर बन जाता है । अपने ही वर्ग से बाहर आकर वह उनका शासक बन जाना चाहता है ।वह भी जमूरा से जनता और मजमे की भीड़ से मालिक बनने वाला रास्ता पकड़ लेता है ।यह जमूरे के सम्मोहन टूटने की बेला है जिसके पास जब भूख होती है तो वह याचक बना हुआ है और जब पेट भर जाता है तो अपने ही समाज की चिन्ता ,फिक्र, छोड़कर पद-प्रतिष्ठा ,सुरा ,सुन्दरी ,सत्ता ,कुर्सी , आराम सब चाहिए ।वह वैभव भी जो सत्ता में शामिल लोंगो का हिस्सा है । वह जमूरे की स्थिति से निकल कर खुद जादूगर बन जाना चाहता है ।यह सम्मोहन का टूटना नहीं और न ही यथार्थ का बोध ही है वरन वह वास्तविकता के भीतर से कल्पना के भ्रम में जाना चाहता है । सत्ता एक भ्रम रचती है । जनता इस भ्रम में लालायित -सी घूमती रहती है ।यह सत्ता का जादुई यथार्थ है । जहां आश्वासन है ,सपने हैं , मोह है ,आकर्षण है , पेट भरा है ।भूख से संघर्ष नहीं भूखो के संघर्ष हैं । सत्ता इन्हीं के साथ छलावा रचती है । जनता हर समय हर काल में जमूरा है या मजमा । तमाशा सत्ता की बाजीगरी है और जनता की भूख उसका खेल है ।रोटी से खेलना सत्ता की मनमोहक प्रस्तुति है ।यह उत्सव है ,जश्न है ,ताम – झाम और सजावट है । जनता है तो मजमा तो हर चौराहे , हर राह पर आम है ।जनता का विवेक ही इस जादुई यथार्थ से भ्रम से मुक्ति दिला सकता है । आत्मविस्मृत समाज के विवेक जागने पर ही यह संभव है ।
🙏 विनीता रघुवंशी

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